मराठी भाषा विवाद: परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का अखिलेश यादव पर पलटवार, रोजगार नीति पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने 24 अगस्त को समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर तीखा पलटवार किया। सरनाईक ने कहा कि यदि अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश में पर्याप्त रोजगार सृजित किए होते, तो राज्य के लोगों को महाराष्ट्र में आजीविका की तलाश में नहीं आना पड़ता। यह विवाद महाराष्ट्र सरकार द्वारा ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा ज्ञान अनिवार्य किए जाने के बाद उपजे राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि में सामने आया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई को एक आदेश जारी कर सभी ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा का बुनियादी ज्ञान अनिवार्य किया था। चालकों को मराठी सीखने के लिए तीन माह का समय दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, इस अवधि में 85 प्रतिशत चालकों ने मराठी भाषा का ज्ञान अर्जित कर लिया है। हालांकि, शेष चालकों की स्थिति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
इसी मुद्दे पर अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा सरकार एक ओर रोजगार नहीं दे रही और दूसरी ओर जो लोग अपनी मेहनत से रोजी-रोटी कमा रहे हैं, उन पर भी प्रहार किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके पीछे बड़ी वाहन कंपनियों का कमीशन-आधारित दबाव हो सकता है, ताकि आम जनता ऑटो-रिक्शा छोड़कर महंगे विकल्पों की ओर जाने पर विवश हो।
सरनाईक का पलटवार
मंत्री सरनाईक ने अखिलेश यादव के बयान को सीधे खारिज करते हुए कहा, 'मुंबई, ठाणे और पूरे महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गैर-मराठी लोग काम कर रहे हैं और हम सभी का स्वागत करते हैं।' उन्होंने आगे कहा कि महायुति सरकार रोजगार देने वाली सरकार है, रोजगार छीनने वाली नहीं। साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि महाराष्ट्र की अपनी मराठी पहचान और गौरव है, और हर राज्य में वहाँ की संस्कृति व भाषा का सम्मान होना चाहिए।
सरनाईक ने यह भी कहा कि न केवल उत्तर प्रदेश और बिहार, बल्कि देश के अन्य राज्यों से भी लोग महाराष्ट्र में आजीविका के लिए आते हैं — और यह इस बात का प्रमाण है कि महाराष्ट्र रोजगार का केंद्र है।
शिवसेना की मध्यस्थ भूमिका
इस बीच, शिवसेना के प्रवक्ता संजय निरुपम ने परिवहन मंत्री सरनाईक को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें गैर-मराठी भाषी ऑटो-रिक्शा चालकों को मराठी सीखने के लिए अतिरिक्त समय देने का आग्रह किया गया। निरुपम ने कहा कि शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व से ही पार्टी का यह स्पष्ट मत रहा है कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा का सम्मान अनिवार्य है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पर जबरदस्ती का सवाल नहीं उठता, लेकिन महाराष्ट्र में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम बुनियादी मराठी की जानकारी होनी चाहिए। निरुपम ने कहा कि जिन चालकों ने अभी तक मराठी नहीं सीखी है, उन्हें एक और अवसर दिया जाना चाहिए — तत्काल कड़ी कार्रवाई के वे पक्षधर नहीं हैं।
आम जनता और चालकों पर असर
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 85 प्रतिशत ऑटो चालकों ने तीन माह की निर्धारित समयसीमा में मराठी सीख ली है। शेष चालकों के लिए अतिरिक्त समय देने की माँग अब राजनीतिक रूप ले चुकी है। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब राज्य में भाषाई पहचान और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों पर बहस पहले से ही जारी है।
आगे क्या
शिवसेना के ज्ञापन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परिवहन मंत्री सरनाईक शेष चालकों को अतिरिक्त समयावधि देते हैं या नहीं। यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में भाषाई अस्मिता और प्रवासी श्रमिकों के बीच संतुलन की व्यापक बहस का हिस्सा बन चुका है, और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएँ आने की संभावना है।