सरदार पटेल की 151वीं जयंती: पत्नी के निधन की खबर जेब में रखकर जीता केस, आजीवन नहीं किया पुनर्विवाह
सारांश
मुख्य बातें
सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती 31 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में पूरे देश में मनाई जाएगी। भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहे पटेल का जीवन केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था — उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ प्रसंग उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मसंयम की अद्वितीय मिसाल पेश करते हैं। इन्हीं में से एक है वह किस्सा जब उन्हें कोर्ट की बहस के दौरान पत्नी के निधन की सूचना मिली और उन्होंने वह चिट चुपचाप जेब में रख ली।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा था। आर्थिक रूप से सीमित परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने 1897 में नडियाद हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
विश्वविद्यालय में महंगी शिक्षा लेने में असमर्थ पटेल ने 'डिस्ट्रिक्ट प्लीडर' की परीक्षा पास कर वकालत का अधिकार प्राप्त किया। अपने बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल की सहायता करने और अपना करियर संवारने के उद्देश्य से वे अगस्त 1910 में इंग्लैंड रवाना हुए।
लंदन में शिक्षा और वापसी
इंग्लैंड में उन्होंने लंदन के मिडिल टेंपल इन में दाखिला लिया। उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने 36 महीने के पाठ्यक्रम को मात्र 30 महीनों में पूरा किया और परीक्षा में प्रथम श्रेणी हासिल की। 1913 में भारत लौटकर उन्होंने अहमदाबाद में वकालत आरंभ की, जहाँ शीघ्र ही उनकी पहचान एक कुशल और निर्भीक वकील के रूप में बन गई।
पारिवारिक जीवन और पत्नी का निधन
1893 में वल्लभभाई पटेल का विवाह झवेरबा पटेल से हुआ। दंपति की दो संतानें थीं — बेटी मणिबेन पटेल (जन्म 1904) और बेटे दह्याभाई पटेल (जन्म 1905)। 1909 में झवेरबा को गंभीर बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में इलाज के दौरान एक ऑपरेशन में उनका निधन हो गया।
गौरतलब है कि पत्नी का निधन कैंसर की वजह से हुआ था। उनकी असामयिक मृत्यु ने पटेल को भीतर से झकझोर दिया, फिर भी उन्होंने अपने दुख को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से पहले अपने दायित्वों को पूरा करना उचित समझा।
वह ऐतिहासिक किस्सा — चिट और कोर्टरूम
जिस समय अस्पताल में झवेरबा का निधन हुआ, उस समय वल्लभभाई कोर्ट में एक महत्त्वपूर्ण मुकदमे की बहस में व्यस्त थे। बहस के बीच में ही एक व्यक्ति आया और उन्हें एक चिट थमाई। उस पर्ची पर उनकी पत्नी के निधन का समाचार अंकित था।
पटेल ने चिट पढ़ी, उसे चुपचाप जेब में रखा और बहस जारी रखी। केस जीतने के बाद जब अदालती कार्यवाही समाप्त हुई, तब उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को पत्नी के निधन की जानकारी दी। यह जानकर वहाँ मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। यह प्रसंग उनके असाधारण आत्मनियंत्रण और कर्तव्यनिष्ठा का जीवंत प्रमाण बन गया।
आजीवन नहीं किया पुनर्विवाह
झवेरबा के निधन के पश्चात् सरदार पटेल ने जीवनभर दूसरा विवाह नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम, राजनीतिक दायित्वों और देश के एकीकरण की ऐतिहासिक चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी पुत्री मणिबेन पटेल को अपनी निकटतम सहयोगी के रूप में साथ रखा। मणिबेन ने उनके जीवनकाल में उनकी व्यक्तिगत सचिव की भूमिका निभाई। यह पहलू उनके व्यक्तित्व के उस आयाम को उजागर करता है जो अक्सर उनकी राजनीतिक विरासत की चर्चा में पीछे छूट जाता है।
31 अक्टूबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय एकता दिवस इस महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर है — जिन्होंने 562 से अधिक रियासतों को एकीकृत कर आधुनिक भारत की भौगोलिक संरचना को आकार दिया।