ऑपरेशन सिंदूर के एक साल: भारतीय सेना के 'ड्रोन वॉरियर' तैयार, हर फॉर्मेशन में अश्नि प्लाटून तैनात

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ऑपरेशन सिंदूर के एक साल: भारतीय सेना के 'ड्रोन वॉरियर' तैयार, हर फॉर्मेशन में अश्नि प्लाटून तैनात

सारांश

ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना को ड्रोन युद्ध का असली पाठ पढ़ाया — और सेना ने एक साल में ही जवाब दिया। हर इन्फैंट्री बटालियन में अश्नि प्लाटून तैनात, 'ईगल इन द आर्म' कॉन्सेप्ट लागू, और 2027 तक 100% जवानों को ड्रोन विशेषज्ञ बनाने का संकल्प — यह बदलाव महज़ तकनीकी नहीं, रणनीतिक है।

मुख्य बातें

ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगाँठ से पहले भारतीय सेना ने इन्फैंट्री बटालियन के हर जवान को ड्रोन की बेसिक ट्रेनिंग दे दी है।
थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी द्वारा घोषित अश्नि प्लाटून गठित होकर तैनात हो चुकी है।
फॉर्मेशन स्तर पर हर बैच में 20 से 25 सैनिकों को 2 से 3 सप्ताह की स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग दी जा रही है।
IMA देहरादून , इन्फैंट्री स्कूल महू और OTA चेन्नई में ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर स्थापित किए जा चुके हैं।
सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक इन्फैंट्री यूनिट के 100% जवान ड्रोन संचालन में पूरी तरह दक्ष हों।
ड्रोन संचालन के साथ-साथ काउंटर-ड्रोन प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिससे लेयर्ड डिफेंस सिस्टम तैयार हो रहा है।

भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगाँठ से पहले आधुनिक युद्ध के सबसे निर्णायक हथियार — ड्रोन — पर व्यापक महारत हासिल कर ली है। थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी द्वारा कारगिल विजय दिवस पर घोषित 'अश्नि प्लाटून' अब न केवल गठित हो चुकी है, बल्कि उसकी तैनाती भी पूरी कर दी गई है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, इन्फैंट्री बटालियन के हर जवान को ड्रोन की बेसिक ट्रेनिंग दी जा चुकी है और अब स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग का दूसरा चरण जारी है।

प्रशिक्षण का ढाँचा: दो चरणों में तैयारी

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, ड्रोन प्रशिक्षण का पहला चरण यूनिट स्तर पर पूरा किया जा चुका है, जिसमें इन्फैंट्री बटालियन के प्रत्येक जवान को बेसिक ड्रोन ऑपरेशन सिखाया गया। इस चरण में सैनिकों को पहले सिम्युलेटर पर 15 से 20 घंटे तक ड्रोन संचालन का अभ्यास कराया जाता है, इसके बाद फील्ड ट्रेनिंग में वास्तविक परिस्थितियों में बाधाओं को पार करने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

दूसरे चरण में फॉर्मेशन स्तर पर स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग सेंटर में हर बैच के 20 से 25 सैनिकों को 2 से 3 सप्ताह तक गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। बेसिक ट्रेनिंग में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले सैनिकों को इस एडवांस ट्रेनिंग के लिए चुना जाता है। भारतीय सेना अपने फॉर्मेशन के अलावा अन्य सेवाओं के जवानों को भी यह प्रशिक्षण दे रही है।

किन ड्रोन पर दी जा रही है ट्रेनिंग

प्रशिक्षण कार्यक्रम में सर्विलांस ड्रोन, फर्स्ट पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन, आर्म्ड ड्रोन और लॉजिस्टिक ड्रोन शामिल हैं। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, सैनिकों को उनके कार्य के अनुसार — कॉम्बैट, सर्विलांस, लॉजिस्टिक्स और मेडिकल इवैक्यूएशन — ड्रोन उपयोग के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। ड्रोन संचालन के साथ-साथ दुश्मन के ड्रोन को काउंटर करने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है, जिससे एक लेयर्ड सिस्टम तैयार किया जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक

गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने न केवल ड्रोन का सफल उपयोग किया, बल्कि पाकिस्तान के ड्रोन को भी मार गिराया। यह ऑपरेशन इस बात का प्रमाण बना कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन क्षमता निर्णायक भूमिका निभाती है। इसी अनुभव ने सेना को तेज़ी से अपनी ड्रोन रणनीति को संस्थागत रूप देने के लिए प्रेरित किया।

ईगल इन द आर्म: सेना का ड्रोन दर्शन

भारतीय सेना के इस ड्रोन कॉन्सेप्ट को 'ईगल इन द आर्म' नाम दिया गया है। इसका मूल उद्देश्य है कि जिस तरह जवान अपने हथियार को हमेशा अपने साथ रखते हैं और उसे कुशलता से ऑपरेट करते हैं, उसी तरह वे ड्रोन का भी प्रभावी उपयोग कर सकें। इन्फैंट्री की हर बटालियन में एक ड्रोन प्लाटून (अश्नि प्लाटून) स्थापित की गई है। सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक इन्फैंट्री यूनिट के 100 प्रतिशत जवान ड्रोन संचालन में दक्ष हो जाएँ।

प्रशिक्षण केंद्र और अधोसंरचना

ड्रोन ट्रेनिंग नोड्स की संख्या बढ़ाई जा रही है और नए ट्रेनिंग सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), महू का इन्फैंट्री स्कूल और चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में ये केंद्र पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं। जवानों के साथ-साथ यूनिट के अधिकारियों को भी ड्रोन ऑपरेशन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सेना ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम की खरीद और तैनाती भी लगातार बढ़ा रही है। यह पूरी तैयारी इस बात का संकेत है कि भारतीय सेना भविष्य के युद्धक्षेत्र के लिए खुद को नए सिरे से ढाल रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर इसकी वास्तविक परीक्षा सीमा पर होगी, प्रशिक्षण केंद्रों में नहीं।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने ड्रोन के क्षेत्र में क्या बदलाव किए?
ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव के बाद भारतीय सेना ने इन्फैंट्री बटालियन के हर जवान को बेसिक ड्रोन ट्रेनिंग दी और हर बटालियन में अश्नि प्लाटून स्थापित की। साथ ही IMA देहरादून, इन्फैंट्री स्कूल महू और OTA चेन्नई में ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर भी बनाए गए हैं।
अश्नि प्लाटून क्या है और इसे किसने घोषित किया?
अश्नि प्लाटून भारतीय सेना की इन्फैंट्री बटालियनों में स्थापित विशेष ड्रोन प्लाटून है, जिसकी घोषणा थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर की थी। यह प्लाटून अब पूरी तरह गठित होकर तैनात हो चुकी है।
भारतीय सेना का 'ईगल इन द आर्म' ड्रोन कॉन्सेप्ट क्या है?
'ईगल इन द आर्म' भारतीय सेना का ड्रोन दर्शन है जिसके तहत हर सैनिक को ड्रोन को अपने निजी हथियार की तरह संचालित करने में दक्ष बनाया जाएगा। इसका लक्ष्य है कि 2027 तक इन्फैंट्री यूनिट के 100 प्रतिशत जवान ड्रोन ऑपरेशन में पूरी तरह माहिर हो जाएँ।
भारतीय सेना की ड्रोन ट्रेनिंग में क्या-क्या शामिल है?
ड्रोन ट्रेनिंग में सर्विलांस ड्रोन, FPV ड्रोन, आर्म्ड ड्रोन और लॉजिस्टिक ड्रोन का संचालन शामिल है। इसके अलावा कॉम्बैट, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल इवैक्यूएशन और काउंटर-ड्रोन ऑपरेशन की भी ट्रेनिंग दी जा रही है।
भारतीय सेना 2027 तक ड्रोन के मामले में क्या हासिल करना चाहती है?
सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक इन्फैंट्री यूनिट के 100 प्रतिशत जवान ड्रोन संचालन में दक्ष हों और हर फॉर्मेशन में ड्रोन व काउंटर-ड्रोन विशेषज्ञ मौजूद हों। इसके लिए ड्रोन ट्रेनिंग नोड्स की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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