प्रयागराज के अभिषेक शुक्ला: UPSC छोड़ चुना झुग्गी के 250 बच्चों का भविष्य, गुरु पूर्णिमा पर मिसाल
सारांश
मुख्य बातें
प्रयागराज के समाजसेवी अभिषेक शुक्ला ने सितंबर 2016 से अब तक झुग्गी-बस्तियों के 250 से अधिक बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा है — ऐसे बच्चे जो कभी भिक्षावृत्ति और नशे के चंगुल में थे। गुरु पूर्णिमा, 29 जुलाई के अवसर पर उनकी यह पहल पूरे उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है। खास बात यह है कि अभिषेक ने यह रास्ता चुनने के लिए अपनी यूपीएससी की तैयारी छोड़ दी।
कैसे हुई इस मुहिम की शुरुआत
अभिषेक शुक्ला ने बताया कि सितंबर 2016 में कोचिंग से लौटते वक्त चुंगी चौराहे पर उन्होंने एक छोटी बच्ची को भीख माँगते देखा। उस बच्ची के पीछे-पीछे जब वह उसकी बस्ती तक पहुँचे, तो वहाँ भिक्षावृत्ति और नशे में डूबे दर्जनों बच्चे मिले। अधिकांश बच्चे शिक्षा से पूरी तरह वंचित थे और केवल तभी घर से निकलते थे जब किसी के यहाँ काम करने जाना होता था।
जब उन्होंने बच्चों के माता-पिता के सामने पढ़ाई का प्रस्ताव रखा, तो शुरुआत में कड़ा विरोध हुआ। अभिभावकों का तर्क था कि पहले भी कई लोग मदद के नाम पर आए और चले गए, और बच्चों के पढ़ने जाने से घर का काम और खर्च कैसे चलेगा। लगातार बातचीत और प्रयासों से अभिषेक ने उन्हें मनाया। पाँच-छह बच्चों से शुरू हुआ यह सफर आज 250 से अधिक बच्चों तक पहुँच चुका है।
शिक्षा का अनूठा तरीका
अभिषेक ने महसूस किया कि कई बच्चे सरकारी स्कूलों में नामांकित तो हैं, लेकिन नियमित रूप से जाते नहीं — मुख्य कारण पढ़ाई में रुचि की कमी और अनुकूल माहौल का अभाव। इसलिए उन्होंने खेल-खेल में पढ़ाने और बच्चों की रुचि के अनुसार शिक्षा देने की पद्धति अपनाई। प्रतिदिन पाँच से छह घंटे की कक्षाएँ आयोजित की जाती हैं, जिनमें शिक्षा के साथ-साथ खेल, कला और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
कूड़ा बीनने वाले और भीख माँगने वाले सबसे छोटे बच्चों के लिए ₹1 में प्ले स्कूल भी संचालित किया जा रहा है, ताकि उन्हें शुरुआती स्तर से ही शिक्षा से जोड़ा जा सके। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब देश में वंचित तबके के बच्चों की स्कूल छोड़ने की दर अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
बच्चों की उपलब्धियाँ
अभिषेक के प्रयासों का असर अब ठोस नतीजों के रूप में सामने आ रहा है। दो बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और एक को नौकरी भी मिल चुकी है। नंदिनी, भूमि और आंचल जैसी बच्चियाँ खेल क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए खेलो इंडिया तक पहुँच चुकी हैं। जो बच्चे कभी कलम तक नहीं पकड़ पाए थे, उनमें से कुछ अब दूसरों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा कई बच्चे इंजीनियरिंग, नर्सिंग और फाइन आर्ट्स जैसे क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं।
UPSC छोड़ा, बच्चों का भविष्य चुना
अभिषेक ने बताया कि जब उन्होंने यह पहल शुरू की थी, तब उनका इरादा यूपीएससी की तैयारी के साथ-साथ बच्चों को थोड़ा समय देने का था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि दोनों जिम्मेदारियाँ एक साथ निभाना संभव नहीं है। एक निर्णायक मोड़ पर उन्होंने बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दी।
उन्होंने कहा, 'भले ही एक अभिषेक आईएएस नहीं बन पाएगा, लेकिन अगर उसकी कोशिशों से सैकड़ों बच्चे अपने सपने पूरे कर पाएँ, तो यह उससे बड़ी उपलब्धि है।' गौरतलब है कि यह फैसला उन्होंने तब लिया जब यूपीएससी की तैयारी छोड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं होता।
गुरु पूर्णिमा पर संदेश
अभिषेक का मानना है कि एक गुरु के लिए सबसे बड़ी खुशी वही होती है जब उसका शिष्य उससे आगे निकल जाए। खेलो इंडिया में बच्चियों को मेडल जीतते देखना और बच्चों को नौकरी व उच्च शिक्षा हासिल करते देखना उनके लिए सबसे भावुक और गर्व का क्षण होता है। उनकी यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा ही वह हथियार है जो किसी भी बच्चे की तकदीर बदल सकती है।