पशुपति सील विवाद: ऑड्रे ट्रुश्के के दावे पर अयोध्या के संत नाराज, अमेरिका से मांगी माफी
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के द्वारा हड़प्पाकालीन 4,300 वर्ष पुरानी 'पशुपति सील' की पहचान पर उठाए गए सवालों के बाद अयोध्या के साधु-संतों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संतों ने इसे भारतीय सनातन संस्कृति के विरुद्ध भ्रामक प्रचार करार देते हुए अमेरिका से सार्वजनिक माफी की माँग की है।
साधु-संतों की प्रतिक्रिया
महंत देवेशाचार्य महाराज ने कहा, 'अमेरिका के नेताओं और लोगों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। हाल ही में अमेरिका ने भारत के ब्राह्मणों और स्वयं भारत के बारे में कुछ टिप्पणियाँ की थीं। इसी तरह, एक बार फिर वह भारत की छवि को धूमिल करने और यहाँ की संस्कृति व परंपराओं पर कलंक लगाने के लिए गलत दुष्प्रचार करने की कोशिश कर रहा है। यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। हम सभी इसका विरोध करते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी देश इस प्रकार दूसरे देश के विरुद्ध भ्रामक प्रचार नहीं कर सकता और अमेरिका को इतिहासकार ट्रुश्के के इस कृत्य के लिए माफी माँगनी चाहिए।
महंत सीताराम दास की तीखी आपत्ति
अयोध्या धाम के महंत सीताराम दास ने कहा, 'अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के का बयान अत्यंत निंदनीय है। अगर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ भारत के इतिहास को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगी, तो इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यहाँ तक कि उनका अपना इतिहास भी भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़ा हुआ है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि यह 'पशुपति सील' ही है, इसमें कोई संदेह नहीं, और जिसे सनातन संस्कृति का ज्ञान नहीं, वह इसके बारे में कुछ नहीं बता सकता।
आर्य संत वरुण दास का ऐतिहासिक खंडन
आर्य संत वरुण दास जी महाराज ने ट्रुश्के के उस दावे को सिरे से नकारा जिसमें उन्होंने सील को प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ा था। उन्होंने कहा, 'ऑड्रे ट्रुश्के का यह कहना कि सील प्रोटो-एलामाइट सभ्यता का है, बिल्कुल गलत और भ्रामक है। क्योंकि वह सभ्यता 2700 ईसा पूर्व से 3200 ईसा पूर्व के बीच की है, जबकि 'पशुपति सील' 4,300 साल पुरानी है — यानी इसमें एक हजार साल से अधिक का अंतर है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भगवान शिव को प्राचीन काल से ही 'पशुपति' के रूप में संबोधित किया जाता रहा है और नेपाल में आज भी वे पशुपतिनाथ के रूप में विराजमान हैं; उनका वाहन बैल (नंदी) इस पहचान को और पुष्ट करता है।
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 'पशुपति सील' हड़प्पा सभ्यता की सबसे चर्चित पुरातात्विक वस्तुओं में से एक है। इस पर उकेरी गई आकृति को अधिकांश भारतीय विद्वान भगवान शिव के आदि रूप 'पशुपति' से जोड़ते हैं। ट्रुश्के के दावे ने इस व्याख्या पर प्रश्नचिह्न लगाया, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका के बीच शैक्षणिक और सांस्कृतिक विमर्श पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है।
आगे की स्थिति
संतों ने स्पष्ट किया है कि वे इस मुद्दे पर व्यापक जन-जागरण अभियान चलाने पर विचार कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पशुपति सील की व्याख्या अकादमिक जगत में दशकों से बहस का विषय रही है और यह विवाद उस बहस को एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर ले आया है।