बेरोजगारी दर 11 महीने के उच्चतम स्तर पर: जीतू पटवारी ने सरकार के विकास मॉडल को बताया 'कागजी'
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने 16 जून 2025 को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश का विकास मॉडल जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। उन्होंने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के ताज़ा आँकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकार केवल आँकड़ों की बाजीगरी में लगी है, जबकि युवा रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।
NSO के आँकड़े क्या कहते हैं
पटवारी ने सोशल मीडिया पर साझा किए अपने बयान में कहा कि मई 2025 में देश की बेरोज़गारी दर बढ़कर 5.5 प्रतिशत हो गई, जो 11 महीनों का सबसे ऊँचा स्तर है। उनके अनुसार, NSO के आँकड़े सरकार के दावों की पोल खोलते हैं।
आँकड़ों के अनुसार, लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) भी 55 प्रतिशत से घटकर 54.4 प्रतिशत पर आ गया है। इसके साथ ही रोज़गार-जनसंख्या अनुपात गिरकर महज 51.4 प्रतिशत रह गया है। पटवारी ने कहा कि काम की तलाश करने वालों की संख्या में आई यह गिरावट दर्शाती है कि युवाओं का रोज़गार मिलने से भरोसा टूट चुका है।
2014 के चुनावी वादों पर सवाल
कांग्रेस के मध्य प्रदेश अध्यक्ष ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 2014 लोकसभा चुनाव से पहले किए गए वादों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि यह वही सरकार है जिसने हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा बार-बार दोहराया, लेकिन आज की स्थिति इसके उलट है।
गौरतलब है कि रोज़गार सृजन का मुद्दा पिछले एक दशक से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है, और विपक्ष इसे सत्ता पक्ष के खिलाफ एक प्रमुख हथियार के रूप में उठाता रहा है।
युवाओं की स्थिति पर चिंता
पटवारी ने कहा कि जब अर्थव्यवस्था में वृद्धि और रिकॉर्ड निवेश के दावे हो रहे हैं, तो युवाओं के लिए नौकरियाँ कहाँ हैं? उनके अनुसार, युवा डिग्रियाँ लेकर भटक रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाएँ पेपर लीक की भेंट चढ़ रही हैं और संविदा भर्ती स्थायी रोज़गार की जगह ले रही है।
उन्होंने कहा, 'सरकार की सबसे बड़ी विफलता महंगाई नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों की हत्या है।' आलोचकों का कहना है कि GDP वृद्धि के दावों और वास्तविक रोज़गार सृजन के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
आगे क्या
NSO के इन आँकड़ों के सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से रोज़गार नीति पर श्वेतपत्र जारी करने की माँग तेज कर दी है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी चल रही है और रोज़गार एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है।