संजय निरुपम का मदरसों पर सवाल: शिक्षा प्रणाली में समानता की आवश्यकता
सारांश
Key Takeaways
- मदरसों की संख्या घटाना आवश्यक है।
- शिक्षा प्रणाली को समान बनाना
- देश की मुख्यधारा में बच्चों को शामिल करना जरूरी है।
- राहुल गांधी का आरोप देश के हितों से समझौता करना।
- सरकारी दफ्तरों में नमाज पढ़ने पर विवाद।
मुंबई, 26 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रमुख संजय निरुपम ने हाल ही में मदरसा शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने राष्ट्र प्रेस से चर्चा करते हुए कहा, "भारत में एक कानून, एक संविधान और एक गवर्नेंस सिस्टम है, इसलिए शिक्षा प्रणाली को भी एक समान होना चाहिए।"
संजय निरुपम ने आगे कहा, "स्कूल और कॉलेजों, विशेषकर प्राइमरी और सेकेंडरी स्तर पर, इस तरह से बनाए गए हैं कि सभी छात्र देश की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। हालांकि, मदरसों में पढ़ाई अक्सर धार्मिक विषयों पर ज्यादा केंद्रित होती है, जिससे छात्र भारत से दूर हो जाते हैं।"
उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों को देश की मुख्यधारा में लाने और गवर्नेंस सिस्टम में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मदरसों की संख्या धीरे-धीरे घटानी चाहिए। उनका मानना है कि यह कदम छात्रों के भविष्य और राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी है। निरुपम ने यह भी कहा कि आधुनिक शिक्षा से वंचित बच्चे समाज में अलग-थलग पड़ सकते हैं और राष्ट्रीय विकास में योगदान नहीं कर पाते।
इसके अलावा, संजय निरुपम ने छात्र नेता उमर खालिद का उल्लेख करते हुए कहा कि युवा अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विशेष विचारधारा को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, जो देश के खिलाफ भावनाएं पैदा करती हैं।
उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा, यह आरोप लगाते हुए कि राहुल गांधी अपनी बातों पर जोर देते हुए अक्सर देश के हितों से समझौता करते हैं। जब कोई नेता देश के हित के खिलाफ जाता है, तो वह धीरे-धीरे देश विरोधी गतिविधियों से जुड़ सकता है, जैसा कि उमर खालिद के मामलों में देखा गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में मालेगांव महापालिका कार्यालय में लोग नमाज पढ़ते हुए पाए गए, और यह उचित नहीं है कि सरकारी दफ्तरों में नमाज पढ़ी जाए। अगर ऐसा करना है, तो इसके लिए विशेष अनुमति होनी चाहिए। अगर किसी को लगता है कि वहां देश का कानून नहीं चलता, तो यह पूरी तरह से गलत है।