'पशुपति सील' विवाद: भक्त चरणदास महाराज बोले — सनातन सभ्यता के प्रमाणों को नकारना अनुचित
सारांश
मुख्य बातें
नासिक के धर्मगुरु भक्त चरणदास महाराज ने 30 मई 2026 को 4,300 वर्ष पुरानी 'पशुपति सील' को लेकर छिड़े विवाद पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के के उस दावे को सिरे से खारिज किया जिसमें इस प्राचीन मुहर की आकृति को भगवान शिव से जोड़ने पर सवाल उठाए गए थे। महाराज ने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति के पक्ष में पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध हैं।
भक्त चरणदास महाराज का बयान
महाराज ने कहा, 'भारत की सनातन संस्कृति और सभ्यता हजारों साल पुरानी है और इसके समर्थन में पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में 'पशुपति सील' को लंबे समय से भगवान शिव के पशुपतिनाथ स्वरूप से जोड़ा जाता रहा है। उनके अनुसार, विदेशी इतिहासकारों की ओर से ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों और मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगाना अनुचित है।
महाराज ने आगे कहा कि सनातन सभ्यता किसी न किसी रूप में पूरे विश्व से जुड़ी हुई है। उनका तर्क था कि 'पशुपति सील' की खोज यह स्पष्ट करती है कि हड़प्पा सभ्यता भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है, और इस आधार पर अमेरिकी इतिहासकार का दावा 'बिल्कुल गलत' है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब भारत के संस्कृति मंत्रालय ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक प्राचीन स्टीटाइट मुहर की तस्वीर साझा की। मंत्रालय ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में खोजी गई लगभग 4,300 वर्ष पुरानी यह स्टीटाइट मुहर एक योगमुद्रा में बैठे पुरुष की आकृति को दर्शाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव-पशुपति के रूप में देखा जाता है।'
मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह आकृति मूलबंधासन में विराजमान है और इसके चारों ओर विभिन्न पशु अंकित हैं। मंत्रालय के अनुसार, भले ही यह प्राचीन स्थल आज की भौगोलिक सीमाओं के पार स्थित हो, भारत इस विरासत का जीवंत संरक्षक बना हुआ है।
ऑड्रे ट्रुश्के का विरोधी दावा
संस्कृति मंत्रालय की पोस्ट के बाद अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने एक्स पर अपनी पोस्ट में दावा किया कि मुहर में अंकित आकृति शिव की नहीं है। ट्रुश्के का यह बयान भारत में तीखी बहस का केंद्र बन गया, जिसमें धार्मिक नेताओं, इतिहासकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं।
गौरतलब है कि 'पशुपति सील' की पहचान को लेकर अकादमिक जगत में दशकों से मतभेद रहे हैं। कुछ पुरातत्वविद् इसे शिव का प्रारंभिक स्वरूप मानते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह व्याख्या पूरी तरह प्रमाणित नहीं है।
सनातन संस्कृति और हड़प्पा सभ्यता का संबंध
संस्कृति मंत्रालय की पोस्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि 'पशुपति सील' में दिखाई देने वाली योग मुद्रा, शैव प्रतीकवाद और आध्यात्मिक भावना आज भी भारत के मंदिरों, शिव की दैनिक पूजा, योग परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन में जीवंत रूप से विद्यमान हैं। भक्त चरणदास महाराज ने इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि समय-समय पर संस्कृति का स्वरूप बदलता रहा है, परंतु इसकी जड़ें अटूट हैं।
आगे की स्थिति
यह विवाद भारत में सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक व्याख्या की व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मुद्दों पर शैक्षणिक संवाद और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित चर्चा ही सबसे उचित मार्ग है। आने वाले दिनों में इस विषय पर और प्रतिक्रियाएँ सामने आने की संभावना है।