मथुरा पॉक्सो अदालत ने श्याम बिहारी को सुनाई आजीवन कारावास की सजा, ₹1.43 लाख जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के मथुरा में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत गठित विशेष न्यायाधीश की अदालत ने एक नाबालिग बच्ची के यौन शोषण के मामले में आरोपी श्याम बिहारी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 31 अक्टूबर 2026 को बताया कि अदालत ने दोषी पर ₹1.43 लाख का जुर्माना भी लगाया है।
अपराध और आरोपों का विवरण
सीबीआई के अनुसार, अदालत ने श्याम बिहारी को पॉक्सो अधिनियम, 2012, भारतीय दंड संहिता (IPC) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 के तहत विभिन्न संगीन अपराधों का दोषी पाया। इन अपराधों में बलात्कार, गंभीर यौन हमला, अश्लील उद्देश्यों के लिए बच्चे का इस्तेमाल करना और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSAM) अपने पास रखना शामिल है।
सीबीआई ने 17 जून 2025 को श्याम बिहारी के विरुद्ध मामला दर्ज किया था। उस पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री एकत्र करने, प्रसारित करने और प्रकाशित करने का आरोप था। जाँच के दौरान यह भी उजागर हुआ कि उसने एक नाबालिग बच्ची के साथ गंभीर यौन हमला भी किया था।
जाँच प्रक्रिया और पीड़िता की सुरक्षा
सीबीआई ने जाँच के दौरान नाबालिग पीड़िता की पहचान की और उसकी सुरक्षा, गरिमा एवं मानसिक स्थिति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। पीड़िता को उचित काउंसलिंग प्रदान की गई। एजेंसी ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों, बाल यौन शोषण मामलों के विशेषज्ञ चिकित्सकों और बाल संरक्षण अधिकारियों के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखा।
डिजिटल साक्ष्यों को विधिसम्मत तरीके से एकत्र, संभाल और सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया गया, जो अंततः अदालत में दोषसिद्धि का आधार बना।
मुकदमे का घटनाक्रम
जाँच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 14 अगस्त 2025 को आरोपी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2025 को आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए। मुकदमे की समाप्ति के बाद अदालत ने श्याम बिहारी को सभी आरोपों में दोषी पाते हुए पॉक्सो अधिनियम, 2012, IPC और IT अधिनियम, 2000 की प्रासंगिक धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
सीबीआई की प्रतिबद्धता
सीबीआई ने स्पष्ट किया कि वह बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े अपराधों की जाँच और अभियोजन के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। एजेंसी ऐसे मामलों को उच्च प्राथमिकता देती है, जिसमें बच्चों की सुरक्षा, उनके अधिकारों और उनकी गरिमा का पूरा ध्यान रखा जाता है।
गौरतलब है कि यह मामला डिजिटल माध्यम से बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार और वास्तविक यौन हमले के संयुक्त अपराधों का है — एक ऐसी प्रवृत्ति जिस पर देशभर की अदालतें और जाँच एजेंसियाँ अब कड़ा रुख अपना रही हैं। यह दोषसिद्धि पॉक्सो मामलों में त्वरित और कठोर न्यायिक कार्रवाई की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण संदेश है।