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मेघालय में मानसून 74% कम: चेरापूंजी की धरती पर सूखे जैसे हालात, IMD ने 'अत्यधिक कमी' घोषित किया

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मेघालय में मानसून 74% कम: चेरापूंजी की धरती पर सूखे जैसे हालात, IMD ने 'अत्यधिक कमी' घोषित किया

सारांश

दुनिया की सबसे अधिक बारिश वाली धरती पर इस बार मानसून ने मुँह फेर लिया है। मेघालय में 74% वर्षा की कमी — पूर्वोत्तर में सबसे ज़्यादा — ने कृषि, जल स्रोतों और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। चेरापूंजी की पहचान दाँव पर है।

मुख्य बातें

मेघालय में 1 जून से 1 जुलाई 2026 के बीच सामान्य 750.8 मिमी के मुकाबले केवल 192.9 मिमी वर्षा दर्ज हुई — 74% की कमी।
IMD ने मेघालय को 'लार्ज डेफिशिएंट' (अत्यधिक वर्षा कमी) श्रेणी में रखा — पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में सर्वाधिक कमी।
केवल 1 जुलाई को सामान्य 28.7 मिमी के मुकाबले महज 3 मिमी बारिश हुई — 90% की एकदिवसीय कमी।
पूर्वोत्तर में मणिपुर (71%) , नागालैंड (51%) , अरुणाचल प्रदेश (45%) में भी वर्षा कम; सिक्किम में 15% अधिक बारिश।
खरीफ सीज़न में धान रोपाई प्रभावित; विशेषज्ञों ने फसल उत्पादन, भूजल और मानसून पर्यटन पर असर की चेतावनी दी।
पर्यावरण समिति अध्यक्ष रक्कम ए.
संगमा पहले ही जलवायु परिवर्तन से वर्षा पैटर्न बदलने की चेतावनी दे चुके हैं।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, दुनिया के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गिने जाने वाले मेघालय में इस मानसून सीज़न में 74 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई है — जो पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। 1 जून से 1 जुलाई 2026 के बीच राज्य में सामान्य 750.8 मिमी के मुकाबले केवल 192.9 मिमी बारिश हुई, जिसके चलते IMD ने मेघालय को 'लार्ज डेफिशिएंट' (अत्यधिक वर्षा कमी) श्रेणी में रखा है।

मुख्य आँकड़े और स्थिति

मौसम विभाग के अधिकारियों ने गुरुवार, 2 जुलाई को बताया कि केवल 1 जुलाई को राज्य में सामान्य 28.7 मिमी के मुकाबले महज 3 मिमी बारिश दर्ज हुई — यानी एक ही दिन में लगभग 90 प्रतिशत की कमी। यह स्थिति इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि सोहरा (चेरापूंजी) और मावसिनराम — दोनों मेघालय में स्थित — वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक वार्षिक वर्षा के लिए प्रसिद्ध हैं।

आँकड़ों के अनुसार, 1 जून से 1 जुलाई के दौरान समूचे पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 40 प्रतिशत कम वर्षा रिकॉर्ड की गई। पूर्वोत्तर में मणिपुर में 71%, नागालैंड में 51% और अरुणाचल प्रदेश में 45% की कमी रही। सिक्किम एकमात्र अपवाद रहा, जहाँ सामान्य से 15 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई।

कृषि और जल संसाधनों पर असर

IMD के अनुसार, यह कमी खरीफ सीज़न के सबसे नाज़ुक दौर में सामने आई है, जब राज्य के किसान धान की रोपाई और बागवानी में जुटे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले हफ्तों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो बुआई में देरी, मिट्टी में नमी की कमी और फसल उत्पादन पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कम वर्षा से नदियों का जलस्तर घट सकता है, भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है और राज्य की जैव विविधता के साथ-साथ मानसून पर्यटन पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

जलवायु परिवर्तन की चेतावनी

गौरतलब है कि पिछले महीने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मेघालय विधानसभा की पर्यावरण समिति के अध्यक्ष रक्कम ए. संगमा ने आगाह किया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य में तापमान बढ़ रहा है, वर्षा का स्वरूप बदल रहा है और जल संकट गहरा होता जा रहा है। उन्होंने लोगों, समुदायों और संस्थानों से वनीकरण, प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास तेज़ करने की अपील की थी।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर अल-नीनो और जलवायु परिवर्तन के मिले-जुले प्रभावों के चलते पारंपरिक रूप से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी मौसमी अनिश्चितता बढ़ रही है।

आगे क्या

IMD ने फिलहाल मेघालय के लिए निकट भविष्य में पर्याप्त वर्षा का कोई ठोस पूर्वानुमान नहीं दिया है। राज्य सरकार और कृषि विभाग को वैकल्पिक सिंचाई प्रबंधन और किसानों को समय पर सलाह देने की दिशा में कदम उठाने की ज़रूरत होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति मेघालय में दीर्घकालिक जल नीति और जलवायु अनुकूलन योजनाओं की तत्काल समीक्षा की माँग करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

इसलिए वहाँ सूखे जैसे हालात जलवायु परिवर्तन के गहराते प्रभाव की स्पष्ट चेतावनी हैं। राज्य सरकार की दीर्घकालिक जल नीति और कृषि अनुकूलन योजनाएँ अभी तक इस स्तर के मौसमी व्यवधान के लिए तैयार नहीं दिखतीं — और यही सबसे बड़ी चिंता है।
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेघालय में इस मानसून सीज़न में कितनी वर्षा की कमी दर्ज की गई?
IMD के आँकड़ों के अनुसार, 1 जून से 1 जुलाई 2026 के बीच मेघालय में सामान्य 750.8 मिमी के मुकाबले केवल 192.9 मिमी बारिश हुई — यानी 74% की कमी। यह पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में सर्वाधिक है।
'लार्ज डेफिशिएंट' श्रेणी का क्या मतलब है?
IMD की वर्गीकरण प्रणाली में 'लार्ज डेफिशिएंट' का अर्थ है कि किसी क्षेत्र में सामान्य वर्षा की तुलना में 60% या उससे अधिक की कमी दर्ज हुई हो। मेघालय में 74% की कमी इसे इस अत्यंत गंभीर श्रेणी में रखती है।
इस वर्षा कमी का कृषि पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, खरीफ सीज़न के दौरान पर्याप्त बारिश न होने से धान की रोपाई में देरी, मिट्टी में नमी की कमी और फसल उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा नदियों का जलस्तर घटने और भूजल पुनर्भरण प्रभावित होने की भी आशंका है।
पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में वर्षा की क्या स्थिति है?
IMD के आँकड़ों के मुताबिक, मणिपुर में 71%, नागालैंड में 51% और अरुणाचल प्रदेश में 45% कम वर्षा दर्ज की गई। सिक्किम एकमात्र अपवाद रहा जहाँ सामान्य से 15% अधिक बारिश हुई।
क्या मेघालय में वर्षा की यह कमी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है?
मेघालय विधानसभा की पर्यावरण समिति के अध्यक्ष रक्कम ए. संगमा ने पहले ही चेतावनी दी थी कि जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य में तापमान बढ़ रहा है और वर्षा का स्वरूप बदल रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ इस मौसमी असामान्यता को बदलते जलवायु पैटर्न का संकेत मानते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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