6 अक्टूबर 2026
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चुनाव आयोग पर विवाद: रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह बोले — संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाना उचित नहीं

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चुनाव आयोग पर विवाद: रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह बोले — संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाना उचित नहीं

सारांश

चुनाव आयोग पर विपक्ष के हमले के बीच रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने दो-टूक कहा — संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने अवैध प्रवासियों के मतदाता सूची में दर्ज होने के मुद्दे पर गंभीर जाँच की माँग की।

मुख्य बातें

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने 6 अक्टूबर 2026 को कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के वोटर आईडी और सरकारी योजनाओं के लाभ की जाँच की माँग की।
रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं , बल्कि एक कानूनी अधिकार है।
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल पोर्टल की तकनीकी खामियों से 19 ट्रिब्यूनलों की सुनवाई लगभग ठप है।
पोर्टल में दस्तावेज़ अपलोड न होना, नोटिस न भेज पाना और वर्चुअल सुनवाई बाधित होना — इन समस्याओं की जड़ भारत निर्वाचन आयोग की तैयारी को बताया गया।

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने 6 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि देश की संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पर सवाल उठा रहे हैं।

संवैधानिक संस्थाओं पर हमले को लेकर चेतावनी

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा कि कुछ संगठनों के लोग यह कह रहे थे कि पहले ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेंगे और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का। उन्होंने कहा, 'मैं समझता हूँ कि इस देश में बोलने की आज़ादी है, इसलिए लोग बोलते हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी भी देश में इतनी बोलने की आज़ादी है।' उनका स्पष्ट संदेश था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग संस्थाओं को अस्थिर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

घुसपैठियों और वोटर लिस्ट का मुद्दा

रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने अवैध प्रवासियों के मतदाता सूची में शामिल होने के प्रश्न को भी गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में कई बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रहते पाए गए हैं और यह जाँच होनी चाहिए कि क्या उनके पास वोटर आईडी है और क्या वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अनधिकृत रूप से रह रहे लोगों का मतदाता बनना देश की व्यवस्था और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

वोट देने का अधिकार — संवैधानिक या कानूनी?

रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने एक महत्त्वपूर्ण कानूनी पहलू उजागर किया। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक कानूनी अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके पास अपील का विकल्प उपलब्ध है — वे भारत निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय दोनों का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।

पश्चिम बंगाल ट्रिब्यूनल और तकनीकी दिक्कतें

पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल न्यायाधीशों की शिकायतों पर रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने कहा कि जजों को अपनी समस्याएँ सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखनी चाहिए और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के जज भारत निर्वाचन आयोग से भी बातचीत कर समाधान निकाल सकते हैं, क्योंकि पोर्टल की तकनीकी पेचीदगियाँ न्यायिक काम से अलग हैं।

वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की चेतावनी

सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले पर याचिका दायर करने वाले वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा कि वोटर्स को उनके अधिकारों से वंचित न होने देना पूरी तरह भारत निर्वाचन आयोग की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि पोर्टल में दस्तावेज़ अपलोड न होना, नोटिस न भेज पाना और वर्चुअल सुनवाई न हो पाना — ये सभी गंभीर खामियाँ हैं, जिनसे अपीलों की सुनवाई लगभग ठप हो गई है। त्रिपाठी ने कहा कि इन कमियों के बने रहने पर सुप्रीम कोर्ट के जून 2026 के आदेश के तहत बने 19 ट्रिब्यूनलों का कामकाज प्रभावित होगा और चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठना तय है। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय उठा है जब देश में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पहले से ही बहस छिड़ी हुई है।

आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में किस तरह का निर्देश जारी करता है और भारत निर्वाचन आयोग पोर्टल की तकनीकी खामियाँ दूर करने में कितना समय लेता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

दूसरी तरफ घुसपैठियों और मतदाता सूची पर सत्तापक्ष के एजेंडे से मेल खाता बयान। यह संतुलन जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक जटिल है। वकील त्रिपाठी का पोर्टल-विफलता का विवरण इस पूरी बहस का सबसे ठोस पहलू है — अगर 19 ट्रिब्यूनल तकनीकी कारणों से काम नहीं कर पा रहे, तो संस्था की साख का सवाल महज राजनीतिक नहीं रहता। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक रही है वह यह है कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की अपील प्रक्रिया कितनी सुलभ है — अगर पोर्टल ही ठप है, तो 'अपील करो' की सलाह खोखली है।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने चुनाव आयोग पर क्या कहा?
रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने उन संगठनों की आलोचना की जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का इस्तीफा माँगने की बात कर रहे थे।
अवैध घुसपैठियों और वोटर लिस्ट पर जस्टिस सिंह का क्या मानना है?
रिटायर्ड जस्टिस सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के पास वोटर आईडी होने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की जाँच होनी चाहिए। उनका तर्क था कि अनधिकृत रूप से रह रहे लोगों का मतदाता बनना देश की व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
क्या मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार है?
रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह के अनुसार, मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक कानूनी अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटे हैं, वे भारत निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय दोनों के सामने अपील कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल पोर्टल में क्या समस्याएँ हैं?
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी के अनुसार, पोर्टल में दस्तावेज़ अपलोड न होना, नोटिस न भेजे जाना और वर्चुअल सुनवाई बाधित होना जैसी गंभीर खामियाँ हैं। इन समस्याओं से सुप्रीम कोर्ट के जून 2026 के आदेश के तहत बने 19 ट्रिब्यूनलों की सुनवाई लगभग ठप हो गई है।
चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी इस मामले में कितनी है?
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने स्पष्ट कहा कि वोटर्स को उनके अधिकारों से वंचित न होने देना पूरी तरह भारत निर्वाचन आयोग की ज़िम्मेदारी है। उनका कहना था कि अगर ट्रिब्यूनल के जज पोर्टल इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, तो इसका सीधा असर चुनाव आयोग की साख पर पड़ेगा।
राष्ट्र प्रेस
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