21 जुलाई 2026
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पश्चिम बंगाल में पंचायत प्रमुखों की 'हस्ताक्षर शक्ति' होगी समाप्त, दो हफ्तों में आएगा नया बिल

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पश्चिम बंगाल में पंचायत प्रमुखों की 'हस्ताक्षर शक्ति' होगी समाप्त, दो हफ्तों में आएगा नया बिल

सारांश

पश्चिम बंगाल में TMC की चुनावी हार के बाद पंचायत प्रमुखों के गायब होने से ग्रामीण सेवाएँ ठप हैं। अब सरकार दो हफ्तों में नया विधेयक लाकर उनकी 'हस्ताक्षर शक्ति' सरकारी अधिकारियों को सौंपने जा रही है — यह निर्वाचित स्वायत्तता और सेवा-वितरण के बीच सीधी टकराहट है।

मुख्य बातें

पंचायत मामलों के मंत्री दिलीप घोष ने 20 जुलाई 2026 को विधानसभा में घोषणा की कि दो हफ्तों के भीतर नया विधेयक पेश होगा।
विधेयक पास होने के बाद पंचायत प्रमुख फंड मंजूरी के लिए 'हस्ताक्षर अधिकारी' नहीं रहेंगे — यह शक्ति सरकारी अधिकारियों को दी जाएगी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में TMC की हार के बाद कई पंचायत प्रमुख गायब हैं या संपर्क से बाहर हैं, जिससे ग्रामीण सेवाएँ प्रभावित हैं।
तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था के अगले चुनाव 2028 में होने हैं, इसलिए यह अंतरिम व्यवस्था आवश्यक बताई जा रही है।
विपक्षी विधायकों सबीना यास्मीन , समीर जाना और बीना मंडल ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की शक्तियाँ कम करने पर सवाल उठाए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 20 जुलाई 2026 को विधानसभा में घोषणा की कि जल्द ही एक नया विधेयक पेश किया जाएगा, जिसके तहत राज्य के ग्राम पंचायत प्रमुखों की 'हस्ताक्षर अधिकारी' (साइनेटरी अथॉरिटी) के रूप में शक्तियाँ समाप्त कर दी जाएंगी और यह अधिकार सरकारी अधिकारियों को सौंपे जाएंगे। पंचायत मामलों और ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष ने बजट सत्र के विस्तार के पहले दिन यह जानकारी सदन को दी।

नए विधेयक में क्या बदलेगा

प्रस्तावित विधेयक के पास होने के बाद पंचायत से जुड़े कार्यों के लिए फंड मंजूरी का अधिकार चुने हुए पंचायत प्रमुखों के हाथ से निकलकर सरकारी अधिकारियों के पास चला जाएगा। मंत्री घोष ने कहा कि यह विधेयक अगले दो हफ्तों के भीतर विधानसभा में पेश किया जाएगा। अभी तक तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था में चुने हुए प्रमुख ही ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए वित्तीय स्वीकृति पर हस्ताक्षर करने के अधिकारी होते थे।

पंचायत प्रमुखों के गायब होने से उत्पन्न संकट

यह ऐसे समय में आया है जब हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की भारी हार के बाद से राज्य में कई पंचायत प्रमुख या तो गायब हो गए हैं या उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। गौरतलब है कि राज्य की तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था की अधिकांश चुनी हुई संस्थाओं पर अभी भी तृणमूल कांग्रेस का नियंत्रण है। इन प्रमुखों की अनुपस्थिति के कारण जरूरी जन-सेवा कार्यों के लिए अहम मंजूरी मिलने में गंभीर बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं।

सरकार की दलील और मंत्री की चेतावनी

मंत्री दिलीप घोष ने विपक्षी विधायकों सबीना यास्मीन, समीर जाना और बीना मंडल द्वारा इस कदम पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि आम लोगों को सेवाएँ देना चुने हुए पंचायत प्रमुखों का संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा, 'या तो कार्यालय आकर जिम्मेदारियाँ निभाएं या इस्तीफा दें। अगर दोनों में से कुछ नहीं करते, तो उन्हें गिरफ्तार कर कार्यालय लाने और हस्ताक्षर करवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।' उन्होंने स्पष्ट किया कि लोगों को सेवाओं से वंचित नहीं रखा जा सकता।

2028 के चुनावों तक की व्यवस्था

तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था के लिए अगले चुनाव 2028 में होने हैं। इस दीर्घ अंतराल को देखते हुए सरकार ने ग्रामीण नागरिक सेवाओं को सुचारू रखने के लिए हस्ताक्षर अधिकार सरकारी अधिकारियों को सौंपने का निर्णय जरूरी बताया है। आलोचकों का कहना है कि यह कदम निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वायत्तता को कमजोर करता है, जबकि सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था सेवा-वितरण सुनिश्चित करने के लिए अपरिहार्य है।

आगे क्या होगा

विधेयक के विधानसभा में पेश होने के बाद इस पर विस्तृत बहस की संभावना है। यदि यह पारित हो जाता है, तो राज्य की पंचायत व्यवस्था में सत्ता का केंद्रीकरण एक नए दौर में प्रवेश करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम TMC के पंचायत-स्तरीय प्रभाव को कमजोर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पुनर्गठन है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका समाधान निर्वाचित अधिकारों को छीनना है या उन्हें जवाबदेह बनाना — यह बहस अभी अनुत्तरित है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल का नया पंचायत विधेयक क्या है?
यह एक प्रस्तावित कानून है जो पंचायत प्रमुखों से 'हस्ताक्षर अधिकारी' का दर्जा छीनकर सरकारी अधिकारियों को सौंपेगा। इससे फंड मंजूरी और ग्रामीण विकास कार्यों की स्वीकृति के लिए चुने हुए पंचायत प्रमुखों की जरूरत नहीं रहेगी।
यह विधेयक कब पेश होगा?
मंत्री दिलीप घोष ने 20 जुलाई 2026 को विधानसभा में बताया कि विधेयक अगले दो हफ्तों के भीतर पेश किया जाएगा।
पंचायत प्रमुखों की शक्तियाँ क्यों कम की जा रही हैं?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में TMC की हार के बाद कई पंचायत प्रमुख गायब हो गए हैं या संपर्क से बाहर हैं, जिससे ग्रामीण सेवाओं के लिए जरूरी मंजूरी नहीं मिल पा रही। 2028 तक पंचायत चुनाव नहीं हैं, इसलिए सरकार ने यह कदम उठाना जरूरी समझा।
इस बदलाव से आम नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा?
सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण सेवाएँ बाधित नहीं होंगी और फंड मंजूरी तेज होगी। हालाँकि आलोचकों का कहना है कि इससे निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर होगा।
विपक्ष ने इस पर क्या कहा?
विपक्षी विधायकों सबीना यास्मीन, समीर जाना और बीना मंडल ने निर्वाचित पंचायत प्रमुखों की शक्तियाँ कम करने पर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि यह लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की भावना के विरुद्ध है।
राष्ट्र प्रेस
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