19 अगस्त 2026
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पिथौरागढ़ का श्री थल केदार मंदिर: 100 करोड़ साल पुरानी डोलोमाइट शिवलिंग का अद्भुत तीर्थ

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पिथौरागढ़ का श्री थल केदार मंदिर: 100 करोड़ साल पुरानी डोलोमाइट शिवलिंग का अद्भुत तीर्थ

सारांश

पिथौरागढ़ का श्री थल केदार मंदिर महज एक तीर्थस्थल नहीं — यह पृथ्वी के 100 करोड़ साल पुराने भूगर्भीय इतिहास और हिमालयी आस्था का संगम है। CM धामी के सोशल मीडिया आह्वान के बाद यह 'लघु केदारनाथ' अब राष्ट्रीय चर्चा में है।

मुख्य बातें

श्री थल केदार मंदिर , पिथौरागढ़ जिला , उत्तराखंड में स्थित भगवान शिव का प्राचीन तीर्थस्थल है।
मंदिर की शिवलिंग लगभग 100 करोड़ साल पुरानी प्राकृतिक डोलोमाइट चट्टान से निर्मित है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया पर मंदिर का वीडियो साझा कर सावन में दर्शन का आह्वान किया।
मंदिर को लघु केदारनाथ के नाम से भी जाना जाता है; स्कंद पुराण में इसका उल्लेख मिलता है।
इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान मंदिर संरचना कत्यूरी राजवंश के काल में निर्मित मानी जाती है।
यहाँ से पंचचूली और त्रिशूल हिमालयी चोटियों के दृश्य दिखाई देते हैं।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित श्री थल केदार मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यहाँ विराजमान वह शिवलिंग है जो लगभग 100 करोड़ साल पुरानी प्राकृतिक डोलोमाइट चट्टान से निर्मित है। 19 अगस्त 2026 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया पर इस मंदिर का विशेष वीडियो साझा कर इसकी दिव्यता को देशभर के श्रद्धालुओं तक पहुँचाया। लघु केदारनाथ के नाम से भी विख्यात यह मंदिर महाशिवरात्रि और सावन के दौरान लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र बन जाता है।

मुख्यमंत्री धामी का संदेश और मंदिर की महिमा

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को सोशल मीडिया पर मंदिर का वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, 'पिथौरागढ़ जिले में स्थित श्री थल केदार मंदिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित एक प्राचीन और दिव्य तीर्थ स्थल है। स्कंद पुराण में वर्णित यह पवित्र स्थान प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति से भरपूर है। दूर-दूर से भक्त यहाँ भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने और पूजा-अर्चना व अनुष्ठान करने आते हैं। सावन के इस महीने में महादेव के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए ज़रूर जाएँ। हर हर महादेव।' उनकी इस पोस्ट ने मंदिर को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया।

शिवलिंग की भूवैज्ञानिक विशिष्टता

मंदिर का सबसे अनूठा पहलू यहाँ की प्राकृतिक डोलोमाइट शिवलिंग है, जिसे लगभग 100 करोड़ साल पुराना माना जाता है। डोलोमाइट एक कार्बोनेट खनिज है जो अत्यंत प्राचीन भूगर्भीय प्रक्रियाओं के दौरान निर्मित होती है, जिससे यह शिवलिंग न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी दुर्लभ है। यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब हिमालयी क्षेत्र के प्राचीन तीर्थस्थलों पर शोध और पर्यटन दोनों की रुचि बढ़ रही है।

पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

लोक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान इस कुमाऊँ क्षेत्र से होकर गुज़रे थे और भगवान शिव के आशीर्वाद की खोज में यहाँ पहुँचे थे। माना जाता है कि भगवान शिव यहाँ थलेश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए और ऋषियों व भक्तों को दर्शन दिए। 'केदार' शब्द शिव की उपस्थिति का प्रतीक है, जो इस मंदिर को उत्तराखंड के केदारनाथ और अन्य केदार मंदिरों से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ता है। इतिहासकारों का कहना है कि वर्तमान मंदिर संरचना का निर्माण मूल रूप से कत्यूरी (कात्युरी) राजवंश के शासनकाल में हुआ माना जाता है।

प्राकृतिक परिवेश और पहुँच का मार्ग

यह मंदिर घने देवदार और चीड़ के जंगलों के बीच एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ से पंचचूली और त्रिशूल जैसी विशाल हिमालयी चोटियों के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। पिथौरागढ़ मुख्य शहर से यहाँ पहुँचने के लिए सड़क मार्ग के बाद एक छोटा और रोमांचक ट्रेक करना पड़ता है। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों और ट्रेकर्स के लिए भी एक आकर्षक गंतव्य है।

आगे की संभावनाएँ

मुख्यमंत्री धामी के सोशल मीडिया प्रचार के बाद यह अपेक्षा की जा रही है कि सावन के शेष सप्ताहों में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। उत्तराखंड सरकार के पर्यटन विभाग की नज़र में यह मंदिर धार्मिक पर्यटन के एक नए केंद्र के रूप में उभर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो चारधाम के बाहर पर्यटन विविधीकरण की दृष्टि से सकारात्मक है। हालाँकि, बिना बुनियादी ढाँचे के विकास और पर्यावरण-संवेदनशील ट्रेक प्रबंधन के, बढ़ती भीड़ इस नाज़ुक हिमालयी परिवेश पर दबाव बढ़ा सकती है — जो उत्तराखंड के अन्य ओवर-टूरिज्म वाले स्थलों का दोहराव होगा।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री थल केदार मंदिर कहाँ स्थित है और कैसे पहुँचें?
श्री थल केदार मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है। पिथौरागढ़ मुख्य शहर से सड़क मार्ग के बाद एक छोटा और रोमांचक ट्रेक करके यहाँ पहुँचा जा सकता है।
थल केदार मंदिर की शिवलिंग इतनी खास क्यों है?
यहाँ की शिवलिंग लगभग 100 करोड़ साल पुरानी प्राकृतिक डोलोमाइट चट्टान से निर्मित मानी जाती है, जो इसे भूवैज्ञानिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से दुर्लभ बनाती है। डोलोमाइट एक कार्बोनेट खनिज है जो अत्यंत प्राचीन भूगर्भीय प्रक्रियाओं में बनता है।
थल केदार मंदिर को लघु केदारनाथ क्यों कहते हैं?
'केदार' शब्द भगवान शिव की उपस्थिति का प्रतीक है, जो इस मंदिर को उत्तराखंड के केदारनाथ और अन्य केदार मंदिरों से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ता है। मान्यता है कि यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ से जुड़ी कथा से संबंधित है।
इस मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व क्या है?
स्कंद पुराण में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। लोक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में पांडव इस क्षेत्र से गुज़रे थे और भगवान शिव यहाँ थलेश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए थे। इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान मंदिर संरचना कत्यूरी राजवंश के काल में निर्मित मानी जाती है।
मुख्यमंत्री धामी ने इस मंदिर के बारे में क्या कहा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 19 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया पर मंदिर का वीडियो साझा कर इसे 'प्राचीन और दिव्य तीर्थ स्थल' बताया और सावन में भक्तों से दर्शन का आह्वान किया। उन्होंने इसे प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति से भरपूर स्थान कहा।
राष्ट्र प्रेस
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