भोजपुर एनकाउंटर: सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान की मांग, CBI या SIT जांच और FIR की अपील
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के भोजपुर जिले में 17 जून को हुई कथित पुलिस मुठभेड़ में भारत भूषण तिवारी की मौत के मामले में अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया गया है। अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने 21 जून को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को संबोधित एक प्रतिनिधित्व दायर कर स्वत: संज्ञान लेने, एफआईआर दर्ज कराने और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने की मांग की है। इस घटना ने पुलिस मुठभेड़ों में संवैधानिक अधिकारों और न्यायालय-निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।
मुख्य घटनाक्रम
17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गाँव में पुलिस और भारत भूषण तिवारी के बीच कथित मुठभेड़ हुई, जिसमें तिवारी की मौत हो गई। प्रशासन का कहना है कि तिवारी ने पुलिस टीम पर पहले गोली चलाई, जिसके जवाब में पुलिस ने फायरिंग की। हालाँकि मृतक के परिजनों और ग्रामीणों का आरोप है कि तिवारी ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार फेंक दिया था — इसके बाद भी उन्हें गोली मारी गई।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ वीडियो कथित तौर पर आत्मसमर्पण की स्थिति की ओर संकेत करते हैं, जिससे यह विवाद और गहरा हो गया है। परिवार का स्पष्ट कहना है कि यह वास्तविक मुठभेड़ नहीं, बल्कि न्यायेतर हत्या (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग) थी।
याचिका में क्या माँगा गया
अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा के प्रतिनिधित्व में सर्वोच्च न्यायालय से निम्नलिखित निर्देश देने की अपील की गई है — भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 सहित प्रासंगिक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराना; केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) या विशेष जांच दल (SIT) से न्यायालय की निगरानी में जांच; तथा घटना से जुड़े सभी वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग और फोरेंसिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखना।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग को स्वतंत्र जांच के निर्देश देने तथा मृतक के परिजनों और गवाहों को सुरक्षा प्रदान करने की भी माँग की गई है।
कानूनी आधार
प्रतिनिधित्व में सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के ऐतिहासिक पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार किसी भी पुलिस मुठभेड़ में मौत होने पर एफआईआर दर्ज करना, स्वतंत्र जांच, मजिस्ट्रेट जांच, सबूतों का संरक्षण और मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट देना अनिवार्य है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि पुलिस मुठभेड़ केवल असाधारण परिस्थितियों में और जीवन पर तत्काल खतरे की स्थिति में ही जायज़ है — इसे गिरफ्तारी, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
याचिका के अनुसार, मृतक भारत भूषण तिवारी के खिलाफ किसी आपराधिक इतिहास या पूर्व एफआईआर की कोई सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। वे एक स्नातक थे और सोशल मीडिया के माध्यम से बाढ़, कटाव तथा जनसमस्याओं को उठाने के लिए जाने जाते थे।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
यह ऐसे समय में आया है जब सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से भी सवाल उठ रहे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने कहा कि वायरल वीडियो ने मुठभेड़ की परिस्थितियों पर गंभीर संदेह पैदा किया है और केवल चार पुलिसकर्मियों का निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने दोषियों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई की माँग की।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने भी सवाल उठाया कि यदि तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और वे निहत्थे थे, तो पुलिस ने गोली क्यों चलाई। आरा के सांसद सुदामा प्रसाद ने भी उपलब्ध वीडियो और साक्ष्यों के आधार पर मुठभेड़ को संदिग्ध बताया है।
बिहार सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह
बढ़ते विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच बिहार सरकार ने पहले ही न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की थी कि हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश इस मामले की स्वतंत्र जांच करेंगे। हालाँकि अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर प्रतिनिधित्व के बाद यह देखना होगा कि शीर्ष अदालत राज्य की न्यायिक जांच को पर्याप्त मानती है या CBI/SIT जांच का निर्देश देती है। मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे घटना की वैधता पर सवाल और गहरे हो गए हैं। न्याय की माँग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आरोपों ने गवाहों में भय का माहौल बनाने की चिंता भी बढ़ा दी है।