बस्तर की ढोकरा कला को मिली वैश्विक पहचान, PM मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई PM अल्बनीज को भेंट की धातु नाव
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज को छत्तीसगढ़ के बस्तर की सदियों पुरानी जनजातीय ढोकरा कला से निर्मित एक धातु नाव उपहारस्वरूप भेंट की है। इस राजनयिक भेंट ने बस्तर के स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प व्यवसायियों में नई उमंग भर दी है, क्योंकि यह उनकी पीढ़ियों पुरानी कला को अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिलने का प्रतीक बन गई है।
ढोकरा कला का ऐतिहासिक महत्व
ढोकरा कला एक प्राचीन धातु-ढलाई शिल्प है जो बस्तर संभाग की जनजातीय संस्कृति की पहचान रही है। यह कला 'लॉस्ट वैक्स' तकनीक पर आधारित है, जिसमें मोम के साँचे पर धातु ढालकर अनूठी कृतियाँ तैयार की जाती हैं। सदियों से यह शिल्प बस्तर के आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है। गौरतलब है कि यह कला धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुँच रही थी, लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से इसके पुनरुद्धार की उम्मीद जगी है।
कारीगरों और व्यवसायियों की प्रतिक्रिया
जगदलपुर निवासी और बस्तर ढोकरा आर्ट के व्यवसायी अनिल लुक्कड़ ने कहा कि यह पहल पूरे बस्तर के लिए सम्मान की बात है। उन्होंने कहा, 'किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री को बस्तर की सदियों पुरानी कला उपहार में देना वास्तव में गर्व का विषय है। यह पहल बस्तर की पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने में भी अहम भूमिका निभाएगी।'
लुक्कड़ ने यह भी कहा कि भारत की अनेक पारंपरिक कलाएँ धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुँच रही हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय हस्तशिल्प और लोक कलाओं को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाना सराहनीय प्रयास है।
कारीगरों की घटती संख्या और नई उम्मीद
अनिल लुक्कड़ के अनुसार, वर्तमान में बस्तर संभाग के सातों ज़िलों में 10,000 से अधिक कारीगर ढोकरा आर्ट के व्यवसाय से जुड़े हैं। एक समय यह संख्या 15,000 तक थी, लेकिन बाज़ार और माँग की कमी के कारण कई कारीगर इस पेशे से दूर हो गए। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री की इस पहल के बाद इस कला के प्रति आकर्षण बढ़ा है और कई कारीगर दोबारा इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं।
जी-20 से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक — एक निरंतर परंपरा
लुक्कड़ ने याद दिलाया कि जी-20 सम्मेलन के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों को ढोकरा आर्ट सहित भारतीय हस्तशिल्प की अनूठी कृतियाँ भेंट की थीं। यह ऐसे समय में आया है जब 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के तहत ग्रामीण स्तर के कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर मिल रहे हैं।
नौका का प्रतीकात्मक संदेश
उपहार में दी गई धातु नाव की प्रतीकात्मकता पर लुक्कड़ ने कहा कि नौका सदियों से लोगों को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचाने का माध्यम रही है। वैश्विक परिदृश्य में यह भाईचारे, सहयोग और आपसी जुड़ाव का प्रतीक बन सकती है। उनके अनुसार, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मित्रता और सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत करने के संदेश के रूप में यह उपहार विशेष महत्व रखता है। आने वाले समय में ढोकरा आर्ट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में और अधिक पहचान मिलने की उम्मीद है, जिससे बस्तर के कारीगरों की आर्थिक स्थिति और मज़बूत होगी।