31 जुलाई 2026
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शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

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शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार की उस नीति को असंवैधानिक करार दिया जो अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल तलाकशुदा या परित्यक्त बेटियों को देती थी। न्यायालय ने कहा — विवाह के बाद बेटी मायके से नाता नहीं तोड़ती, और बेटे-बेटी में भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को फैसला दिया कि शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति — जो यह सुविधा केवल तलाकशुदा या परित्यक्त बेटियों को देती थी — को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया गया।
सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी.
वराले की खंडपीठ ने पटना उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया।
न्यायालय ने कहा कि बेटे और बेटी के बीच भेद करने वाला कोई भी वर्गीकरण संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है।
बिहार सरकार को आदेश मिलने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता के मामले पर गुण-दोष के आधार पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी शादीशुदा बेटी को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट) से वंचित नहीं किया जा सकता कि राज्य सरकार की नीति यह सुविधा केवल तलाकशुदा या पति द्वारा परित्यक्त बेटियों को देती है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी नीति संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है और संवैधानिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

मामले की पृष्ठभूमि

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने सायरा खातून और उनकी बेटी द्वारा दायर अपील को स्वीकार किया। यह अपील पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध थी, जिसमें पिता की मृत्यु के पश्चात बेटी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे को अस्वीकार करने के निर्णय को उचित ठहराया गया था।

अपीलकर्ताओं ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की उस नीति को चुनौती दी थी, जिसके अंतर्गत केवल तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी ही अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र मानी जाती थी। राज्य सरकार ने दावे को इस अतिरिक्त आधार पर भी अस्वीकार किया था कि मृतक कर्मचारी के भाई ने नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी।

न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि मृतक के भाई ने पहले ही अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दे दिया था, जिसके बाद न्यायालय ने कहा कि 'अस्वीकृति का वह आधार अब निरर्थक हो गया है।' जस्टिस सुंदरेश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बेटे और बेटी के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है।

न्यायालय ने दोहराया कि इस न्यायालय ने बार-बार यह माना है कि बेटी और बेटे के बीच अंतर करने वाला कोई भी वर्गीकरण अपने आप में असंवैधानिक है। केवल तलाकशुदा या परित्यक्त बेटी तक पात्रता सीमित करने वाला वर्गीकरण कानून की कसौटी पर नहीं टिक सकता।

विवाह और मायके के रिश्ते पर न्यायालय का दृष्टिकोण

बिहार सरकार की नीति के पीछे निहित उस धारणा को खारिज करते हुए कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके से संबंध-विच्छेद कर लेती है, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं हो सकती। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता ने विशेष रूप से बताया था कि वह अपने मायके में रह रही थी और अपनी माँ व भाई के सहयोग पर निर्भर थी — भले ही उसके तलाक को औपचारिक कानूनी मान्यता नहीं मिली थी।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी भी स्थिति में अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार का आधार नहीं बन सकता।

आदेश और आगे की कार्रवाई

पटना उच्च न्यायालय के आदेश और अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने के निर्णय को रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर गुण-दोष के आधार पर पुनर्विचार करे।

यह फैसला उन लाखों परिवारों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहाँ सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद विवाहित बेटियाँ आश्रित होने के बावजूद अनुकंपा नियुक्ति से वंचित रही हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सर्वोच्च न्यायालय ने शादीशुदा बेटी और अनुकंपा नियुक्ति पर क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 31 जुलाई 2026 को फैसला दिया कि किसी शादीशुदा बेटी को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने बिहार सरकार की उस नीति को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया जो यह सुविधा केवल तलाकशुदा या परित्यक्त बेटियों को देती थी।
बिहार सरकार की अनुकंपा नियुक्ति नीति क्या थी और इसे क्यों चुनौती दी गई?
बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति के अनुसार केवल तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी ही अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र थी। सायरा खातून और उनकी बेटी ने इसे इसलिए चुनौती दी क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद बेटी के दावे को इसी नीति के आधार पर अस्वीकार कर दिया गया था, जबकि वह मायके में रहकर परिवार पर आश्रित थी।
इस फैसले में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किस प्रकार माना गया?
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बेटे और बेटी के बीच भेद करने वाला कोई भी वर्गीकरण संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर बेटियों में भेद करना इस अधिकार का उल्लंघन है।
बिहार सरकार को अब क्या करना होगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह आदेश की प्रति मिलने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर गुण-दोष के आधार पर पुनर्विचार करे। पटना उच्च न्यायालय का पूर्व आदेश रद्द कर दिया गया है।
क्या यह फैसला अन्य राज्यों की अनुकंपा नियुक्ति नीतियों को भी प्रभावित करेगा?
यह फैसला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल स्थापित करता है। चूँकि सर्वोच्च न्यायालय ने लैंगिक भेदभाव पर आधारित ऐसी किसी भी नीति को अनुच्छेद 14 का उल्लंघन घोषित किया है, इसलिए समान प्रावधान रखने वाले अन्य राज्यों को भी अपनी नीतियाँ संशोधित करनी पड़ सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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