स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के नए दिशा-निर्देश जारी: धर्मेंद्र प्रधान ने कक्षा 12 तक सभी स्कूलों में SMC अनिवार्य की
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 6 मई 2026 को नई दिल्ली में स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए, जिनका उद्देश्य देशभर के विद्यालयों में सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ करना और स्कूल प्रबंधन को अधिक प्रभावी व जवाबदेह बनाना है। इन दिशा-निर्देशों के तहत कक्षा 12 तक के सभी विद्यालयों में SMC का गठन अनिवार्य किया गया है। यह कदम विद्यालय प्रबंधन विकास समिति की जगह लेगा और स्थानीय स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया को नई दिशा देगा।
SMC की मुख्य जिम्मेदारियाँ
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, SMC को विद्यालय की विकास योजना तैयार करने, शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी करने, वित्तीय प्रबंधन और सामाजिक लेखा परीक्षण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओं के समन्वय से संसाधनों का उपयोग करना और नियमित बैठकें आयोजित कर पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया अपनाना भी इस समिति के दायरे में आएगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि इससे विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
समिति की संरचना और सदस्य संख्या
SMC में अभिभावक, स्थानीय प्राधिकरण के प्रतिनिधि, शिक्षक, शिक्षाविद् और विषय विशेषज्ञ, पूर्व विद्यार्थी, वंचित समूहों के प्रतिनिधि तथा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शामिल होंगे। विद्यालय के प्रधानाचार्य को समिति का सदस्य-सचिव बनाया गया है। सदस्य संख्या छात्र नामांकन के आधार पर तय होगी — 100 तक विद्यार्थियों वाले स्कूलों में 12 से 15 सदस्य, 100 से 500 छात्रों वाले स्कूलों में 15 से 20 सदस्य, और 500 से अधिक विद्यार्थियों वाले स्कूलों में 20 से 25 सदस्य होंगे।
सदस्य चयन के मानदंड
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, SMC में शामिल कुल सदस्यों का 75 प्रतिशत अभिभावक होंगे, जबकि शेष 25 प्रतिशत अन्य श्रेणियों से चुने जाएंगे। इनमें एक-तिहाई स्थानीय निकाय के निर्वाचित सदस्य और एक-तिहाई विद्यालय के शिक्षक होंगे। गौरतलब है कि यह संरचना शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम की भावना के अनुरूप सामुदायिक स्वामित्व को प्राथमिकता देती है।
सदस्य-सचिव की प्रमुख जिम्मेदारियाँ
प्रधानाचार्य को सदस्य-सचिव के रूप में शैक्षणिक वर्ष के एक महीने के भीतर समिति का गठन सुनिश्चित करना होगा। वार्षिक आम बैठक आयोजित कर अभिभावकों के बीच चुनाव कराना और चुनाव के दौरान कम से कम 50 प्रतिशत अभिभावकों की उपस्थिति सुनिश्चित करना भी उनका दायित्व होगा। दिशा-निर्देशों में क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण, वित्तीय पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही पर विशेष बल दिया गया है।
आगे की राह
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इन दिशा-निर्देशों को लागू करने का निर्देश दिया है। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के क्रियान्वयन को गति देने पर सरकार का विशेष ध्यान है। सरकार का मानना है कि इन प्रावधानों से स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होगी और शिक्षा व्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाया जा सकेगा।