मुंबई साइबर क्राइम ब्रांच ने ₹1.07 करोड़ के फर्जी शेयर ट्रेडिंग घोटाले का भंडाफोड़ किया, 6 गिरफ्तार
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच ने 4 जुलाई 2026 को एक संगठित साइबर धोखाधड़ी गिरोह का पर्दाफाश किया, जो कथित तौर पर फर्जी ऑनलाइन शेयर ट्रेडिंग और आईपीओ निवेश योजनाओं के जरिए निवेशकों से ₹1,07,37,208 की ठगी करने में लिप्त था। इस कार्रवाई में 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है — 4 गुजरात के वडोदरा से और 2 मुंबई से।
मामला कैसे सामने आया
यह मामला तब उजागर हुआ जब मुंबई के एक 43 वर्षीय निवेश पेशेवर ने साइबर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जांचकर्ताओं के अनुसार, पीड़ित को व्हाट्सएप पर ऑनलाइन शेयर ट्रेडिंग का एक विज्ञापन मिला, जिसमें दिए गए लिंक पर क्लिक करने के बाद वे 'अर्जुन मेहता, कुआ सिक्योरिटीज, यूके' नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ दिए गए।
उस ग्रुप में कई सदस्य खुद को बाजार विशेषज्ञ बताकर नियमित रूप से शेयर बाजार की अपडेट, निवेश सलाह और असाधारण रूप से ऊँचे रिटर्न के दावे साझा करते थे। पुलिस के अनुसार, इसका एकमात्र उद्देश्य ग्रुप सदस्यों का विश्वास हासिल करना था।
धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली
साइबर पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने कथित तौर पर एक बहु-स्तरीय ठगी का जाल बिछाया था। पहले पीड़ित का विश्वास जीतने के बाद उन्हें एक फर्जी ट्रेडिंग एप्लिकेशन डाउनलोड करने और उस पर पंजीकरण करने के लिए राजी किया गया। इस एप्लिकेशन का इंटरफेस वास्तविक स्टॉक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म से काफी मिलता-जुलता था, जिससे पीड़ित को इसकी वैधता पर संदेह नहीं हुआ।
इसके बाद पीड़ित ने अपने बैंक खातों के साथ-साथ अपने परिवार के सदस्यों के खातों से भी कई किस्तों में आरोपियों द्वारा उपलब्ध कराए गए विभिन्न बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर किए। जांचकर्ताओं के अनुसार, धोखाधड़ी से प्राप्त धन को कई बैंक खातों के माध्यम से आगे स्थानांतरित किया गया ताकि उसके निशान को छिपाया जा सके।
गिरोह की संरचना
पुलिस ने बताया कि यह गिरोह एक सुनियोजित नेटवर्क के रूप में काम करता था, जिसमें अलग-अलग सदस्यों को स्पष्ट भूमिकाएं सौंपी गई थीं। जांचकर्ताओं के अनुसार, ऑपरेशन के पहले चरण में उन व्यक्तियों की पहचान करना शामिल था जो अपने बैंक खातों की जानकारी देने के इच्छुक थे। इसके बाद कथित तौर पर कंपनियों के नाम पर बचत खाते खोले गए, जिनका उपयोग धन के हस्तांतरण में किया गया। पुलिस का मानना है कि यह पूरी व्यवस्था संगठित साइबर धोखाधड़ी रैकेट का हिस्सा थी, जिसे जांच एजेंसियों की पकड़ से बचने के लिए तैयार किया गया था।
आगे की जांच
साइबर क्राइम ब्रांच अब आरोपियों से जुड़े वित्तीय लेनदेन की गहन जांच कर रही है और धोखाधड़ी से प्राप्त धन की आवाजाही का पता लगा रही है। जांचकर्ता यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या विभिन्न राज्यों में और भी निवेशक इसी तरह की कार्यप्रणाली का शिकार हुए हैं। गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में फर्जी निवेश योजनाओं के मामलों में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की जा रही है।