7 जुलाई 2026
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गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर: 32 साल बाद सीबीआई कोर्ट का फैसला, दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा

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गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर: 32 साल बाद सीबीआई कोर्ट का फैसला, दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा

सारांश

32 साल की कानूनी लड़ाई के बाद तरनतारन के गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर मामले में सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा सुनाई। पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियानों के दौर में हुई इस ज्यादती का यह फैसला अन्य पीड़ित परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बना है।

मुख्य बातें

तरनतारन के गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर मामले में 32 वर्षों बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया।
दोषी पुलिसकर्मियों — गुरबचन सिंह , हंसराज और रेशम सिंह — को 20-20 साल की सजा और जुर्माना।
गुरनाम सिंह पंजाब होमगार्ड्स में कार्यरत थे और घटना के समय केवल 18-19 वर्ष के थे।
न्याय की लड़ाई में खालड़ा मिशन कमेटी ने परिवार का साथ दिया और सीबीआई ने चंडीगढ़ में मामला दर्ज किया।
परिवार को अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं होने दिया गया था — भाई सोहन सिंह ने यह दर्दनाक विवरण साझा किया।

तरनतारन के गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर मामले में 32 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद चंडीगढ़ की सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा और जुर्माना सुनाया है। यह फैसला उन परिवारों के लिए एक ऐतिहासिक पल है जिन्होंने पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियानों के काले दौर में अपने प्रियजनों को खोया था।

मामले की पृष्ठभूमि

गुरनाम सिंह के भाई सोहन सिंह ने बताया कि घटना के समय गुरनाम सिंह केवल 18-19 वर्ष के थे और 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद पंजाब होमगार्ड्स में जवान के रूप में सेवा दे रहे थे। सोहन सिंह के अनुसार, पंजाब होमगार्ड्स में कार्यरत होने के बावजूद पंजाब पुलिस ने उन्हें रात के अंधेरे में घर से उठा लिया।

सोहन सिंह ने बताया, 'उसे करीब 7-8 दिनों तक सिटी थाने में रखा गया और फिर आठ दिन बाद उसका फर्जी एनकाउंटर कर दिया गया।' उन्होंने आगे कहा, 'उस समय के थाना प्रभारी गुरबचन सिंह और उनके साथ हंसराजरेशम सिंह ने मिलकर झूठा पुलिस मुकाबला दिखाया। उन्होंने हमारे भाई का अंतिम संस्कार भी हमें बिना बताए श्मशान घाट में कर दिया — हमें उसका अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिया।'

न्याय की लंबी लड़ाई

सोहन सिंह के अनुसार, इस संघर्ष में खालड़ा मिशन कमेटी ने परिवार का साथ दिया। सीबीआई ने मामले की जाँच कर चंडीगढ़ की सीबीआई अदालत में केस दर्ज किया। इसके बाद करीब 32 वर्षों तक यह मामला अदालत में चलता रहा।

यह ऐसे समय में आया है जब पंजाब के उस दौर के फर्जी एनकाउंटर मामले एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में हैं। गौरतलब है कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में आतंकवाद-विरोधी अभियानों के दौरान कथित तौर पर अनेक फर्जी मुठभेड़ें हुईं, जिनमें निर्दोष युवाओं को निशाना बनाया गया।

दोषी पुलिसकर्मियों को सजा

सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया। सोहन सिंह ने कहा, 'इस फैसले से हमारे मन को कुछ शांति मिली कि दोषी पुलिसकर्मियों को उनके अपराध की सजा मिली। उन्होंने झूठे पुलिस मुकाबले दिखाकर अपनी तरक्कियाँ हासिल कीं और न जाने कितने परिवारों को उजाड़ दिया।'

सामाजिक संदर्भ और आलोचना

सोहन सिंह ने यह भी कहा कि जो फिल्में उस दौर की घटनाओं को दर्शाती हैं और जन-जागरूकता फैलाती हैं, उन पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाना गलत है। उनके इस बयान को उस व्यापक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है जो पंजाब के उस काले अध्याय की ऐतिहासिक स्मृति और जवाबदेही के इर्द-गिर्द चल रही है।

आगे की राह

इस फैसले के बाद पंजाब के अन्य फर्जी एनकाउंटर पीड़ित परिवारों में भी न्याय की उम्मीद जगी है। 7 जुलाई 2026 को आए इस निर्णय को मानवाधिकार संगठन एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देख रहे हैं, जो यह स्थापित करता है कि राज्य-प्रायोजित अत्याचारों के लिए दशकों बाद भी जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इस बीच कितने परिवार बिना फैसले के ही टूट गए? यह मामला यह भी रेखांकित करता है कि नागरिक समाज संगठनों — जैसे खालड़ा मिशन कमेटी — की भूमिका के बिना ऐसे मामले दफन हो जाते। असली परीक्षा अब यह है कि इस मिसाल का लाभ अन्य लंबित फर्जी एनकाउंटर मामलों को मिलेगा या नहीं।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर मामला क्या है?
यह तरनतारन के एक युवक गुरनाम सिंह का मामला है, जो पंजाब होमगार्ड्स में जवान थे और 18-19 वर्ष की आयु में पंजाब पुलिस द्वारा घर से उठाए जाने के बाद 7-8 दिन बाद फर्जी मुठभेड़ में मारे गए थे। 32 साल बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा सुनाई।
इस मामले में किन पुलिसकर्मियों को सजा मिली?
सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने तत्कालीन थाना प्रभारी गुरबचन सिंह और उनके साथियों हंसराज व रेशम सिंह को दोषी पाया और उन्हें 20-20 साल की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया।
इस मामले में न्याय दिलाने में इतना समय क्यों लगा?
मामले की जाँच सीबीआई ने की और चंडीगढ़ की सीबीआई अदालत में केस दर्ज हुआ, जिसके बाद करीब 32 वर्षों तक सुनवाई चलती रही। खालड़ा मिशन कमेटी ने परिवार का साथ देकर इस लंबी कानूनी लड़ाई को जारी रखने में मदद की।
खालड़ा मिशन कमेटी की इस मामले में क्या भूमिका रही?
खालड़ा मिशन कमेटी ने गुरनाम सिंह के परिवार को न्याय की लड़ाई में सहयोग दिया। परिवार के अनुसार, इस संगठन के समर्थन के बिना दशकों लंबी यह कानूनी लड़ाई जारी रखना संभव नहीं होता।
इस फैसले का पंजाब के अन्य फर्जी एनकाउंटर पीड़ितों पर क्या असर होगा?
यह फैसला एक कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जो यह स्थापित करता है कि दशकों बाद भी राज्य-प्रायोजित अत्याचारों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है। मानवाधिकार संगठनों को उम्मीद है कि इससे पंजाब के उस दौर के अन्य लंबित मामलों में भी न्याय का रास्ता खुलेगा।
राष्ट्र प्रेस
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