पेपर लीक पर सुप्रीम कोर्ट में PIL: समयबद्ध जांच और संपत्ति जब्ती की मांग
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय में 13 जुलाई 2026 को पेपर लीक मामलों पर सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और भारत के विधि आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक से लाखों छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
याचिका में क्या मांगा गया है
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे पेपर लीक मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए एक 'स्टैंडर्ड प्रश्नावली' और 'विशेष जांच प्रक्रिया (SIP)' तैयार करें। इसके अलावा, याचिका में भ्रष्टाचार विरोधी, मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और काले धन कानूनों के प्रावधानों को लागू करने की भी माँग की गई है।
याचिका में यह भी माँग की गई है कि पेपर लीक के दोषियों और उनके परिवार के सदस्यों की चल व अचल संपत्तियों का मूल्यांकन और जब्ती की जाए। साथ ही, ऐसे मामलों में दी जाने वाली सज़ाएँ एक साथ नहीं, बल्कि लगातार (consecutive) चलनी चाहिए ताकि कड़ा निवारक तैयार हो सके।
छात्रों पर असर और संवैधानिक उल्लंघन
याचिका में दावा किया गया है कि पेपर लीक की घटनाओं के कारण छात्रों को वित्तीय कठिनाई, शैक्षिक एवं रोज़गार अवसरों की हानि, गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और बढ़ती आत्महत्याओं का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में कहा गया है, 'पेपर लीक का देशव्यापी असर हुआ है, जिससे छात्रों और उनके परिवारों पर बुरा असर पड़ा है और कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है।'
याचिका के अनुसार, अधिकारियों की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
NEET पेपर लीक और मौजूदा कानून की सीमाएँ
याचिका में 3 मई 2026 के कथित NEET पेपर लीक का विशेष उल्लेख किया गया है, जिसने लाखों छात्रों को प्रभावित किया और परीक्षा संबंधी अपराधों से निपटने में प्रणालीगत कमियों को उजागर किया। यह ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 जून 2024 से लागू है — फिर भी, याचिका के अनुसार, लीक की घटनाओं में वृद्धि जारी है।
गौरतलब है कि याचिका में मौजूदा कानूनी ढाँचे की कई खामियाँ गिनाई गई हैं: समयबद्ध जाँच और परीक्षण का अभाव, मानक जाँच प्रक्रिया की कमी, अपराध की आय और बेनामी संपत्ति का पता न लगना, और मास्टरमाइंड की पहचान के लिए धोखे का पता लगाने वाले परीक्षणों (DDT) का उपयोग न होना।
विधि आयोग से रिपोर्ट की माँग
याचिका में वैकल्पिक रूप से भारत के विधि आयोग को निर्देश देने की माँग की गई है कि वह पेपर लीक जाँच से संबंधित अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं की समीक्षा करे और तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे। याचिका में कहा गया है कि 'कार्रवाई का कारण अभी भी कायम है, क्योंकि पेपर लीक के परिणामों का समाधान नहीं हुआ है।' अब यह देखना होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करता है या नहीं।