गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर: 32 साल बाद सीबीआई कोर्ट का फैसला, दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा
सारांश
मुख्य बातें
तरनतारन के गुरनाम सिंह फर्जी एनकाउंटर मामले में 32 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद चंडीगढ़ की सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा और जुर्माना सुनाया है। यह फैसला उन परिवारों के लिए एक ऐतिहासिक पल है जिन्होंने पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियानों के काले दौर में अपने प्रियजनों को खोया था।
मामले की पृष्ठभूमि
गुरनाम सिंह के भाई सोहन सिंह ने बताया कि घटना के समय गुरनाम सिंह केवल 18-19 वर्ष के थे और 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद पंजाब होमगार्ड्स में जवान के रूप में सेवा दे रहे थे। सोहन सिंह के अनुसार, पंजाब होमगार्ड्स में कार्यरत होने के बावजूद पंजाब पुलिस ने उन्हें रात के अंधेरे में घर से उठा लिया।
सोहन सिंह ने बताया, 'उसे करीब 7-8 दिनों तक सिटी थाने में रखा गया और फिर आठ दिन बाद उसका फर्जी एनकाउंटर कर दिया गया।' उन्होंने आगे कहा, 'उस समय के थाना प्रभारी गुरबचन सिंह और उनके साथ हंसराज व रेशम सिंह ने मिलकर झूठा पुलिस मुकाबला दिखाया। उन्होंने हमारे भाई का अंतिम संस्कार भी हमें बिना बताए श्मशान घाट में कर दिया — हमें उसका अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिया।'
न्याय की लंबी लड़ाई
सोहन सिंह के अनुसार, इस संघर्ष में खालड़ा मिशन कमेटी ने परिवार का साथ दिया। सीबीआई ने मामले की जाँच कर चंडीगढ़ की सीबीआई अदालत में केस दर्ज किया। इसके बाद करीब 32 वर्षों तक यह मामला अदालत में चलता रहा।
यह ऐसे समय में आया है जब पंजाब के उस दौर के फर्जी एनकाउंटर मामले एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में हैं। गौरतलब है कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में आतंकवाद-विरोधी अभियानों के दौरान कथित तौर पर अनेक फर्जी मुठभेड़ें हुईं, जिनमें निर्दोष युवाओं को निशाना बनाया गया।
दोषी पुलिसकर्मियों को सजा
सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को 20-20 साल की सजा के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया। सोहन सिंह ने कहा, 'इस फैसले से हमारे मन को कुछ शांति मिली कि दोषी पुलिसकर्मियों को उनके अपराध की सजा मिली। उन्होंने झूठे पुलिस मुकाबले दिखाकर अपनी तरक्कियाँ हासिल कीं और न जाने कितने परिवारों को उजाड़ दिया।'
सामाजिक संदर्भ और आलोचना
सोहन सिंह ने यह भी कहा कि जो फिल्में उस दौर की घटनाओं को दर्शाती हैं और जन-जागरूकता फैलाती हैं, उन पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाना गलत है। उनके इस बयान को उस व्यापक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है जो पंजाब के उस काले अध्याय की ऐतिहासिक स्मृति और जवाबदेही के इर्द-गिर्द चल रही है।
आगे की राह
इस फैसले के बाद पंजाब के अन्य फर्जी एनकाउंटर पीड़ित परिवारों में भी न्याय की उम्मीद जगी है। 7 जुलाई 2026 को आए इस निर्णय को मानवाधिकार संगठन एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देख रहे हैं, जो यह स्थापित करता है कि राज्य-प्रायोजित अत्याचारों के लिए दशकों बाद भी जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।