सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: राजमिस्त्री के पैर कटने को 100% फंक्शनल डिसेबिलिटी माना, मुआवजा ₹40.29 लाख किया
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 जून 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में फंक्शनल डिसेबिलिटी (काम करने की क्षमता में कमी) को शारीरिक विकलांगता के प्रतिशत से अलग और अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। तमिलनाडु के राजमिस्त्री एम. परमेश का मुआवजा मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा तय ₹29.01 लाख से बढ़ाकर ₹40.29 लाख कर दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
18 अप्रैल 2017 को तमिलनाडु के नमक्कल-सेलम नेशनल हाईवे पर एक लॉरी ने परमेश की साइकिल को पीछे से टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में उनके सिर, जबड़े, आँख और दाहिने पैर में गंभीर चोटें आईं। चोटों की गंभीरता के चलते अंततः उनका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। उस समय परमेश की आयु लगभग 30 वर्ष थी।
परमेश ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में ₹25 लाख के मुआवजे की माँग की। MACT ने 2019 में उनकी मासिक आय ₹6,000 मानकर और 70 प्रतिशत विकलांगता के आधार पर कमाई की क्षमता के नुकसान का आकलन करते हुए केवल ₹10.84 लाख का मुआवजा तय किया।
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का रुख
अपील पर मद्रास उच्च न्यायालय ने मासिक आय को बढ़ाकर ₹12,000 किया और भविष्य की संभावनाओं के लिए 40 प्रतिशत अतिरिक्त राशि जोड़ते हुए मुआवजा ₹23.86 लाख निर्धारित किया। बाद में इसे संशोधित कर ₹29.01 लाख किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय की गणना में कई कमियाँ पाईं। अदालत ने गौर किया कि भविष्य की संभावनाओं का आकलन MACT के मूल मूल्यांकन के आधार पर किया गया था, न कि उच्च न्यायालय द्वारा तय बढ़ी हुई आय के आधार पर। इसके अलावा, पोषण, कपड़े और चिकित्सा खर्चों के कुछ मद जो MACT ने दिए थे, उच्च न्यायालय की अंतिम गणना में छूट गए थे।
सर्वोच्च न्यायालय का कानूनी सिद्धांत
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही परमेश की स्थायी शारीरिक विकलांगता 70 प्रतिशत आँकी गई हो, परंतु आजीविका अर्जित करने की दृष्टि से उनकी फंक्शनल डिसेबिलिटी 100 प्रतिशत है।
पीठ ने कहा कि राजमिस्त्री का काम पूरी तरह शारीरिक श्रम पर निर्भर है, जिसमें दोनों पैरों का निरंतर उपयोग और संतुलन आवश्यक है। घुटने के ऊपर से पैर कट जाने के बाद परमेश इस कार्य को प्रभावी ढंग से करने में पूरी तरह असमर्थ हो गए। पीठ ने एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए दोहराया कि शारीरिक विकलांगता के प्रतिशत को यांत्रिक रूप से कमाई की क्षमता के नुकसान के प्रतिशत के बराबर नहीं माना जा सकता।
आम श्रमिकों पर असर
यह फैसला उन लाखों असंगठित मज़दूरों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर है जो शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं — जैसे राजमिस्त्री, बढ़ई, कुली और खेतिहर मज़दूर। इन पेशों में कोई भी अंग-हानि व्यक्ति को उसकी आजीविका से पूरी तरह वंचित कर सकती है, भले ही चिकित्सीय दृष्टि से विकलांगता का प्रतिशत कम आँका जाए।
गौरतलब है कि MACT में मुआवजे की गणना की मौजूदा प्रणाली अक्सर पेशे की प्रकृति को नज़रअंदाज़ करती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश अदालतों को भविष्य में अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करता है।
आगे की राह
इस फैसले के बाद देशभर की MACT अदालतों और उच्च न्यायालयों को मुआवजा निर्धारित करते समय पीड़ित के पेशे और उस पेशे में उसकी वास्तविक कार्यक्षमता के नुकसान का आकलन करना होगा। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय श्रमिक वर्ग के लिए न्यायपूर्ण मुआवजे की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।