मुल्लापेरियार विवाद: एक राज्यपाल आर्लेकर, दो राज्य और दो विपरीत रुख — संवैधानिक पेचीदगी उजागर
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु विधानसभा में 18 जून 2026 को एक असाधारण संवैधानिक स्थिति तब सामने आई, जब केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर — जो इस समय तमिलनाडु के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं — ने नई टीवीके सरकार का नीतिगत अभिभाषण पढ़ा, जिसमें मुल्लापेरियार बांध पर तमिलनाडु के परंपरागत और कड़े रुख को दोहराया गया। यह वही रुख है जो केरल की आधिकारिक स्थिति से सीधे टकराता है — और यही विरोधाभास राजनीतिक व संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
क्या कहा नीति वक्तव्य में
तमिलनाडु सरकार के नीति वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि राज्य मुल्लापेरियार बांध को पूरी तरह सुरक्षित मानता है और केरल द्वारा नए बांध के निर्माण की किसी भी माँग का कानूनी तथा राजनीतिक स्तर पर विरोध जारी रखेगा। वक्तव्य में यह भी रेखांकित किया गया कि मौजूदा बांध को हटाकर नई संरचना बनाने के हर प्रयास का राज्य पुरज़ोर विरोध करेगा।
गौरतलब है कि विजय के नेतृत्व में सत्ता में आई नई टीवीके सरकार के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि तमिलनाडु में राजनीतिक नेतृत्व बदलने के बावजूद मुल्लापेरियार पर राज्य की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।
केरल का पक्ष और विवाद की पृष्ठभूमि
केरल लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि 100 वर्ष से अधिक पुराने मुल्लापेरियार बांध की संरचनात्मक स्थिति को लेकर गंभीर सुरक्षा चिंताएँ हैं और बांध के निचले इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी की रक्षा के लिए एक नया बांध बनाया जाना आवश्यक है। दूसरी ओर, तमिलनाडु अपने दक्षिणी जिलों की जलापूर्ति के लिए इस बांध पर निर्भर है और इसे बदलने की किसी भी पहल को अपने जल अधिकारों पर आघात मानता है।
यह विवाद भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक है, जो दशकों से न्यायालयों और राजनीतिक मंचों पर जारी है।
संवैधानिक पेचीदगी: एक राज्यपाल, दो विपरीत पक्ष
इस घटनाक्रम की सबसे चर्चित परत संवैधानिक है। राज्यपाल आर्लेकर एक साथ दो पड़ोसी राज्यों — केरल और तमिलनाडु — के संवैधानिक प्रमुख हैं, और दोनों राज्यों की निर्वाचित सरकारें मुल्लापेरियार पर परस्पर विरोधी रुख रखती हैं।
संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यपाल का दायित्व निर्वाचित सरकार की नीतियों को विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करना है, न कि अपने व्यक्तिगत विचार व्यक्त करना। इसलिए तकनीकी रूप से आर्लेकर ने संवैधानिक मर्यादा का पालन किया। फिर भी, राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि एक ही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से दो परस्पर विरोधी राज्य-नीतियों का प्रतिनिधित्व करने की स्थिति में कैसे है।
आगे क्या
केरल के लिए यह घटनाक्रम एक स्पष्ट संकेत है कि मुल्लापेरियार पर भविष्य की किसी भी कानूनी या राजनीतिक पहल का सामना तमिलनाडु के एकजुट और अडिग रुख से करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा निकट भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय में एक बार फिर केंद्र में आ सकता है। दोनों राज्यों के बीच इस विवाद का दीर्घकालिक समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायिक हस्तक्षेप, दोनों की माँग करता है।