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पशुपति सील विवाद: ऑड्रे ट्रुश्के के दावे पर अयोध्या के संत नाराज, अमेरिका से मांगी माफी

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पशुपति सील विवाद: ऑड्रे ट्रुश्के के दावे पर अयोध्या के संत नाराज, अमेरिका से मांगी माफी

सारांश

हड़प्पाकालीन 4,300 वर्ष पुरानी पशुपति सील को प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ने के ऑड्रे ट्रुश्के के दावे पर अयोध्या के संत भड़के। महंत देवेशाचार्य, सीताराम दास और आर्य संत वरुण दास ने इसे भ्रामक प्रचार बताते हुए अमेरिका से माफी माँगी और कालक्रम की गलती उजागर की।

मुख्य बातें

अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने पशुपति सील की हिंदू पहचान पर सवाल उठाते हुए इसे प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ा।
अयोध्या के साधु-संतों ने इसे भारतीय सनातन संस्कृति के विरुद्ध भ्रामक प्रचार करार दिया और अमेरिका से माफी माँगी।
आर्य संत वरुण दास ने बताया कि प्रोटो-एलामाइट सभ्यता 2700–3200 ईसा पूर्व की है, जबकि पशुपति सील 4,300 साल पुरानी है — अंतर एक हजार वर्ष से अधिक।
महंत सीताराम दास ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारतीय इतिहास को नुकसान पहुँचाने की कोशिश किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगी।
संत भगवान शिव के 'पशुपति' स्वरूप और नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को इस सील की पहचान का प्रमाण मानते हैं।

अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के द्वारा हड़प्पाकालीन 4,300 वर्ष पुरानी 'पशुपति सील' की पहचान पर उठाए गए सवालों के बाद अयोध्या के साधु-संतों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संतों ने इसे भारतीय सनातन संस्कृति के विरुद्ध भ्रामक प्रचार करार देते हुए अमेरिका से सार्वजनिक माफी की माँग की है।

साधु-संतों की प्रतिक्रिया

महंत देवेशाचार्य महाराज ने कहा, 'अमेरिका के नेताओं और लोगों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। हाल ही में अमेरिका ने भारत के ब्राह्मणों और स्वयं भारत के बारे में कुछ टिप्पणियाँ की थीं। इसी तरह, एक बार फिर वह भारत की छवि को धूमिल करने और यहाँ की संस्कृति व परंपराओं पर कलंक लगाने के लिए गलत दुष्प्रचार करने की कोशिश कर रहा है। यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। हम सभी इसका विरोध करते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी देश इस प्रकार दूसरे देश के विरुद्ध भ्रामक प्रचार नहीं कर सकता और अमेरिका को इतिहासकार ट्रुश्के के इस कृत्य के लिए माफी माँगनी चाहिए।

महंत सीताराम दास की तीखी आपत्ति

अयोध्या धाम के महंत सीताराम दास ने कहा, 'अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के का बयान अत्यंत निंदनीय है। अगर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ भारत के इतिहास को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगी, तो इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यहाँ तक कि उनका अपना इतिहास भी भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़ा हुआ है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि यह 'पशुपति सील' ही है, इसमें कोई संदेह नहीं, और जिसे सनातन संस्कृति का ज्ञान नहीं, वह इसके बारे में कुछ नहीं बता सकता।

आर्य संत वरुण दास का ऐतिहासिक खंडन

आर्य संत वरुण दास जी महाराज ने ट्रुश्के के उस दावे को सिरे से नकारा जिसमें उन्होंने सील को प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ा था। उन्होंने कहा, 'ऑड्रे ट्रुश्के का यह कहना कि सील प्रोटो-एलामाइट सभ्यता का है, बिल्कुल गलत और भ्रामक है। क्योंकि वह सभ्यता 2700 ईसा पूर्व से 3200 ईसा पूर्व के बीच की है, जबकि 'पशुपति सील' 4,300 साल पुरानी है — यानी इसमें एक हजार साल से अधिक का अंतर है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भगवान शिव को प्राचीन काल से ही 'पशुपति' के रूप में संबोधित किया जाता रहा है और नेपाल में आज भी वे पशुपतिनाथ के रूप में विराजमान हैं; उनका वाहन बैल (नंदी) इस पहचान को और पुष्ट करता है।

विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 'पशुपति सील' हड़प्पा सभ्यता की सबसे चर्चित पुरातात्विक वस्तुओं में से एक है। इस पर उकेरी गई आकृति को अधिकांश भारतीय विद्वान भगवान शिव के आदि रूप 'पशुपति' से जोड़ते हैं। ट्रुश्के के दावे ने इस व्याख्या पर प्रश्नचिह्न लगाया, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका के बीच शैक्षणिक और सांस्कृतिक विमर्श पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है।

आगे की स्थिति

संतों ने स्पष्ट किया है कि वे इस मुद्दे पर व्यापक जन-जागरण अभियान चलाने पर विचार कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पशुपति सील की व्याख्या अकादमिक जगत में दशकों से बहस का विषय रही है और यह विवाद उस बहस को एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर ले आया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका राजनीतिक तापमान ज़रूर बढ़ा है। संतों की 'अमेरिका माफी माँगे' वाली माँग ट्रुश्के के व्यक्तिगत शोध दावे को राष्ट्र-स्तरीय विवाद में बदल देती है, जो तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है — एक इतिहासकार की राय किसी देश की आधिकारिक स्थिति नहीं होती। वरुण दास का कालक्रम-आधारित खंडन अधिक तर्कसंगत है और इसे अकादमिक मंच पर रखा जाना चाहिए। मुख्यधारा की कवरेज जो चूकती है वह यह है कि पशुपति सील की 'शिव-पहचान' स्वयं भारतीय पुरातत्व जगत में सर्वसम्मत नहीं है — इस बहस को धार्मिक आक्रोश से नहीं, बल्कि पुरातात्विक साक्ष्य से सुलझाया जाना चाहिए।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पशुपति सील क्या है और यह विवाद क्यों है?
पशुपति सील हड़प्पा सभ्यता की एक प्राचीन मुहर है जो लगभग 4,300 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इस पर उकेरी गई आकृति को भारतीय विद्वान भगवान शिव के 'पशुपति' रूप से जोड़ते हैं, जबकि अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने इस पहचान पर सवाल उठाते हुए इसे प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ा, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ।
ऑड्रे ट्रुश्के का दावा क्या है और संतों ने उसे कैसे गलत बताया?
ट्रुश्के ने कथित तौर पर पशुपति सील को प्रोटो-एलामाइट सभ्यता से जोड़ा। आर्य संत वरुण दास ने यह खंडन किया कि प्रोटो-एलामाइट सभ्यता 2700–3200 ईसा पूर्व की है, जबकि पशुपति सील 4,300 वर्ष पुरानी है — यानी दोनों के बीच एक हजार वर्ष से अधिक का अंतर है।
अयोध्या के संतों ने अमेरिका से माफी क्यों माँगी?
संतों का मानना है कि ट्रुश्के का दावा भारतीय सनातन संस्कृति के विरुद्ध भ्रामक प्रचार है। महंत देवेशाचार्य महाराज ने इसे एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया जिसमें भारत की छवि और परंपराओं को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की जा रही है, इसलिए उन्होंने अमेरिका से सार्वजनिक माफी की माँग की।
पशुपति सील का भगवान शिव से क्या संबंध बताया जाता है?
संतों के अनुसार, भगवान शिव को प्राचीन काल से 'पशुपति' — अर्थात पशुओं के स्वामी — के रूप में जाना जाता है। नेपाल में आज भी पशुपतिनाथ मंदिर इसी स्वरूप को समर्पित है। सील पर उकेरी गई आकृति के साथ बैल (नंदी) की उपस्थिति को भी शिव-पहचान का प्रमाण माना जाता है।
इस विवाद का आगे क्या असर हो सकता है?
अयोध्या के संतों ने इस मुद्दे पर व्यापक जन-जागरण अभियान चलाने पर विचार करने की बात कही है। यह विवाद भारत-अमेरिका के बीच शैक्षणिक और सांस्कृतिक विमर्श को और संवेदनशील बना सकता है तथा पशुपति सील की अकादमिक व्याख्या को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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