PM मोदी ने कामंदकीय नीतिसार का श्लोक साझा किया: 'जनसेवा ही सुशासन का मूल आधार'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें जनकल्याण और सुशासन को नेतृत्व की आधारशिला बताया गया है। यह श्लोक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ कामंदकीय नीतिसार से लिया गया है, जिसकी रचना आचार्य कामंदक ने की थी।
कौन सा श्लोक साझा किया
प्रधानमंत्री मोदी ने जो संस्कृत श्लोक पोस्ट किया, वह इस प्रकार है: 'पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा। प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥'
इस श्लोक का हिंदी भावार्थ यह है कि जो शासक अपनी प्रजा का उचित पालन-पोषण और रक्षा करता है, वही सच्चा सुख प्राप्त करता है — इसके अतिरिक्त किसी अन्य मार्ग से नहीं। जिस राजा की प्रजा प्रसन्न हो और जिसके राज्य में प्रकृति संतुलित एवं हितकारी हो, वह शासक सभी प्रकार की सिद्धियाँ एवं ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
ग्रंथ का परिचय: कामंदकीय नीतिसार
कामंदकीय नीतिसार एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है जिसमें आचार्य कामंदक ने राज्यशास्त्र, राजा के कर्तव्य (राजधर्म) और शासन-व्यवस्था के सिद्धांतों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। यह ग्रंथ चाणक्य के अर्थशास्त्र की परंपरा में आता है और भारतीय राजनीतिक चिंतन की अमूल्य धरोहर माना जाता है।
गौरतलब है कि इस ग्रंथ में शासक की सफलता को प्रजा-हित से अभिन्न रूप से जोड़ा गया है — यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।
श्लोक का गहरा अर्थ
इस श्लोक के माध्यम से दो प्रमुख संदेश उभरते हैं। पहला — लोक कल्याण: जो नेतृत्व निःस्वार्थ भाव से जन-कल्याण में समर्पित रहता है, वही राष्ट्र में समृद्धि, शांति और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करता है। दूसरा — प्रकृति संरक्षण: श्लोक में 'प्रकृति' शब्द का प्रयोग पर्यावरणीय संतुलन के संदर्भ में भी देखा जाता है, जो आज के युग में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
श्लोक में प्रयुक्त 'सर्वकामधुक्' शब्द अत्यंत अर्थगर्भित है — इसका तात्पर्य है कि ऐसा शासक 'कामधेनु' के समान है, जो अपनी प्रजा की सभी आकांक्षाओं को पूर्ण करने में सक्षम होता है।
सुशासन और जनसेवा का संदेश
इस सुभाषित के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी ने सुशासन की उस अवधारणा को रेखांकित किया है जिसमें राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता नागरिकों का कल्याण है। आचार्य कामंदक का यह विचार स्पष्ट करता है कि प्रजा की अनदेखी या उसका शोषण करके कोई भी शासक दीर्घकाल तक न सुखी रह सकता है, न ही सफल।
यह ऐसे समय में आया है जब सुशासन और जन-केंद्रित नीति-निर्माण को लेकर राष्ट्रीय विमर्श चल रहा है। प्रधानमंत्री का यह संदेश भारतीय शासन-परंपरा की समृद्ध विरासत को समकालीन संदर्भ से जोड़ने का प्रयास माना जा रहा है।