14 सितंबर 2026
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संजय निषाद की चेतावनी: मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करने वाले मौसमी नेताओं से रहें सावधान

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संजय निषाद की चेतावनी: मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करने वाले मौसमी नेताओं से रहें सावधान

सारांश

विधानसभा चुनाव की आहट के बीच निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने एक्स पर तीखा प्रहार किया — बिना नाम लिए बिहार से आए 'मौसमी नेताओं' पर निशाना साधा और मछुआरा समुदाय को वोट-दलालों से सावधान रहने की अपील की।

मुख्य बातें

संजय निषाद ने 14 सितंबर 2026 को एक्स पर पोस्ट कर मछुआरा समाज को मौसमी नेताओं से आगाह किया।
उन्होंने बिना नाम लिए बिहार में वोटों की खरीद-बिक्री के लिए बदनाम लोगों पर उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को गुमराह करने का आरोप लगाया।
केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप के नाम पर भेद पैदा कर समुदाय को बाँटने की कोशिशों की निंदा की।
कहा — जो एक विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकता, वह नोटों की गड्डी लेकर यूपी के निषाद समाज को राजनीति सिखाने आया है।
पोस्ट के अंत में 'जय निषादराज' लिखकर समुदाय की एकजुटता का संदेश दिया।

उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने 14 सितंबर 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए मछुआरा समुदाय को आगाह किया कि वे वोटों की दलाली करने वाले मौसमी नेताओं को पहचानें और उनसे सावधान रहें। विधानसभा चुनाव की बढ़ती सरगर्मी के बीच डॉ. निषाद का यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुख्य बयान और आरोप

डॉ. निषाद ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि कुछ मौसमी नेता अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें मुंबई में व्यापार करना है, इधर-उधर घूमकर दूसरों की दरी बिछानी है, या मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करनी है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में मछुआरा समुदाय के वोटों की खरीद-बिक्री के लिए बदनाम और वहाँ समाज के राजनीतिक उभार को नुकसान पहुँचाने वाले लोग अब उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को गुमराह करने निकले हैं।

उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति खुद एक विधानसभा चुनाव जीतने की हैसियत नहीं रखता, वह जेब में नोटों की गड्डी लेकर लाल टोपी और नीली वर्दी पहनकर यूपी के निषाद समाज को राजनीति सिखाने निकला है।

समुदाय के स्वाभिमान पर जोर

डॉ. निषाद ने स्पष्ट कहा कि मछुआरा समुदाय पैसों पर बिकने वाली कौम नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि उत्तर प्रदेश के मछुआरों को राजनीति सिखाने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति और संघर्ष उनके खून में है। यह ऐसे समय में आया है जब विधानसभा चुनाव की आहट के साथ विभिन्न दल निषाद वोटबैंक को साधने की कोशिश में जुटे हैं।

ऐतिहासिक संघर्ष और आरक्षण की याद

डॉ. निषाद ने कहा कि मछुआरा समाज ने मुगलों और अंग्रेजों से लोहा लिया और देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान में समाज को अधिकार और आरक्षण मिला, लेकिन आपसी बिखराव के चलते उसका हक लुटता रहा। उन्होंने कहा कि आज भी केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप के नाम पर भेद पैदा कर समाज को एकजुट होने से रोकने की कोशिश की जा रही है।

गौरतलब है कि आज़ादी के बाद से ही निषाद समुदाय राजनीतिक रूप से बिखरा रहा है और उत्तर प्रदेश में इसे संगठित करने का श्रेय निषाद पार्टी अपने खाते में बताती है।

वोट-दलाली के विरुद्ध आह्वान

डॉ. निषाद ने समुदाय से अपील की कि दूसरे दलों से पैसा लेकर समाज के बीच बाँटने और वोटों का सौदा करने वालों को पहचाना जाए। उन्होंने कहा, 'मछुआरा गरीब जरूर है, लेकिन अपने स्वाभिमान और अधिकारों का सौदा करने वाला नहीं है।' पोस्ट के अंत में उन्होंने 'जय निषादराज' लिखा।

आने वाले विधानसभा चुनाव में निषाद वोटबैंक की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है और डॉ. निषाद का यह बयान समुदाय के भीतर संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल में यह निषाद पार्टी की चुनावी घेराबंदी है — विरोधी समुदाय-नेताओं को 'बाहरी' और 'बिकाऊ' ठहराकर अपनी एकाधिकारी पकड़ सुनिश्चित करने की कोशिश। गौरतलब है कि 'बिहार से आए' का इशारा किसी एक नेता की ओर हो सकता है जिसकी पहचान अभी सार्वजनिक नहीं है, जो इस बयान की जवाबदेही को कम करता है। वहीं, यह सवाल भी उठता है कि जब खुद सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पार्टी के नेता 'वोट-दलाली' की बात करते हैं, तो जिम्मेदारी और पारदर्शिता की माँग सभी दिशाओं में समान रूप से होनी चाहिए।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. संजय निषाद ने मछुआरा समाज को किससे सावधान रहने की नसीहत दी?
डॉ. संजय निषाद ने मछुआरा समाज को उन मौसमी नेताओं से सावधान रहने की नसीहत दी जो अन्य दलों से पैसा लेकर समुदाय के वोटों की दलाली करते हैं। उन्होंने विशेष रूप से बिहार में वोट-खरीद के लिए बदनाम लोगों का ज़िक्र किया जो अब उत्तर प्रदेश में सक्रिय बताए जा रहे हैं।
संजय निषाद ने यह बयान कब और कहाँ दिया?
डॉ. संजय निषाद ने 14 सितंबर 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर यह बयान दिया। पोस्ट में उन्होंने बिना नाम लिए कई आरोप लगाए और 'जय निषादराज' लिखकर समाप्त किया।
निषाद समाज में केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप का भेद क्यों मायने रखता है?
ये सभी उपजातियाँ मछुआरा समुदाय के अंतर्गत आती हैं और एकजुट होने पर उत्तर प्रदेश में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन सकती हैं। डॉ. निषाद का कहना है कि इन्हीं उपजाति-भेदों का इस्तेमाल कर समाज को बाँटने और उसकी राजनीतिक शक्ति को कमज़ोर करने की कोशिश होती है।
यह बयान उत्तर प्रदेश की आगामी राजनीति के लिए क्यों अहम है?
विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच निषाद समुदाय को एक निर्णायक वोटबैंक माना जाता है। डॉ. निषाद का यह बयान समुदाय के भीतर प्रतिस्पर्धी नेतृत्व को नकारने और निषाद पार्टी की एकाधिकारी पहचान मज़बूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
निषाद पार्टी का उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या स्थान है?
निषाद पार्टी उत्तर प्रदेश में मछुआरा, केवट, मल्लाह और संबंधित समुदायों की प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है और सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है। डॉ. संजय निषाद राज्य के कैबिनेट मंत्री हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
राष्ट्र प्रेस
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