विश्व योग दिवस 2025: सहज योग को यूनेस्को धरोहर और कानूनी संरक्षण देने की उठी माँग
सारांश
मुख्य बातें
विश्व योग दिवस (21 जून) से ठीक पहले, सहज योग को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित करने और इसके लिए एक सशक्त वैश्विक कानूनी ढाँचा तैयार करने की माँग सामने आई है। नई दिल्ली स्थित 'द लाइफ इटरनल ट्रस्ट' के पूर्व ट्रस्टी और 2004 से सहज योग के अभ्यासी अश्विनी कौशिक ने एक लेख में यह माँग उठाई है। उनका कहना है कि जहाँ वैश्विक समुदाय योग को मुख्यतः शारीरिक व्यायाम और तनाव प्रबंधन के माध्यम के रूप में देखता है, वहीं सहज योग को आधुनिक युग के 'महायोग' के रूप में स्वीकृति मिलनी चाहिए।
सहज योग की विशिष्टता और उसका दावा
लेख के अनुसार, श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा स्थापित सहज योग कोई सामान्य योग पद्धति नहीं है। इसे सामूहिक और सहज कुंडलिनी जागरण के माध्यम से लाखों लोगों को आत्म-साक्षात्कार का अनुभव कराने वाला अभूतपूर्व आध्यात्मिक आयाम बताया गया है। लेख में दावा किया गया है कि चक्रों की शुद्धि तथा सहानुभूति और परानुकंपी तंत्रिका तंत्र के संतुलन के ज़रिये यह पद्धति मानव जीवन में गहरा परिवर्तन लाने में सक्षम है।
लेख में एक साधक का उदाहरण दिया गया है, जो कथित तौर पर गंभीर मानसिक बीमारी और मिर्गी जैसे लक्षणों से पीड़ित था और एक महीने में 16 इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (ECT) सत्रों के बावजूद राहत नहीं मिली थी। दावा किया गया है कि सहज योग के अभ्यास के बाद वह व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ जीवन जी रहा है। हालाँकि, इस दावे की स्वतंत्र चिकित्सकीय पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
यूनेस्को मान्यता और वैश्विक संरक्षण की अपील
लेख में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं — विशेष रूप से यूनेस्को — से अपील की गई है कि सहज योग को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' के रूप में आधिकारिक मान्यता दी जाए। इसके साथ ही श्री माताजी द्वारा स्थापित आश्रमों, ध्यान केंद्रों और उनके निवास स्थलों को वैश्विक आध्यात्मिक धरोहर घोषित कर अंतरराष्ट्रीय संरक्षण देने की माँग भी रखी गई है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विरासत सुरक्षित रहे।
कानूनी ढाँचे और उत्तराधिकार पर ज़ोर
लेख में सुझाव दिया गया है कि सहज योग की मूल शिक्षाओं को कानूनी रूप से अपरिवर्तनीय सिद्धांतों के रूप में संरक्षित किया जाए, ताकि व्यक्तिगत व्याख्याओं, क्षेत्रीय मतभेदों या संगठनात्मक विभाजन से इसकी मूल भावना प्रभावित न हो। विश्वभर में ट्रस्ट कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को और मज़बूत बनाने की वकालत की गई है।
उत्तराधिकार के प्रश्न पर लेख में स्पष्ट रुख अपनाया गया है। इसके अनुसार, श्री माताजी निर्मला देवी ने कभी किसी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की और उनका आध्यात्मिक अधिकार किसी व्यक्ति, परिषद या जैविक परिवार को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। लेख में यह भी कहा गया है कि श्री माताजी के जैविक परिवार का संगठन, संपत्तियों अथवा आध्यात्मिक उत्तराधिकार पर कोई वंशानुगत अधिकार नहीं है।
साथ ही, श्री माताजी द्वारा भ्रमण किए गए आश्रमों और पवित्र स्थलों को अतिक्रमण, व्यावसायिक उपयोग, पारिवारिक विवाद या संपत्ति संबंधी दावों से स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए एक केंद्रीकृत वैश्विक ट्रस्ट व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।
वैश्विक सहज योग समुदाय से आह्वान
लेख के अंत में विश्व योग दिवस के अवसर पर वैश्विक सहज योग समुदाय से एकजुट होकर प्रयास करने का आह्वान किया गया है — सहज योग की मूल शिक्षाओं की रक्षा, पवित्र स्थलों के संरक्षण, मज़बूत कानूनी ढाँचे के निर्माण और वैश्विक मान्यता के लिए। लक्ष्य यह है कि यह आध्यात्मिक विरासत आने वाले हज़ारों वर्षों तक अक्षुण्ण बनी रहे। यह माँग ऐसे समय में आई है जब योग को लेकर वैश्विक स्तर पर नीतिगत और सांस्कृतिक विमर्श तेज़ हो रहा है।