चुनाव आयोग पर विवाद: रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह बोले — संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाना उचित नहीं
सारांश
मुख्य बातें
रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने 6 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि देश की संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पर सवाल उठा रहे हैं।
संवैधानिक संस्थाओं पर हमले को लेकर चेतावनी
रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा कि कुछ संगठनों के लोग यह कह रहे थे कि पहले ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेंगे और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का। उन्होंने कहा, 'मैं समझता हूँ कि इस देश में बोलने की आज़ादी है, इसलिए लोग बोलते हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी भी देश में इतनी बोलने की आज़ादी है।' उनका स्पष्ट संदेश था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग संस्थाओं को अस्थिर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
घुसपैठियों और वोटर लिस्ट का मुद्दा
रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने अवैध प्रवासियों के मतदाता सूची में शामिल होने के प्रश्न को भी गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में कई बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रहते पाए गए हैं और यह जाँच होनी चाहिए कि क्या उनके पास वोटर आईडी है और क्या वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अनधिकृत रूप से रह रहे लोगों का मतदाता बनना देश की व्यवस्था और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।
वोट देने का अधिकार — संवैधानिक या कानूनी?
रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने एक महत्त्वपूर्ण कानूनी पहलू उजागर किया। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक कानूनी अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके पास अपील का विकल्प उपलब्ध है — वे भारत निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय दोनों का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल ट्रिब्यूनल और तकनीकी दिक्कतें
पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल न्यायाधीशों की शिकायतों पर रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने कहा कि जजों को अपनी समस्याएँ सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखनी चाहिए और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के जज भारत निर्वाचन आयोग से भी बातचीत कर समाधान निकाल सकते हैं, क्योंकि पोर्टल की तकनीकी पेचीदगियाँ न्यायिक काम से अलग हैं।
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की चेतावनी
सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले पर याचिका दायर करने वाले वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा कि वोटर्स को उनके अधिकारों से वंचित न होने देना पूरी तरह भारत निर्वाचन आयोग की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि पोर्टल में दस्तावेज़ अपलोड न होना, नोटिस न भेज पाना और वर्चुअल सुनवाई न हो पाना — ये सभी गंभीर खामियाँ हैं, जिनसे अपीलों की सुनवाई लगभग ठप हो गई है। त्रिपाठी ने कहा कि इन कमियों के बने रहने पर सुप्रीम कोर्ट के जून 2026 के आदेश के तहत बने 19 ट्रिब्यूनलों का कामकाज प्रभावित होगा और चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठना तय है। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय उठा है जब देश में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पहले से ही बहस छिड़ी हुई है।
आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में किस तरह का निर्देश जारी करता है और भारत निर्वाचन आयोग पोर्टल की तकनीकी खामियाँ दूर करने में कितना समय लेता है।