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शाला प्रवेशोत्सव के 23 साल: मोदी की 2003 की पहल ने गुजरात में बदली लाखों बच्चों की किस्मत

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शाला प्रवेशोत्सव के 23 साल: मोदी की 2003 की पहल ने गुजरात में बदली लाखों बच्चों की किस्मत

सारांश

2003 में 37% ड्रॉपआउट दर के बीच शुरू हुई शाला प्रवेशोत्सव पहल आज 23 साल बाद गुजरात की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है — AI निगरानी, ₹326 करोड़ सामुदायिक योगदान और नमो लक्ष्मी जैसी योजनाओं के साथ यह अभियान अब 'प्रगति का प्रवेशोत्सव' कहलाने लगा है।

मुख्य बातें

शाला प्रवेशोत्सव और कन्या केलवणी रथयात्रा की शुरुआत 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी; अभियान 23 वर्ष पूरे कर चुका है।
2001-02 में गुजरात की स्कूल ड्रॉपआउट दर 37% से अधिक थी, जो इस अभियान के बाद उल्लेखनीय रूप से घटी।
पिछले 23 वर्षों में जनता और संस्थाओं ने विद्यालयों को ₹326 करोड़ का योगदान दिया; विद्यालय प्रबंधन समितियों में 50% महिला प्रतिनिधित्व।
नमो लक्ष्मी योजना के तहत कक्षा 9-12 की बेटियों को ₹50,000 तक और नमो सरस्वती विज्ञान साधना योजना के तहत विज्ञान छात्रों को ₹25,000 तक की सहायता।
गुजरात का विद्या समीक्षा केंद्र देश की पहली AI-संचालित शैक्षणिक निगरानी व्यवस्था बताई जाती है, जो संभावित ड्रॉपआउट बच्चों की पूर्व-पहचान करती है।
SQAAF के तहत विद्यालय गुणवत्ता मूल्यांकन के लिए 211 मानक निर्धारित; 5+3+3+4 शैक्षणिक संरचना लागू।

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 23 जून 2026 को अहमदाबाद में आयोजित शाला प्रवेशोत्सव समारोह में कहा कि वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई शाला प्रवेशोत्सव एवं कन्या केलवणी रथयात्रा पहल आज 23 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुकी है और गुजरात में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सामाजिक रूपांतरण की वाहक बन चुकी है। उन्होंने कहा कि इस अभियान ने शासन और समाज के बीच की दूरी को मिटाकर शिक्षा को एक जन-आंदोलन का स्वरूप दिया।

चुनौतियों से हुई थी शुरुआत

वर्ष 2001-02 में गुजरात में विद्यालय छोड़ने की दर 37 प्रतिशत से अधिक थी — अर्थात लगभग हर तीसरा बच्चा शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो जाता था। बेटियों की शिक्षा सामाजिक एवं आर्थिक बाधाओं के कारण और भी अधिक प्रभावित थी। मुख्यमंत्री पटेल के अनुसार, ऐसे परिवेश में मोदी ने यह विचार सामने रखा कि 'शिक्षा केवल सरकार का विषय नहीं, बल्कि समाज का संकल्प बननी चाहिए।'

इसी सोच के साथ मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों, विधायकों और IAS, IPS, IFS अधिकारियों तक सभी गाँव-गाँव पहुँचे, परिवारों से मिले और बच्चों का हाथ थामकर उन्हें विद्यालय के द्वार तक ले गए। यह परंपरा पिछले 23 वर्षों से निर्बाध जारी है।

बेटियों की शिक्षा पर विशेष जोर

कन्या केलवणी रथयात्रा को शाला प्रवेशोत्सव का अविभाज्य अंग बनाया गया, क्योंकि पटेल के अनुसार किसी समाज में सबसे गहरा और स्थायी परिवर्तन तब आता है जब उसकी बेटियाँ आगे बढ़ती हैं। पिछले दो दशकों में गुजरात में बेटियों की शिक्षा के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में उल्लेखनीय बदलाव आया है। आज अभिभावक बेटियों को न केवल विद्यालय भेजना चाहते हैं, बल्कि उन्हें उच्च शिक्षा तक पहुँचते देखना भी चाहते हैं।

इस दिशा में राज्य सरकार ने नमो लक्ष्मी योजना प्रारंभ की है, जिसके अंतर्गत कक्षा 9 से 12 तक की बेटियों को ₹50,000 तक की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके साथ ही नमो सरस्वती विज्ञान साधना योजना के तहत कक्षा 11 और 12 में विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों को दो वर्षों में ₹25,000 तक की सहायता दी जाती है।

तकनीक और गुणवत्ता सुधार

वर्ष 2009 में शुरू हुआ गुणोत्सव आज गुणोत्सव 2.0 (GSQAC) के रूप में विकसित हो चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप स्कूल क्वालिटी असेसमेंट एंड एश्योरेंस फ्रेमवर्क (SQAAF) के तहत विद्यालयों की गुणवत्ता के मूल्यांकन हेतु 211 मानक निर्धारित किए गए हैं।

गुजरात का विद्या समीक्षा केंद्र, जो भारत की पहली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-संचालित शैक्षणिक निगरानी व्यवस्था बताई जाती है, पूरी शिक्षा प्रणाली की रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर रहा है। इसके अंतर्गत AI-आधारित अर्ली वॉर्निंग सिस्टम संभावित ड्रॉपआउट बच्चों की पूर्व-पहचान कर समय रहते मार्गदर्शन सुनिश्चित करता है। राज्य ने 5+3+3+4 शैक्षणिक संरचना भी लागू की है और बालवाटिका का सार्वभौमिक क्रियान्वयन भी हो रहा है।

सामुदायिक भागीदारी और छात्रवृत्ति

पिछले 23 वर्षों में जनता और विभिन्न संस्थाओं द्वारा विद्यालयों को लगभग ₹326 करोड़ का योगदान प्राप्त हुआ है। विद्यालय प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत अभिभावकों की भागीदारी और 50 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व ने शिक्षा को एक सामुदायिक आंदोलन का स्वरूप दिया है। मुख्यमंत्री ज्ञान साधना और ज्ञान सेतु मेरिट स्कॉलरशिप जैसी योजनाएँ प्रतिभाशाली किंतु संसाधन-विहीन विद्यार्थियों के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं।

आगे की राह

मुख्यमंत्री पटेल ने कहा कि 2003 में जिन बच्चों ने पहली बार विद्यालय का द्वार पार किया था, आज उनमें से अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और उद्यमी बन चुके हैं। उनके अनुसार, शाला प्रवेशोत्सव और कन्या केलवणी रथयात्रा ने लाखों बच्चों को अवसर, लाखों बेटियों को आत्मविश्वास और पूरे समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। भविष्य में इस अभियान को आधुनिक तकनीक और नई शिक्षा नीति के साथ और सुदृढ़ करने की योजना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस अभियान की सफलता के दावों को स्वतंत्र आँकड़ों की कसौटी पर परखना ज़रूरी है — राज्य सरकार के अपने आँकड़ों और स्वतंत्र शैक्षणिक सर्वेक्षणों के बीच का अंतर अक्सर बड़ा होता है। ₹326 करोड़ का सामुदायिक योगदान और AI निगरानी प्रणाली तकनीकी प्रगति के संकेत हैं, किंतु असली सवाल यह है कि क्या नामांकन में वृद्धि सीखने के स्तर में भी परिलक्षित हो रही है। ASER जैसी रिपोर्टें बताती हैं कि देशभर में नामांकन और सीखने की गुणवत्ता के बीच की खाई अभी भी चिंताजनक है — गुजरात इससे अछूता नहीं। इस अभियान की वास्तविक विरासत तभी सुनिश्चित होगी जब गुणोत्सव 2.0 के 211 मानकों के परिणाम पारदर्शी रूप से सार्वजनिक हों।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शाला प्रवेशोत्सव क्या है और इसकी शुरुआत कब हुई?
शाला प्रवेशोत्सव गुजरात सरकार का एक वार्षिक शिक्षा अभियान है, जिसकी शुरुआत 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इसका उद्देश्य हर बच्चे — विशेषकर बेटियों — को विद्यालय से जोड़ना और ड्रॉपआउट दर को कम करना है।
कन्या केलवणी रथयात्रा का शाला प्रवेशोत्सव से क्या संबंध है?
कन्या केलवणी रथयात्रा शाला प्रवेशोत्सव का अविभाज्य हिस्सा है, जो विशेष रूप से बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। यह यात्रा गाँव-गाँव जाकर परिवारों को बेटियों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित करती है।
नमो लक्ष्मी योजना और नमो सरस्वती योजना में क्या मिलता है?
नमो लक्ष्मी योजना के तहत कक्षा 9 से 12 तक की छात्राओं को ₹50,000 तक की आर्थिक सहायता दी जाती है। नमो सरस्वती विज्ञान साधना योजना के अंतर्गत कक्षा 11 और 12 में विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों को दो वर्षों में ₹25,000 तक की सहायता प्रदान की जाती है।
गुजरात का विद्या समीक्षा केंद्र क्या है?
विद्या समीक्षा केंद्र गुजरात की AI-संचालित शैक्षणिक निगरानी व्यवस्था है, जिसे देश की पहली ऐसी प्रणाली बताया जाता है। यह पूरी शिक्षा प्रणाली की रियल-टाइम मॉनिटरिंग करती है और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के ज़रिए संभावित ड्रॉपआउट बच्चों की पहचान कर समय पर हस्तक्षेप सुनिश्चित करती है।
23 वर्षों में शाला प्रवेशोत्सव की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या रही हैं?
2001-02 में 37% से अधिक रही ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। जनता और संस्थाओं ने विद्यालयों को ₹326 करोड़ का योगदान दिया; विद्यालय प्रबंधन समितियों में 75% अभिभावक भागीदारी और 50% महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ है। SQAAF के तहत 211 गुणवत्ता मानक भी निर्धारित किए गए हैं।
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