11 अगस्त 2026
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पॉक्सो में सहमति आयु घटाने की मांग पर NHRC सदस्य की चेतावनी: बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं

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पॉक्सो में सहमति आयु घटाने की मांग पर NHRC सदस्य की चेतावनी: बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय में पॉक्सो के तहत सहमति आयु घटाने की माँग पर NHRC सदस्य प्रियांक कानूनगो ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि 15-16 साल की उम्र में यौन सहमति को कानूनी मान्यता देना बाल तस्करी और शोषण के लिए खतरनाक रास्ता खोल सकता है।

मुख्य बातें

NHRC सदस्य प्रियांक कानूनगो ने 11 अगस्त 2026 को पॉक्सो कानून में ढील देने की माँग पर कड़ी आपत्ति जताई।
सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई में कुछ पक्ष 15 या 16 वर्ष में यौन सहमति की कानूनी अनुमति माँग रहे हैं।
17 संगठनों और व्यक्तियों ने न्यायालय के समक्ष बाल सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएँ दर्ज कराई हैं।
कानूनगो ने चेताया कि ऐसी किसी छूट का बाल तस्करी और यौन शोषण में संलिप्त तत्त्व दुरुपयोग कर सकते हैं।
उन्होंने विवाह को आपराधिक कार्यवाही से बचाव के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पर भी आपत्ति जताई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने 11 अगस्त 2026 को पॉक्सो कानून के प्रावधानों में ढील देने की मांग पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है और बाल सुरक्षा से जुड़े किसी भी कानूनी प्रावधान में बदलाव अत्यंत सावधानी एवं गहन विचार-विमर्श के बाद ही होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस

कानूनगो ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर एक महत्त्वपूर्ण सुनवाई जारी है, जिसमें कुछ पक्षों की ओर से 15 या 16 वर्ष की आयु में यौन संबंधों के लिए कानूनी सहमति की अनुमति देने की माँग रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर 17 संगठनों और व्यक्तियों ने न्यायालय के समक्ष अपनी चिंताएँ दर्ज कराई हैं। उनके अनुसार सहमति की कानूनी सीमा में कोई भी बदलाव बाल सुरक्षा के मूल ढाँचे को कमज़ोर कर सकता है।

तस्करी और शोषण का खतरा

कानूनगो ने आगाह किया कि यदि कम उम्र में यौन सहमति को कानूनी मान्यता दी जाती है, तो बच्चों की तस्करी और यौन शोषण में संलिप्त तत्त्व इस छूट का दुरुपयोग कर सकते हैं। उनका कहना था कि ऐसी किसी भी व्यवस्था के गलत इस्तेमाल की आशंका को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं होगा। किशोरावस्था शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण और भविष्य की तैयारी का काल है — इस दौर में बच्चों को यौन दबावों से सुरक्षित रखना समाज और राज्य दोनों की जिम्मेदारी है।

विवाह को बचाव के रूप में उपयोग पर आपत्ति

NHRC सदस्य ने उन मामलों पर विशेष चिंता व्यक्त की जहाँ नाबालिग लड़कियों और उनसे काफी बड़े पुरुषों के बीच संबंधों को बाद में विवाह का रूप देकर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने की माँग की जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि 15 या 16 वर्ष की आयु में कोई भी व्यक्ति इतने गंभीर जीवन-निर्णय लेने में वास्तव में कितना सक्षम होता है। उनके अनुसार किसी नाबालिग के साथ यौन अपराध के बाद उसे उसी व्यक्ति के साथ रहने या विवाह करने के लिए बाध्य करना न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

बच्चे की इच्छा और मानसिक स्थिति सर्वोपरि

कानूनगो ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे सभी मामलों में पीड़ित बच्चे की इच्छा, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल यह तथ्य कि संबंधित पक्ष बाद में वैवाहिक जीवन में हैं, किसी कथित अपराध को निरस्त करने का आधार नहीं बन सकता। उन्होंने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय इस सुनवाई में बाल अधिकारों, उनकी सुरक्षा और पॉक्सो कानून के मूल उद्देश्य को केंद्र में रखकर निर्णय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बाल संरक्षण की बुनियाद पर सवाल है। भारत में बाल विवाह और नाबालिग लड़कियों के शोषण के जो आँकड़े हैं, उनके संदर्भ में किसी भी ढील का व्यावहारिक परिणाम कागज़ी बहसों से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि विवाह को 'बचाव' के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति पहले से ही न्यायालयों में चुनौती का विषय रही है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की दिशा यह तय करेगी कि भारत बाल अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मज़बूत करता है या उसे सामाजिक दबावों के सामने कमज़ोर पड़ने देता है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पॉक्सो कानून में सहमति आयु बदलने की माँग क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई में कुछ पक्षों ने माँग रखी है कि 15 या 16 वर्ष की आयु में यौन संबंधों के लिए कानूनी सहमति को मान्यता दी जाए। वर्तमान में पॉक्सो कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है और उसके साथ यौन संबंध अपराध की श्रेणी में आते हैं।
NHRC ने इस माँग पर क्या रुख अपनाया है?
NHRC सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस माँग का विरोध करते हुए कहा कि बाल सुरक्षा कानूनों में कोई भी बदलाव अत्यंत सावधानी से होना चाहिए। उन्होंने चेताया कि ऐसी किसी छूट का बाल तस्करी और यौन शोषण में संलिप्त तत्त्व दुरुपयोग कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कितने पक्षों ने चिंता जताई है?
कानूनगो के अनुसार 17 संगठनों और व्यक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपनी चिंताएँ दर्ज कराई हैं। इनका तर्क है कि सहमति की कानूनी सीमा बदलने से बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल उठ सकते हैं।
विवाह को बचाव के रूप में इस्तेमाल करने पर NHRC की क्या आपत्ति है?
कानूनगो ने कहा कि नाबालिग लड़कियों के साथ यौन अपराध के बाद उन्हें उसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए बाध्य करना और इसे आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का आधार बनाना न्यायसंगत नहीं है। उनके अनुसार पीड़ित बच्चे की इच्छा और मानसिक स्थिति को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इस सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय से क्या अपेक्षा है?
NHRC सदस्य कानूनगो ने उम्मीद जताई है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले में बाल अधिकारों, उनकी सुरक्षा और पॉक्सो कानून के मूल उद्देश्य को केंद्र में रखेगा। यह सुनवाई भारत में बाल संरक्षण के कानूनी ढाँचे की दिशा तय करने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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