बाबा रामदेव का बड़ा ऐलान: सनातन ग्रंथों की मिलावट हटाई जाएगी, वेद जातिभेद नहीं सिखाते
सारांश
मुख्य बातें
योग गुरु स्वामी रामदेव ने 29 अक्टूबर 2026 को हरिद्वार स्थित पतंजलि योगपीठ में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन में सनातन ग्रंथों के व्यापक परिशोधन की घोषणा की। उन्होंने कहा कि मुगल और ब्रिटिश काल में स्मृतियों, पुराणों, रामायण और महाभारत में जो मिलावट और गलत व्याख्याएँ की गईं, उन्हें विद्वानों की एक विशेष समिति के माध्यम से दूर किया जाएगा। रामदेव के अनुसार, सनातन धर्म भारत की आत्मा है और वेद किसी भी प्रकार के जातिभेद का समर्थन नहीं करते।
परिशोधन का स्वरूप और समिति का गठन
स्वामी रामदेव ने घोषणा की कि पतंजलि योगपीठ और पतंजलि विश्वविद्यालय के परिसर में पूज्य शंकराचार्यों, जगद्गुरुओं तथा सभी मठ-पंथ-संप्रदायों के प्रमुख धर्माचार्यों की उपस्थिति में विद्वानों की एक बड़ी समिति गठित की जाएगी। यह समिति शास्त्रों में हुए प्रक्षेप — चाहे वह स्मृति ग्रंथों में हो, पुराणों में हो या रामायण-महाभारत में — को चिह्नित कर उसका निवारण करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों में किसी प्रकार की मिलावट की आशंका नहीं है; शेष ग्रंथों में बाहरी हस्तक्षेप की संभावना को लेकर यह पहल की जा रही है।
जाति और सनातन दर्शन पर रामदेव का मत
स्वामी रामदेव ने अपने संबोधन में कहा, 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं।' उनके अनुसार वेदों में जड़-चेतन, जीव-जगत, स्त्री-पुरुष अथवा शूद्र के नाम पर किसी प्रकार का भेद नहीं है। उन्होंने कहा कि सनातन दर्शन, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों का मूल तत्वार्थ यही है कि 'सभी जातियाँ, सभी संप्रदाय, सारा ब्रह्मांड और सभी देवी-देवता हमारे भीतर हैं।' गौरतलब है कि यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब देश में जातिगत जनगणना और आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस तीव्र है।
सनातन को 'भारत की आत्मा' बताने का संदर्भ
रामदेव ने कहा कि 'भारत की आत्मा सनातन है' और जो लोग इस पर प्रहार करते हैं वे 'बौद्धिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आतंकवादी' हैं। उन्होंने कहा कि यदि भारत को विश्व में सम्मान के साथ खड़ा होना है, तो जात-पात, ऊँच-नीच और मजहबी विभाजनों से ऊपर उठकर देश को आर्थिक, वैज्ञानिक और सैन्य रूप से सबसे शक्तिशाली बनाने का संकल्प लेना होगा। उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया कि वे 'मैं भारत हूँ, मैं भारत का लोकतंत्र हूँ, मैं भारत का संविधान हूँ' की भावना को आत्मसात करें।
सम्मेलन का व्यापक उद्देश्य
स्वामी रामदेव के अनुसार इस अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का मूल उद्देश्य यह है कि सनातन धर्म शाश्वत होने के साथ-साथ वर्तमान चुनौतियों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि सनातन की विरासत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर एक विकसित और परम वैभवशाली भारत का निर्माण किया जाएगा। यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ जब सनातन धर्म को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक विमर्श तेज हो रहा है।
आगे क्या होगा
शुक्रवार को पतंजलि योगपीठ में शंकराचार्यों, जगद्गुरुओं और विद्वानों की उपस्थिति में इस परिशोधन प्रक्रिया की विधिवत रूपरेखा तय करने के लिए एक बड़ा निर्णय लिए जाने की घोषणा रामदेव ने की है। इस पहल का स्वरूप और समिति की संरचना उसी बैठक में स्पष्ट होने की संभावना है। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि विभिन्न सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस प्रक्रिया में किस हद तक सहमति और सहभागिता दिखाते हैं।