आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के धर्म-बयान पर नेताओं की प्रतिक्रिया, दिलीप घोष बोले — 'भ्रमित लोग खुद को सुधारें'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत द्वारा उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में धर्म को लेकर दिए गए बयान पर 19 सितंबर 2026 को विभिन्न दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। भागवत ने कहा था कि 'धर्म हमारे डीएनए में है' और यह अस्तित्व की शुरुआत से अंत तक बना रहता है।
दिलीप घोष की प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने भागवत के बयान का समर्थन करते हुए कहा, 'वे हिंदू समाज के मुखिया हैं, यह बोलने का उनको अधिकार है। उनका सुझाव सब मानते हैं। धर्म के आधार पर हमारा समाज हजारों वर्ष से चलता आ रहा है। जो लोग भ्रमित हैं, उन्हें खुद को सुधार लेना चाहिए।' घोष की यह टिप्पणी भागवत के संबोधन को व्यापक सामाजिक संदर्भ में उचित ठहराने की कोशिश मानी जा रही है।
रामकृपाल यादव का समर्थन
बिहार सरकार में मंत्री रामकृपाल यादव ने भी भागवत के विचारों से सहमति जताई। उन्होंने कहा, 'यह एक सच्चाई है। मोहन भागवत ने कहा है कि धर्म हमारे डीएनए में है और यह सच है। बिल्कुल। इस बात को कौन नहीं जानता? हर व्यक्ति, चाहे वह कोई भी हो, उसके डीएनए में धर्म होता है।' यादव ने इसे किसी एक समुदाय तक सीमित न रखकर सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया।
समाजवादी पार्टी की सशर्त प्रतिक्रिया
समाजवादी पार्टी (SP) के नेता आशुतोष वर्मा ने भागवत के कथन से आंशिक सहमति जताते हुए एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी। उन्होंने कहा, 'उन्होंने बिल्कुल सही कहा है। मैं समाजवादी पार्टी की ओर से कहना चाहता हूं कि राजनीति करना हमारा धर्म है, लेकिन हम धर्म की राजनीति नहीं करते हैं। इसलिए वे भी धर्म की राजनीति न करें।' वर्मा की यह टिप्पणी सीधे तौर पर RSS की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष सवाल उठाती है।
भागवत ने उज्जैन में क्या कहा था
उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा था कि जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन हम नित्य हैं और हमारा धर्म नित्य है। उन्होंने कहा था, 'यह धर्म कम से कम अस्तित्व की शुरुआत से लेकर अंत तक रहता है और सब कुछ उसी के अनुसार चलता है — आप इसमें विश्वास करें या न करें।' भागवत ने सूर्य का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी के न मानने से सूरज का उगना और डूबना नहीं रुकता।
युवाओं और धर्म पर भागवत का जोर
गौरतलब है कि भागवत ने युवा धर्म संसद के आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि आमतौर पर धर्म को 'बुढ़ापे की चीज' माना जाता है और गीता व रामायण को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाली किताबें समझा जाता है — लेकिन यह धारणा गलत है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब युवाओं में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर बहस तेज हो रही है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के आयोजन और बयान राजनीतिक ध्रुवीकरण को हवा दे सकते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा है। आगे देखना होगा कि यह बहस राष्ट्रीय विमर्श को किस दिशा में ले जाती है।