वंदे मातरम पर पिनाराई विजयन का बयान देश का अपमान — विनोद बंसल
सारांश
मुख्य बातें
विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने 9 अगस्त 2026 को केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के 'वंदे मातरम' संबंधी बयान की कड़ी निंदा की। बंसल ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम की इस अमर विरासत को किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाना करोड़ों देशवासियों और शहीद सैनिकों का अपमान है।
मुख्य आरोप और बयान
बंसल ने कहा, 'पिनाराई विजयन कोई आम व्यक्ति नहीं हैं, वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। उन्हें यह भी पता है कि संसद के दोनों सदनों ने कानून बनाकर 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य कर दिया है। इसके बावजूद, पिनाराई विजयन अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए केरल के लोगों को 'वंदे मातरम' के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि स्वाधीनता दिवस से ठीक पहले इस तरह का बयान देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
ऐतिहासिक संदर्भ
बंसल ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि 15 अगस्त 1947 को प्रातः 6 बजकर 30 मिनट पर ऑल इंडिया रेडियो पर पूरा वंदे मातरम प्रसारित किया गया था। उन्होंने कहा कि इस गीत ने स्वाधीनता आंदोलन में असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार, वंदे मातरम को 'आरएसएस का एजेंडा' कहकर खारिज करना उन सभी वीर सेनानियों का अपमान है जिन्होंने इस गीत को गाते हुए बलिदान दिया।
सैनिकों का सम्मान
VHP प्रवक्ता ने कहा कि देश की सीमा पर -40 से -50 डिग्री तापमान में तैनात जवान वंदे मातरम गाकर मातृभूमि की सेवा करते हैं। उनके शब्दों में, 'लाखों सैनिक वंदे मातरम गाकर मां भारती के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर देते हैं।' ऐसे में इस गीत के विरुद्ध बयानबाजी करना सीधे तौर पर सशस्त्र बलों के मनोबल को ठेस पहुँचाना है।
चेतावनी और आगाह
बंसल ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि विजयन को अभी से इस गीत की 'प्रैक्टिस' कर लेनी चाहिए, क्योंकि कानूनी अनिवार्यता के चलते भविष्य में इसका पालन न करने पर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि केरल में कुछ राजनीतिक दल देशभक्ति के प्रतीकों को लेकर जनता में भ्रम फैला रहे हैं। बंसल ने स्पष्ट किया, 'वंदे मातरम किसी दल या संगठन का नारा नहीं है — यह 130 करोड़ भारतीयों की सामूहिक भावना है।'
आगे क्या
यह विवाद स्वाधीनता दिवस 2026 से ठीक पहले उभरा है, जिससे राष्ट्रीय प्रतीकों और राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमाओं पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पिनाराई विजयन की ओर से इस बयान पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।