15 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की, पटना हाईकोर्ट से राहत माँगने का निर्देश

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की, पटना हाईकोर्ट से राहत माँगने का निर्देश

सारांश

भरत भूषण तिवारी की कथित एनकाउंटर में मौत के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार तीसरी बार सीधी सुनवाई से इनकार किया। सीबीआई जाँच और न्यायिक निगरानी की माँग करने वाले याचिकाकर्ताओं को अब पटना उच्च न्यायालय का रुख करना होगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 15 जुलाई 2025 को भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।
सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया।
याचिका प्रिया मिश्रा की ओर से दाखिल थी, जिसमें पुलिसकर्मियों पर एफआईआर , सीबीआई जाँच और सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में जाँच की माँग थी।
इससे पहले अधिवक्ता विशाल तिवारी की याचिका और न्यायमूर्ति बी.वी.
नागरत्ना की पीठ के समक्ष उल्लेख पर भी सुनवाई से इनकार हो चुका है।
भरत भूषण तिवारी की मौत 17 जून को भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र में कथित एनकाउंटर के दौरान हुई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 15 जुलाई 2025 को बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गाँव निवासी भरत भूषण तिवारी की कथित एनकाउंटर में मौत से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को पहले पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय से राहत न मिलने की स्थिति में ही आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

मुख्य घटनाक्रम

यह याचिका प्रिया मिश्रा की ओर से अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दाखिल की थी। याचिका में तीन प्रमुख माँगें रखी गई थीं — आरोपित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना, एनकाउंटर के दौरान मौजूद अधिकारियों पर कार्रवाई, और सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति की निगरानी में जाँच कराना।

गौरतलब है कि यह इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दूसरी याचिका थी। इससे पहले अधिवक्ता विशाल तिवारी ने एक अलग याचिका दाखिल की थी, जिसमें एनकाउंटर को कथित तौर पर फर्जी बताते हुए सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। उस याचिका पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार करते हुए पटना उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था।

पहले भी हो चुका है इनकार

इससे पूर्व जब न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया गया था, तब भी सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल सुनवाई से मना कर दिया था और याचिकाकर्ता को न्यायालय की रजिस्ट्री से मामला सूचीबद्ध कराने को कहा था। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही मामले में तीन अवसरों पर सीधी सुनवाई से परहेज़ किया है।

याचिका में उठाए गए मुद्दे

17 जून को भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र में हुई इस कथित एनकाउंटर में भरत भूषण तिवारी की मौत हो गई थी। जनहित याचिका में तर्क दिया गया है कि एनकाउंटर में होने वाली मौतें गैर-न्यायिक हत्याओं के समान हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मी प्रायः एक जैसा तर्क देते हैं — कि मारा गया व्यक्ति भागने की कोशिश में हथियार छीनने और गोली चलाने का प्रयास कर रहा था, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की। आलोचकों का कहना है कि यह एकरूपता इन मामलों की निष्पक्ष जाँच की आवश्यकता को और अधिक बल देती है।

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब याचिकाकर्ताओं को पटना उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखना होगा। यदि वहाँ से संतोषजनक राहत नहीं मिलती, तभी सर्वोच्च न्यायालय में पुनः दस्तक दी जा सकती है। यह मामला बिहार में पुलिस एनकाउंटर की जवाबदेही और न्यायिक निगरानी के व्यापक सवाल को केंद्र में ला देता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इससे पीड़ित परिवार के लिए राहत की राह और लंबी हो जाती है। एनकाउंटर मामलों में 'भागने की कोशिश' वाला एकरूप तर्क वर्षों से न्यायिक और मानवाधिकार समीक्षाओं में उठता रहा है, फिर भी जवाबदेही तंत्र कमज़ोर बना हुआ है। पटना उच्च न्यायालय के पास अब अवसर है कि वह बिहार में पुलिस एनकाउंटर की जाँच के लिए एक स्पष्ट मानक स्थापित करे — जो राज्य में इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अत्यंत ज़रूरी है।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला क्या है?
बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गाँव निवासी भरत भूषण तिवारी की 17 जून को कथित पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी। परिजनों और याचिकाकर्ताओं ने इसे कथित तौर पर फर्जी एनकाउंटर बताते हुए सीबीआई जाँच और न्यायिक निगरानी की माँग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई क्यों नहीं की?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित न्यायिक परंपरा के अनुसार याचिकाकर्ताओं को पहले पटना उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया, क्योंकि उच्च न्यायालय को पहले मामले की सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। वहाँ से राहत न मिलने पर ही सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने क्या माँगें रखी हैं?
याचिकाओं में मुख्यतः तीन माँगें हैं — आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जाँच, और सीबीआई से स्वतंत्र जाँच कराना।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद याचिकाकर्ताओं को पटना उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करनी होगी। वहाँ से संतोषजनक राहत न मिलने की स्थिति में वे पुनः सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।
क्या इस मामले में पहले भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल हुई थी?
हाँ, इससे पहले अधिवक्ता विशाल तिवारी ने एक अलग याचिका दाखिल की थी, जिसमें एनकाउंटर को कथित तौर पर फर्जी बताते हुए सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। उस याचिका पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार कर पटना उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 दिन पहले
  2. 2 सप्ताह पहले
  3. 3 सप्ताह पहले
  4. 3 सप्ताह पहले
  5. 3 सप्ताह पहले
  6. 3 सप्ताह पहले
  7. 3 सप्ताह पहले
  8. 3 सप्ताह पहले