कमजोर टैक्स प्रणाली के कारण आईएमएफ से एक अरब डॉलर की किस्त पर पाकिस्तान की बातचीत बाधित
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान और आईएमएफ के बीच बातचीत ठप हुई।
- टैक्स कलेक्शन में कमी और बजट की विश्वसनीयता पर सवाल।
- पाकिस्तान का टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात सबसे कम है।
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कर प्रणाली से बाहर है।
- सर्कुलर डेब्ट बिजली क्षेत्र में एक गंभीर समस्या है।
नई दिल्ली, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बीच एक अरब डॉलर की किस्त जारी करने की बातचीत फिर से ठप हो गई है। सूत्रों के अनुसार, इसका कारण मौजूदा बजट की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल और टैक्स कलेक्शन में कमी है।
कराची के 'बिजनेस रिकॉर्डर' के अनुसार, आईएमएफ ने पाकिस्तान के टैक्स सिस्टम को लेकर फिर से सवाल उठाए हैं। आईएमएफ का कहना है कि राजस्व लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल लग रहा है।
लेख में कहा गया है, “यह चिंता बिल्कुल उचित है। पाकिस्तान की कर प्रणाली लंबे समय से कमजोर प्रदर्शन कर रही है। देश का टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात 9-10 प्रतिशत के आसपास है, जो अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे कम है। कर दायरा सीमित है, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था काफी बड़ी है और कर अनुपालन भी कमजोर है।”
हर आईएमएफ कार्यक्रम में पाकिस्तान से कर प्रशासन सुधारने, कर आधार बढ़ाने और राजस्व लक्ष्य बढ़ाने की मांग की जाती रही है, लेकिन इसके बावजूद परिणाम सीमित रहे हैं।
औपचारिक क्षेत्र अभी भी कर का अधिकांश बोझ उठाता है, जबकि संपत्ति के बड़े हिस्से, खासकर खुदरा कारोबार, कृषि और अन्य क्षेत्रों पर बहुत कम कर लगता है या वे पूरी तरह से व्यवस्था से बाहर हैं।
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जिसे अक्सर जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत माना जाता है, काफी हद तक कर प्रणाली से बाहर है।
जैसा कि लेख में उल्लेख किया गया है, पाकिस्तान की वित्तीय समस्या केवल इतनी नहीं है कि सरकार बहुत कम राजस्व जुटाती है। एक बड़ी समस्या यह भी है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भारी वित्तीय घाटा जारी है और इस पर निर्णायक सुधार नहीं हो पाए हैं।
इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों से होने वाला निरंतर नुकसान है। पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) और पाकिस्तान स्टील मिल्स जैसी संस्थाओं ने वर्षों में भारी घाटा जमा किया है। इनकी देनदारियों का बोझ राष्ट्रीय खजाने पर पड़ता है, जिसे सब्सिडी, गारंटी और कर्ज पुनर्गठन के माध्यम से वहन किया जाता है।
ये संस्थान मुख्य रूप से इसलिए जीवित हैं क्योंकि सरकारें इनके पुनर्गठन या निजीकरण से जुड़े राजनीतिक जोखिमों का सामना करने से हिचकिचाती हैं। फिर भी, इनके वित्तीय नुकसान हर साल सैकड़ों अरब रुपए तक पहुंच जाते हैं, जो चुपचाप सार्वजनिक संसाधनों को खत्म करते रहते हैं।
लेख के अनुसार, अजीब बात यह है कि जहां आईएमएफ कार्यक्रम राजस्व लक्ष्यों पर जोर देते हैं, वहीं सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार की तत्काल आवश्यकता उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती। निजीकरण की योजनाएं धीमी गति से आगे बढ़ती हैं, पुनर्गठन की समय-सीमा बार-बार टलती है और घाटे में चल रही संस्थाओं को सरकारी वित्तीय सहायता मिलती रहती है।
पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र में एक और बड़ा वित्तीय संकट मौजूद है। देश का सर्कुलर डेब्ट (बिजली व्यवस्था में बकाया भुगतान की जटिल श्रृंखला) कई लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
आईएमएफ अक्सर इस वित्तीय अंतर को कम करने के लिए बिजली दरें बढ़ाने पर जोर देता रहा है। लेकिन केवल दरें बढ़ाने से उस प्रणाली की समस्या हल नहीं होगी जो अक्षमता और कमजोर प्रशासन से ग्रस्त है। बिजली वितरण कंपनियों के गहरे पुनर्गठन और बेहतर प्रबंधन के बिना यह सर्कुलर डेब्ट फिर से बढ़ जाता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि एक अन्य पहलू जिस पर लगातार पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, वह है गैर-उत्पादक या अत्यधिक सार्वजनिक खर्च। केंद्र और प्रांतीय बजटों में अब भी भारी प्रशासनिक खर्च, गलत तरीके से दी जा रही सब्सिडी और राजनीतिक कारणों से शुरू की गई विकास योजनाएं शामिल हैं, जिनका आर्थिक लाभ सीमित होता है।
लेख के अनुसार, वित्तीय अनुशासन केवल अधिक राजस्व जुटाने से हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि सार्वजनिक धन कैसे खर्च किया जा रहा है, इसकी गंभीर समीक्षा की जाए।