पीएमसीएच प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह की बर्खास्तगी पर जेडीए और एमबीबीएस छात्रों का विरोध, निष्पक्ष जांच की मांग
सारांश
मुख्य बातें
पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) के पूर्व प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को बिहार स्वास्थ्य विभाग द्वारा पद से हटाए जाने के बाद संस्थान में असंतोष की लहर दौड़ गई है। जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन (जेडीए) और एमबीबीएस छात्रों ने 28 जून को एकजुट होकर इस कार्रवाई को जल्दबाजी में लिया गया निर्णय करार दिया और सरकार से मामले की निष्पक्ष समीक्षा की माँग की। छात्रों का तर्क है कि एक मेडिकल इमरजेंसी के कारण हुई एकल-दिवसीय अनुपस्थिति के आधार पर 35 से 40 वर्षों की सेवा वाले वरिष्ठ अधिकारी पर कठोर कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है।
विरोध का मुख्य आधार
जेडीए के छात्र नेता डॉ. सत्यम कुमार ने कहा कि एक डॉक्टर के साथ भी मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है, चाहे वह ड्यूटी पर हो या नहीं — ऐसी परिस्थितियों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जिस दिन स्वास्थ्य मंत्री अस्पताल पहुँचे, ठीक उसी दिन ऐसी स्थिति क्यों बनी कि डॉ. सिंह उपस्थित नहीं हो सके।
डॉ. सत्यम कुमार ने यह भी कहा कि यदि डॉ. सिंह केवल बहाना बनाना चाहते तो वे नियमित रूप से सुबह अस्पताल और कॉलेज नहीं आते, न ही छात्रों और मरीजों की समस्याओं पर लगातार ध्यान देते। उन्होंने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार और डॉ. सिंह के साथ न्याय की अपील की।
बर्न इंजरी का हवाला, प्रक्रिया पर सवाल
एमबीबीएस छात्र आयुष कुमार ने बताया कि डॉ. सिंह ने स्वयं स्पष्ट किया है कि निरीक्षण से एक दिन पहले उन्हें बर्न इंजरी हुई थी, जिसकी सूचना उन्होंने संबंधित अधिकारियों को दे दी थी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में यदि वे फोन नहीं उठा सके, तो केवल इसी आधार पर कठोर कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।
आयुष कुमार ने यह भी कहा कि किसी भी वरिष्ठ अधिकारी पर कार्रवाई से पहले एक स्वतंत्र जांच समिति गठित कर वास्तविक कारणों की पड़ताल होनी चाहिए थी। एमबीबीएस छात्र हर्ष राज ने इस बात पर जोर दिया कि जिस स्थान पर सरकारी वाहन खड़ा था, उसे केवल क्लीनिक बताना सही नहीं है, क्योंकि वह डॉ. सिंह का पारिवारिक आवास भी है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी कार्रवाई से पूर्व कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना चाहिए था और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए था।
डॉ. सिंह के कार्यकाल की उपलब्धियाँ
छात्रों ने डॉ. सिंह के कार्यकाल में हुए शैक्षणिक सुधारों का विस्तार से उल्लेख किया। एमबीबीएस छात्र आशीष कुमार ने बताया कि पहले वार्ड ड्यूटी केवल कुछ विषयों तक सीमित थी, लेकिन डॉ. सिंह के कार्यकाल में सभी विषयों के छात्रों के लिए वार्ड ड्यूटी शुरू कराई गई, जिससे व्यावहारिक प्रशिक्षण में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
आशीष कुमार ने आगे बताया कि भीषण गर्मी के दौरान लेक्चर थिएटर में एयर कंडीशनर और प्रोजेक्टर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं और छात्रों की शिकायत मिलने के कुछ ही दिनों के भीतर इन कार्यों को पूरा कराया गया। इसके अलावा छात्राओं के लिए पर्याप्त शौचालयों की व्यवस्था — जो लंबे समय से लंबित थी — पर भी उन्होंने पहल की।
छात्र-प्रशासन संवाद की संस्कृति
आशीष कुमार ने कहा कि डॉ. सिंह छात्रों और प्रशासन के बीच सीधे संवाद में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि किसी भी छात्र को अपनी समस्या बताने के लिए किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, यही कारण था कि छात्र उनसे सीधे मिलकर अपनी बात रखते थे।
हर्ष राज ने कहा कि डॉ. सिंह का कार्यकाल भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने कम समय में शैक्षणिक माहौल बेहतर बनाने, कक्षाओं का नियमित संचालन सुनिश्चित करने और छात्रों की मूलभूत सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। यह विरोध दर्शाता है कि संस्थागत नेतृत्व में पारदर्शी जवाबदेही और उचित प्रक्रिया की माँग अब छात्र स्तर तक पहुँच चुकी है।