पॉक्सो में सहमति आयु घटाने की मांग पर NHRC सदस्य की चेतावनी: बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने 11 अगस्त 2026 को पॉक्सो कानून के प्रावधानों में ढील देने की मांग पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है और बाल सुरक्षा से जुड़े किसी भी कानूनी प्रावधान में बदलाव अत्यंत सावधानी एवं गहन विचार-विमर्श के बाद ही होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस
कानूनगो ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर एक महत्त्वपूर्ण सुनवाई जारी है, जिसमें कुछ पक्षों की ओर से 15 या 16 वर्ष की आयु में यौन संबंधों के लिए कानूनी सहमति की अनुमति देने की माँग रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर 17 संगठनों और व्यक्तियों ने न्यायालय के समक्ष अपनी चिंताएँ दर्ज कराई हैं। उनके अनुसार सहमति की कानूनी सीमा में कोई भी बदलाव बाल सुरक्षा के मूल ढाँचे को कमज़ोर कर सकता है।
तस्करी और शोषण का खतरा
कानूनगो ने आगाह किया कि यदि कम उम्र में यौन सहमति को कानूनी मान्यता दी जाती है, तो बच्चों की तस्करी और यौन शोषण में संलिप्त तत्त्व इस छूट का दुरुपयोग कर सकते हैं। उनका कहना था कि ऐसी किसी भी व्यवस्था के गलत इस्तेमाल की आशंका को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं होगा। किशोरावस्था शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण और भविष्य की तैयारी का काल है — इस दौर में बच्चों को यौन दबावों से सुरक्षित रखना समाज और राज्य दोनों की जिम्मेदारी है।
विवाह को बचाव के रूप में उपयोग पर आपत्ति
NHRC सदस्य ने उन मामलों पर विशेष चिंता व्यक्त की जहाँ नाबालिग लड़कियों और उनसे काफी बड़े पुरुषों के बीच संबंधों को बाद में विवाह का रूप देकर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने की माँग की जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि 15 या 16 वर्ष की आयु में कोई भी व्यक्ति इतने गंभीर जीवन-निर्णय लेने में वास्तव में कितना सक्षम होता है। उनके अनुसार किसी नाबालिग के साथ यौन अपराध के बाद उसे उसी व्यक्ति के साथ रहने या विवाह करने के लिए बाध्य करना न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
बच्चे की इच्छा और मानसिक स्थिति सर्वोपरि
कानूनगो ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे सभी मामलों में पीड़ित बच्चे की इच्छा, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल यह तथ्य कि संबंधित पक्ष बाद में वैवाहिक जीवन में हैं, किसी कथित अपराध को निरस्त करने का आधार नहीं बन सकता। उन्होंने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय इस सुनवाई में बाल अधिकारों, उनकी सुरक्षा और पॉक्सो कानून के मूल उद्देश्य को केंद्र में रखकर निर्णय करेगा।