28 जुलाई 2026
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'वंदे मातरम' विवाद: वारिस पठान के बयान पर एनडीए का पलटवार, भाजपा बोली- ऐसी टिप्पणियाँ सामाजिक वैमनस्य फैलाती हैं

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'वंदे मातरम' विवाद: वारिस पठान के बयान पर एनडीए का पलटवार, भाजपा बोली- ऐसी टिप्पणियाँ सामाजिक वैमनस्य फैलाती हैं

सारांश

'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने के विरोध में वारिस पठान के बयान के बाद एनडीए नेताओं ने कड़ा पलटवार किया। भाजपा ने इसे सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाला बताया, जबकि विपक्ष ने संवैधानिक संतुलन की याद दिलाई। यह विवाद धर्म, राष्ट्रीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पुरानी बहस को फिर केंद्र में ले आया है।

मुख्य बातें

एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने ' वंदे मातरम ' को अनिवार्य बनाने का विरोध किया था, जिसके बाद राजनीतिक विवाद भड़का।
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि भारत में रहना है तो ' वंदे मातरम ' कहना होगा।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश ने कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ समाज में मनमुटाव बढ़ाती हैं।
कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने ' वंदे मातरम ' पर कानून बनाने की वकालत की; कहा- सरकार इस पर काम कर रही है।
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने संवैधानिक संतुलन की बात करते हुए ' जन गण मन ' और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान पर भी समान ध्यान देने की माँग की।

एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान द्वारा 'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने के विरोध में दिए गए बयान पर मंगलवार, 28 जुलाई को राजनीतिक घमासान तेज हो गया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेताओं ने एकजुट होकर कहा कि राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर भारतीय नागरिक का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।

मुख्य घटनाक्रम

उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कड़े शब्दों में कहा, 'अगर आप भारत में रहना चाहते हैं, तो आपको वंदे मातरम कहना होगा, वरना वे किसी दूसरे देश में जाकर रह सकते हैं।' उनके इस बयान ने विवाद को और हवा दे दी।

उत्तर प्रदेश के ही एक अन्य कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने इस मुद्दे पर कानून बनाने की पुरज़ोर वकालत की। उन्होंने कहा, 'सरकार इस पर काम कर रही है और ऐसा कानून बहुत ज़रूरी है। इस तरह के बयान ऐसे बिल की ज़रूरत को और पुख्ता करते हैं। हमें नहीं पता कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान वंदे मातरम गाते हुए भारत माता के कितने सपूतों ने अपनी जान दी थी। इसलिए इसका किसी भी तरह से अनादर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।'

भाजपा की प्रतिक्रिया

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश ने भी पठान के बयानों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर वारिस पठान या कोई और ऐसे बयान देता है, तो मेरा मानना है कि वे देश के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। ऐसी टिप्पणियाँ समाज में मनमुटाव का माहौल बनाती हैं, जो सही नहीं है।'

विपक्ष का रुख

समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वारिस पठान के बयान का पूरा संदर्भ पहले समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'यह जानना ज़रूरी है कि किन हालात में यह बयान दिया गया। जहाँ तक राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान की बात है, देश संवैधानिक प्रावधानों और संविधान निर्माताओं द्वारा तय सिद्धांतों का पालन करता आ रहा है।'

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के नेता हुसैन दलवई ने कहा कि 'वंदे मातरम' का सम्मान विवाद का विषय नहीं होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया, 'इसे बोलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। हालाँकि पारंपरिक रूप से इसके कुछ ही छंद गाए जाते हैं, पूरी रचना नहीं।' दलवई ने यह भी सवाल उठाया कि अगर 'वंदे मातरम' पर ज़ोर दिया जा रहा है, तो 'जन गण मन' और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान पर समान ध्यान क्यों नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि लोगों की सोच के केंद्र में संविधान होना चाहिए।

वारिस पठान का मूल बयान

गौरतलब है कि एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने 'वंदे मातरम' के गायन को अनिवार्य बनाने का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि मुसलमान राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं, लेकिन इसके बोल के कुछ हिस्से इस्लाम को मानने वाले नहीं गा सकते, क्योंकि ऐसा करना उनकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध होगा। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब प्रस्तावित 'वंदे मातरम बिल' को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज़ है।

आगे क्या

यह विवाद धर्म, राष्ट्रीयता और संवैधानिक अधिकारों के बीच की उस पुरानी बहस को फिर से केंद्र में ले आया है, जो भारतीय राजनीति में समय-समय पर उठती रहती है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस विधायी कदम उठाती है या यह विवाद राजनीतिक बयानबाज़ी तक ही सीमित रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि सर्वोच्च न्यायालय पहले भी धार्मिक अभिव्यक्ति की सीमाओं पर सूक्ष्म निर्णय दे चुका है। दलवई का यह सवाल कि 'जन गण मन' और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान पर समान सख्ती क्यों नहीं — इस बहस की चुनिंदा प्रकृति को उजागर करता है। बिना संवैधानिक विमर्श के महज़ राजनीतिक बयानबाज़ी से यह मुद्दा हल होने की बजाय और उलझता जाएगा।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वारिस पठान ने 'वंदे मातरम' पर क्या कहा था?
एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने 'वंदे मातरम' के गायन को अनिवार्य बनाने का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि मुसलमान राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं, लेकिन इसके कुछ बोल इस्लामी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध होने के कारण मुसलमान उन्हें नहीं गा सकते।
भाजपा ने वारिस पठान के बयान पर क्या प्रतिक्रिया दी?
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश ने कहा कि राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है और ऐसी टिप्पणियाँ समाज में मनमुटाव का माहौल बनाती हैं। उन्होंने पठान के बयान को देश के हितों के खिलाफ बताया।
क्या 'वंदे मातरम' पर कोई कानून बनाया जा रहा है?
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि सरकार इस पर काम कर रही है और ऐसा कानून बहुत ज़रूरी है। हालाँकि किसी ठोस विधेयक का आधिकारिक मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का इस विवाद पर क्या रुख है?
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने कहा कि 'वंदे मातरम' का सम्मान ज़रूरी है, लेकिन साथ ही 'जन गण मन' और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान पर भी समान ध्यान दिया जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी के उदयवीर सिंह ने संयमित रुख अपनाते हुए कहा कि पठान के बयान का पूरा संदर्भ समझना ज़रूरी है।
यह विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
यह विवाद धर्म, राष्ट्रीय पहचान और संवैधानिक अधिकारों के बीच की उस संवेदनशील बहस को फिर से सामने लाता है जो भारतीय राजनीति में समय-समय पर उभरती रही है। 'वंदे मातरम' की अनिवार्यता का सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों से सीधे जुड़ा है।
राष्ट्र प्रेस
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