UPI MDR विवाद: शिवसेना (UBT) का आरोप — ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर 0.4% शुल्क से विदेशी कंपनियों को फायदा
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 19 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि चुनिंदा UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का निर्णय अंततः आम उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ेगा और Visa तथा Mastercard जैसी अमेरिकी वित्तीय कंपनियों के हित साधेगा। पार्टी ने अपने मुखपत्र सामना में प्रकाशित संपादकीय के माध्यम से ₹2,000 से अधिक के UPI लेनदेन पर 0.4% शुल्क को 'शब्दों का हेरफेर' बताया।
मुख्य आरोप: उपभोक्ता ही चुकाएगा कीमत
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी ने तर्क दिया कि सरकार भले ही यह दावा करे कि MDR शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होता है, न कि सीधे उपभोक्ताओं पर — लेकिन व्यावहारिक धरातल पर यह दलील खोखली है। संपादकीय में ईंधन पर लगने वाले उत्पाद शुल्क और GST का उदाहरण देते हुए कहा गया कि जिस तरह व्यापारी ये लागतें ग्राहकों पर डाल देते हैं, उसी तरह MDR का बोझ भी अंततः आम खरीदार पर ही पड़ेगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में डिजिटल भुगतान का दायरा तेज़ी से बढ़ रहा है और करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवार UPI पर निर्भर हो चुके हैं।
विदेशी कंपनियों को 'अप्रत्यक्ष उपहार' का आरोप
संपादकीय में आरोप लगाया गया कि भारत का डिजिटल लेनदेन बुनियादी ढाँचा धीरे-धीरे Visa और Mastercard जैसी वैश्विक अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को सौंपा जा रहा है। शिवसेना (UBT) के अनुसार, लेनदेन शुल्क भारत के मध्यम वर्ग और छोटे खुदरा व्यापारियों की कीमत पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का एक अप्रत्यक्ष माध्यम बन रहा है। संपादकीय में कहा गया, 'UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय केवल अमेरिकी फिनटेक कंपनियों को खुश करने के लिए लिया गया था।'
विदेश नीति से जोड़ा घरेलू नीति का धागा
ठाकरे गुट ने इस घरेलू नीति परिवर्तन को व्यापक कूटनीतिक संदर्भ में रखा। पार्टी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान से तेल खरीद रोकने, अमेरिकी व्यापार शुल्कों के समक्ष झुकने और ट्रंप प्रशासन की राजनयिक माँगें मानने जैसे कई मौकों पर अमेरिकी दबाव स्वीकार किया है। आलोचकों का कहना है कि MDR का निर्णय इसी शृंखला की अगली कड़ी है।
विश्वगुरु की छवि पर सवाल
संपादकीय ने उन सरकार-समर्थक आख्यानों की भी कड़ी आलोचना की, जो सिंगापुर, यूएई, मॉरीशस और श्रीलंका जैसे देशों में UPI को अपनाए जाने का उत्सव मनाते थे। पार्टी ने इन जश्नों की तुलना घरेलू स्तर पर लगाए जा रहे शुल्क की वास्तविकता से करते हुए 'विश्वगुरु' की छवि को नाज़ुक और कृत्रिम बताया। गौरतलब है कि सरकार डिजिटल भुगतान को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है।
मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों पर असर
शिवसेना (UBT) ने आरोप लगाया कि सरकार डिजिटल और नकदी-रहित अर्थव्यवस्था का दावा करते हुए नोटबंदी, GST लागू करने, महँगाई और अब MDR के ज़रिये मध्यम और श्रमिक वर्ग का शोषण कर रही है। पार्टी के अनुसार, डिजिटल परिवर्तन की आड़ में कॉरपोरेट और विदेशी बिचौलियों को फायदा पहुँचाने के लिए नागरिकों से हज़ारों करोड़ रुपये वसूले जाएंगे। यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब UPI प्रतिमाह अरबों लेनदेन संसाधित कर रहा है और इसकी पहुँच देश के छोटे शहरों और गाँवों तक हो चुकी है।