26 जुलाई 2026
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पश्चिम बंगाल पंचायत संशोधन विधेयक 2026 पारित: 169 के मुकाबले 13 वोट, TMC के भीतर भी विरोध

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पश्चिम बंगाल पंचायत संशोधन विधेयक 2026 पारित: 169 के मुकाबले 13 वोट, TMC के भीतर भी विरोध

सारांश

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 25 जुलाई को पंचायत संशोधन विधेयक 169-13 से पारित किया। खास बात यह है कि विरोध के 9 वोट खुद TMC के भीतर से आए। विधेयक पंचायत प्रमुखों की बिल स्वीकृति शक्ति नौकरशाहों को सौंपता है — भ्रष्टाचार रोकने का दावा, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण पर सवाल।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल पंचायत (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026 को 25 जुलाई 2026 को विधानसभा में 169-13 के मत से पारित किया गया।
विरोध के 13 वोटों में से 9 वोट सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक अल्पसंख्यक गुट के विधायकों के थे।
विधेयक पंचायत के तीनों स्तरों पर निर्वाचित प्रमुखों के बिल स्वीकृति और हस्ताक्षर अधिकार सीमित कर नौकरशाहों को सौंपता है।
मंत्री दिलीप घोष ने कहा कि लक्ष्य भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर अंकुश लगाना है, संवैधानिक अधिकार नहीं छीनना।
विधेयक 23 जुलाई 2026 को कोलकाता गजट में प्रकाशित हो चुका था; अब राज्यपाल की मंजूरी शेष है।
मतदान के दौरान 32 विधायक अनुपस्थित रहे।

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 25 जुलाई 2026 को पश्चिम बंगाल पंचायत (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026 को भारी बहुमत से पारित कर दिया। पक्ष में 169 वोट पड़े, जबकि विरोध में मात्र 13 वोट पड़े। यह विधेयक पश्चिम बंगाल पंचायत अधिनियम, 1973 के प्रमुख प्रावधानों में संशोधन करता है और ग्राम पंचायत से लेकर जिला परिषद तक — तीनों स्तरों पर — निर्वाचित प्रमुखों के बिल स्वीकृति एवं हस्ताक्षर के अधिकारों को काफी हद तक सीमित करता है।

मतदान का विवरण और विरोधी खेमा

विरोध में पड़े 13 वोटों में से 9 वोट पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक 'मूल लेकिन अल्पसंख्यक' गुट के विधायकों के थे — जो सत्तारूढ़ दल के भीतर ही असंतोष का संकेत है। इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के दो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एक और अखिल भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (AISF) के एक विधायक ने भी विरोध दर्ज कराया। मतदान के दौरान कुल 32 विधायक अनुपस्थित रहे।

विधेयक में क्या बदला

नए प्रावधानों के अनुसार, निर्वाचित पंचायत प्रमुख किसी भी प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार बनाए रखेंगे, परंतु उन प्रस्तावों की अंतिम स्वीकृति और अनुमोदन अब नौकरशाहों — यानी सरकारी अधिकारियों — द्वारा किया जाएगा। पंचायत कार्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव निर्वाचित प्रतिनिधियों के संवैधानिक अधिकारों को नहीं छीनता, बल्कि ग्रामीण नागरिक सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर अंकुश लगाने के लिए है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं के लिए स्वीकृत धन का उपयोग केवल उसी निर्धारित उद्देश्य के लिए हो — यह सुनिश्चित करना इस विधेयक का मूल लक्ष्य है। उल्लेखनीय है कि यह विधेयक 23 जुलाई 2026 को कोलकाता गजट में प्रकाशित हो चुका था।

सरकार का तर्क और विपक्ष पर निशाना

उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने बहस में भाग लेते हुए TMC के पिछले 15 वर्षों के शासन पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी की सरकार के कार्यकाल में सहभागी पंचायत प्रणाली की जगह एक 'वंशानुगत पंचायत प्रणाली' पनपी, जिसमें भ्रष्ट पंचायत प्रमुखों ने अपने कार्यालय आना बंद कर दिया और सार्वजनिक सेवाएँ बाधित होती रहीं। उनके अनुसार, यह विधेयक उसी टूटी हुई व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रयास है।

आम जनता पर असर

यह संशोधन पश्चिम बंगाल के लाखों ग्रामीण नागरिकों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगा, जो अपनी बुनियादी सेवाओं — सड़क, पानी, स्वच्छता और सरकारी योजनाओं के लाभ — के लिए पंचायत व्यवस्था पर निर्भर हैं। समर्थकों का तर्क है कि नौकरशाही अनुमोदन से धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी। आलोचकों का कहना है कि इससे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की वास्तविक शक्ति कम होगी और जवाबदेही का केंद्र मतदाताओं से हटकर नियुक्त अधिकारियों की ओर खिसक जाएगा।

आगे क्या

विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। TMC के भीतर से उठे विरोध के स्वर और विपक्षी दलों की आपत्तियों को देखते हुए इस विधेयक के क्रियान्वयन पर राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर नज़र बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन TMC के भीतर से उठे 9 विरोधी वोट बताते हैं कि सत्तारूढ़ दल में इस विधेयक को लेकर असहजता है। असली सवाल यह है कि पंचायत प्रमुखों की स्वीकृति-शक्ति नौकरशाहों को सौंपना भ्रष्टाचार का समाधान है या लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की भावना के विरुद्ध एक केंद्रीकरण का कदम — क्योंकि 73वाँ संविधान संशोधन ठीक इसी विकेंद्रीकरण की गारंटी देने के लिए लाया गया था। यदि नौकरशाही अनुमोदन ही भ्रष्टाचार की काट होती, तो राज्य के पिछले डेढ़ दशक में यह व्यवस्था पहले से लागू की जा सकती थी। क्रियान्वयन की जवाबदेही तय किए बिना यह संशोधन एक समस्या को दूसरी समस्या से बदलने का जोखिम उठाता है।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल पंचायत (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026 क्या है?
यह विधेयक पश्चिम बंगाल पंचायत अधिनियम, 1973 में संशोधन करता है और पंचायत के तीनों स्तरों — ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद — के निर्वाचित प्रमुखों के बिल स्वीकृति एवं हस्ताक्षर के अधिकार सीमित करता है। अब प्रस्तावों की अंतिम स्वीकृति नौकरशाहों द्वारा दी जाएगी।
विधेयक के पक्ष और विपक्ष में कितने वोट पड़े?
25 जुलाई 2026 को हुए मतदान में 169 विधायकों ने पक्ष में और 13 ने विरोध में वोट दिया। 32 विधायक अनुपस्थित रहे।
TMC के विधायकों ने अपनी ही सरकार के विधेयक का विरोध क्यों किया?
TMC के एक 'मूल लेकिन अल्पसंख्यक' गुट के 9 विधायकों ने विधेयक के विरोध में वोट दिया। हालाँकि उनके विरोध के विशिष्ट कारण सार्वजनिक रूप से विस्तार से सामने नहीं आए हैं, यह पार्टी के भीतर पंचायत शक्तियों के केंद्रीकरण को लेकर असंतोष का संकेत माना जा रहा है।
इस विधेयक से ग्रामीण नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा?
सरकार का दावा है कि नौकरशाही अनुमोदन से सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रुकेगा और सेवाएँ बाधारहित होंगी। आलोचकों का कहना है कि इससे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की प्रभावी शक्ति कम होगी और ग्रामीण जनता के प्रति जवाबदेही कमज़ोर पड़ सकती है।
विधेयक अब आगे किस प्रक्रिया से गुज़रेगा?
विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून का रूप लेगा। विधेयक 23 जुलाई 2026 को कोलकाता गजट में पहले ही प्रकाशित किया जा चुका है।
राष्ट्र प्रेस
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