संजय निषाद की चेतावनी: मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करने वाले मौसमी नेताओं से रहें सावधान
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने 14 सितंबर 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए मछुआरा समुदाय को आगाह किया कि वे वोटों की दलाली करने वाले मौसमी नेताओं को पहचानें और उनसे सावधान रहें। विधानसभा चुनाव की बढ़ती सरगर्मी के बीच डॉ. निषाद का यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्य बयान और आरोप
डॉ. निषाद ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि कुछ मौसमी नेता अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें मुंबई में व्यापार करना है, इधर-उधर घूमकर दूसरों की दरी बिछानी है, या मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करनी है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में मछुआरा समुदाय के वोटों की खरीद-बिक्री के लिए बदनाम और वहाँ समाज के राजनीतिक उभार को नुकसान पहुँचाने वाले लोग अब उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को गुमराह करने निकले हैं।
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति खुद एक विधानसभा चुनाव जीतने की हैसियत नहीं रखता, वह जेब में नोटों की गड्डी लेकर लाल टोपी और नीली वर्दी पहनकर यूपी के निषाद समाज को राजनीति सिखाने निकला है।
समुदाय के स्वाभिमान पर जोर
डॉ. निषाद ने स्पष्ट कहा कि मछुआरा समुदाय पैसों पर बिकने वाली कौम नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि उत्तर प्रदेश के मछुआरों को राजनीति सिखाने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति और संघर्ष उनके खून में है। यह ऐसे समय में आया है जब विधानसभा चुनाव की आहट के साथ विभिन्न दल निषाद वोटबैंक को साधने की कोशिश में जुटे हैं।
ऐतिहासिक संघर्ष और आरक्षण की याद
डॉ. निषाद ने कहा कि मछुआरा समाज ने मुगलों और अंग्रेजों से लोहा लिया और देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान में समाज को अधिकार और आरक्षण मिला, लेकिन आपसी बिखराव के चलते उसका हक लुटता रहा। उन्होंने कहा कि आज भी केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप के नाम पर भेद पैदा कर समाज को एकजुट होने से रोकने की कोशिश की जा रही है।
गौरतलब है कि आज़ादी के बाद से ही निषाद समुदाय राजनीतिक रूप से बिखरा रहा है और उत्तर प्रदेश में इसे संगठित करने का श्रेय निषाद पार्टी अपने खाते में बताती है।
वोट-दलाली के विरुद्ध आह्वान
डॉ. निषाद ने समुदाय से अपील की कि दूसरे दलों से पैसा लेकर समाज के बीच बाँटने और वोटों का सौदा करने वालों को पहचाना जाए। उन्होंने कहा, 'मछुआरा गरीब जरूर है, लेकिन अपने स्वाभिमान और अधिकारों का सौदा करने वाला नहीं है।' पोस्ट के अंत में उन्होंने 'जय निषादराज' लिखा।
आने वाले विधानसभा चुनाव में निषाद वोटबैंक की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है और डॉ. निषाद का यह बयान समुदाय के भीतर संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।