3 अगस्त 2026
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मुल्लापेरियार विवाद: एक राज्यपाल आर्लेकर, दो राज्य और दो विपरीत रुख — संवैधानिक पेचीदगी उजागर

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मुल्लापेरियार विवाद: एक राज्यपाल आर्लेकर, दो राज्य और दो विपरीत रुख — संवैधानिक पेचीदगी उजागर

सारांश

एक ही राज्यपाल, दो राज्य और दो बिल्कुल अलग रुख — मुल्लापेरियार विवाद ने 18 जून को एक अनोखी संवैधानिक स्थिति पैदा की, जब राज्यपाल आर्लेकर ने तमिलनाडु विधानसभा में वह नीति वक्तव्य पढ़ा जो सीधे केरल की माँग के विरुद्ध है — और वे दोनों राज्यों के संवैधानिक प्रमुख हैं।

मुख्य बातें

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने 18 जून 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके सरकार का नीतिगत अभिभाषण पढ़ा।
वक्तव्य में तमिलनाडु ने मुल्लापेरियार बांध को सुरक्षित बताया और केरल की नए बांध की माँग का विरोध दोहराया।
आर्लेकर इस समय केरल के राज्यपाल हैं और तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं।
केरल का दावा है कि 100 वर्ष से अधिक पुराने बांध की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ हैं और नया बांध ज़रूरी है।
विजय के नेतृत्व में नई टीवीके सरकार के बावजूद तमिलनाडु की मुल्लापेरियार नीति में कोई बदलाव नहीं।

तमिलनाडु विधानसभा में 18 जून 2026 को एक असाधारण संवैधानिक स्थिति तब सामने आई, जब केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर — जो इस समय तमिलनाडु के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं — ने नई टीवीके सरकार का नीतिगत अभिभाषण पढ़ा, जिसमें मुल्लापेरियार बांध पर तमिलनाडु के परंपरागत और कड़े रुख को दोहराया गया। यह वही रुख है जो केरल की आधिकारिक स्थिति से सीधे टकराता है — और यही विरोधाभास राजनीतिक व संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

क्या कहा नीति वक्तव्य में

तमिलनाडु सरकार के नीति वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि राज्य मुल्लापेरियार बांध को पूरी तरह सुरक्षित मानता है और केरल द्वारा नए बांध के निर्माण की किसी भी माँग का कानूनी तथा राजनीतिक स्तर पर विरोध जारी रखेगा। वक्तव्य में यह भी रेखांकित किया गया कि मौजूदा बांध को हटाकर नई संरचना बनाने के हर प्रयास का राज्य पुरज़ोर विरोध करेगा।

गौरतलब है कि विजय के नेतृत्व में सत्ता में आई नई टीवीके सरकार के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि तमिलनाडु में राजनीतिक नेतृत्व बदलने के बावजूद मुल्लापेरियार पर राज्य की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

केरल का पक्ष और विवाद की पृष्ठभूमि

केरल लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि 100 वर्ष से अधिक पुराने मुल्लापेरियार बांध की संरचनात्मक स्थिति को लेकर गंभीर सुरक्षा चिंताएँ हैं और बांध के निचले इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी की रक्षा के लिए एक नया बांध बनाया जाना आवश्यक है। दूसरी ओर, तमिलनाडु अपने दक्षिणी जिलों की जलापूर्ति के लिए इस बांध पर निर्भर है और इसे बदलने की किसी भी पहल को अपने जल अधिकारों पर आघात मानता है।

यह विवाद भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक है, जो दशकों से न्यायालयों और राजनीतिक मंचों पर जारी है।

संवैधानिक पेचीदगी: एक राज्यपाल, दो विपरीत पक्ष

इस घटनाक्रम की सबसे चर्चित परत संवैधानिक है। राज्यपाल आर्लेकर एक साथ दो पड़ोसी राज्यों — केरल और तमिलनाडु — के संवैधानिक प्रमुख हैं, और दोनों राज्यों की निर्वाचित सरकारें मुल्लापेरियार पर परस्पर विरोधी रुख रखती हैं।

संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यपाल का दायित्व निर्वाचित सरकार की नीतियों को विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करना है, न कि अपने व्यक्तिगत विचार व्यक्त करना। इसलिए तकनीकी रूप से आर्लेकर ने संवैधानिक मर्यादा का पालन किया। फिर भी, राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि एक ही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से दो परस्पर विरोधी राज्य-नीतियों का प्रतिनिधित्व करने की स्थिति में कैसे है।

आगे क्या

केरल के लिए यह घटनाक्रम एक स्पष्ट संकेत है कि मुल्लापेरियार पर भविष्य की किसी भी कानूनी या राजनीतिक पहल का सामना तमिलनाडु के एकजुट और अडिग रुख से करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा निकट भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय में एक बार फिर केंद्र में आ सकता है। दोनों राज्यों के बीच इस विवाद का दीर्घकालिक समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायिक हस्तक्षेप, दोनों की माँग करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो संवैधानिक तटस्थता का सिद्धांत व्यावहारिक तनाव में आ जाता है। यह महज़ एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसी मिसाल है जो भविष्य में अन्य अंतरराज्यीय विवादों में भी दोहराई जा सकती है। मुख्यधारा की कवरेज इस घटना को 'अनोखी' कहकर आगे बढ़ जाती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार को ऐसी स्थितियों से बचने के लिए स्पष्ट संवैधानिक दिशानिर्देश तय करने चाहिए।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुल्लापेरियार बांध विवाद क्या है?
मुल्लापेरियार बांध केरल में स्थित है लेकिन इसका संचालन तमिलनाडु करता है। तमिलनाडु इसे अपने दक्षिणी जिलों की जलापूर्ति के लिए ज़रूरी मानता है, जबकि केरल का कहना है कि 100 वर्ष से अधिक पुराने इस बांध की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ हैं और नया बांध बनाया जाना चाहिए।
18 जून को तमिलनाडु विधानसभा में क्या हुआ?
राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके सरकार का नीतिगत अभिभाषण पढ़ा, जिसमें मुल्लापेरियार बांध को सुरक्षित बताया गया और केरल की नए बांध की माँग का विरोध दोहराया गया। आर्लेकर इस समय केरल के राज्यपाल हैं और तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं।
इस स्थिति में संवैधानिक पेचीदगी क्या है?
संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यपाल निर्वाचित सरकार की नीतियाँ पढ़ता है, अपनी राय नहीं। लेकिन जब एक ही राज्यपाल दो ऐसे राज्यों का प्रमुख हो जो एक ही विवाद पर परस्पर विरोधी रुख रखते हों, तो यह संवैधानिक तटस्थता पर व्यावहारिक सवाल खड़े करता है।
क्या टीवीके सरकार के आने से मुल्लापेरियार पर तमिलनाडु का रुख बदला?
नहीं। विजय के नेतृत्व में नई टीवीके सरकार के नीति वक्तव्य से स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व बदलने के बावजूद मुल्लापेरियार बांध पर तमिलनाडु की परंपरागत नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।
आगे इस विवाद में क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार केरल के लिए मुल्लापेरियार पर किसी भी कानूनी या राजनीतिक पहल का सामना तमिलनाडु के एकजुट रुख से करना होगा। यह मुद्दा भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय में फिर से केंद्र में आ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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