पंजाब अपहरण केस: 15 साल फरार हेड कांस्टेबल कश्मीर सिंह को सीबीआई अदालत ने सुनाई 5 साल की सजा
सारांश
मुख्य बातें
सीबीआई की विशेष अदालत, मोहाली ने 5 जुलाई 2026 को पंजाब पुलिस के तत्कालीन हेड कांस्टेबल कश्मीर सिंह को 1991 के बलजीत सिंह अपहरण मामले में दोषी ठहराते हुए पाँच वर्ष के कठोर कारावास और ₹10,000 के जुर्माने की सजा सुनाई। कश्मीर सिंह करीब 15 वर्षों तक कानून की गिरफ्त से बाहर रहा था और सीबीआई ने उसे 12 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 अगस्त 1991 की घटना से जुड़ा है, जब तत्कालीन थाना चबाल (जिला तरनतारन) के पुलिसकर्मियों पर आरोप है कि उन्होंने बलजीत सिंह को अपने साथ ले जाकर करीब 10 दिनों तक थाने में अवैध हिरासत में रखा। परिवार के सदस्य एक दिन छोड़कर उनसे मिलते रहे, लेकिन 10 दिन बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों ने बलजीत सिंह को अपनी हिरासत में रखने से ही इनकार कर दिया। तब से उनका कोई पता नहीं चल सका।
पीड़ित की पत्नी ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। हाईकोर्ट के 27 जनवरी 2006 के आदेश के अनुपालन में 20 मार्च 2006 को सीबीआई ने यह मामला दर्ज किया।
आरोपी और जाँच
याचिका में थाना चबाल के तत्कालीन एसएचओ सुबा सिंह, एएसआई दलबीर सिंह, हेड कांस्टेबल कश्मीर सिंह और कांस्टेबल रावल सिंह पर अपहरण और अवैध हिरासत के आरोप लगाए गए थे। सीबीआई ने जाँच पूरी कर 26 अप्रैल 2007 को आरोपपत्र दाखिल किया।
गौरतलब है कि सुनवाई के दौरान ही कश्मीर सिंह फरार हो गया था। अदालत ने 21 जुलाई 2010 को उसे भगोड़ा (प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर) घोषित कर दिया।
सह-आरोपियों को पहले मिल चुकी है सजा
सीबीआई की विशेष अदालत ने 29 मार्च 2023 को तीन अन्य आरोपियों — दलबीर सिंह, सुबा सिंह और रावल सिंह — को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को पाँच वर्ष के कठोर कारावास और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। कश्मीर सिंह के फरार रहने के कारण उसका मुकदमा अलग चलाया गया।
गिरफ्तारी और सजा
करीब डेढ़ दशक तक फरार रहने के बाद सीबीआई ने 12 नवंबर 2025 को कश्मीर सिंह को गिरफ्तार किया। 2 मार्च 2026 को उसके खिलाफ आरोप तय किए गए और अब अदालत ने उसे भी सह-आरोपियों के समान पाँच वर्ष के कठोर कारावास और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई है।
यह फैसला उन मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता का उदाहरण है जहाँ आरोपी दशकों तक कानून से बचते रहते हैं — सीबीआई की यह गिरफ्तारी और त्वरित सुनवाई संस्थागत दृढ़ता का संकेत देती है।