सिंधु जल समझौता निलंबन से जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का खतरा, विशेषज्ञ रशीद राहिल ने जताई गंभीर चिंता
सारांश
मुख्य बातें
राजनीतिक विशेषज्ञ रशीद राहिल ने श्रीनगर में चेतावनी दी है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को निलंबित करने की घोषणा का सबसे पहला और सबसे गहरा असर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर पड़ सकता है। उनके अनुसार, नदियों पर बांध बनाकर जल-प्रवाह रोकने से घाटी में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और गहरा हो सकता है।
मुख्य घटनाक्रम
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत सरकार ने सिंधु जल समझौते को रोकने की घोषणा की। इस पृष्ठभूमि में विशेषज्ञ रशीद राहिल ने कहा कि 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय जल-संसाधनों का बंटवारा एक जटिल मुद्दा रहा है। उन्होंने कहा, 'पानी एक कुदरती देन है, लेकिन इस पर सबसे पहला हक उन लोगों का है, जिनके लिए यह आधार है। उसके बाद दूसरे लोगों को हक है।'
जम्मू-कश्मीर पर संभावित असर
राहिल ने स्पष्ट किया कि जब बांध बनाकर पानी रोका जाएगा, तो बांध-क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ का खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। उनके अनुसार, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कुछ क्षेत्र इस खतरे की जद में आ सकते हैं — और विशेष रूप से कश्मीर घाटी को अधिक नुकसान की आशंका है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी यह कह चुके हैं कि इन नदियों के पानी पर पहला हक यहाँ के निवासियों का है।
भारत-पाकिस्तान तनाव की आशंका
विशेषज्ञ राहिल के अनुसार, समझौते को इस तरह निलंबित रखने से दोनों देशों के बीच नए सिरे से तनाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि जिस देश के पास जल-संसाधन हैं, वह दूसरे देश को इस मुद्दे पर कमज़ोर कर सकता है। उनके शब्दों में, 'यह भारत के लिए एक रणनीतिक प्वाइंट है। भारत एक रणनीतिक योजना बना सकता है, जिससे पाकिस्तान को झुकना पड़ेगा।'
कूटनीतिक बहाली की उम्मीद
हालाँकि राहिल ने यह भी संकेत दिया कि स्थिति स्थायी नहीं रहेगी। उनका मानना है कि ट्रैक टू डिप्लोमेसी के संकेत मिल रहे हैं और दोनों देशों के बीच संवाद की गुंजाइश बनी हुई है। उन्होंने कहा, 'जहाँ जम्मू-कश्मीर के हवाले से हिन्दुस्तान और पाकिस्तान मिल रहे हैं, ट्रैक टू डिप्लोमेसी पर काम करने को लेकर संकेत दे रहे हैं, तो इससे लगता है कि दोनों देशों के बीच आने वाले समय में फिर से बात हो सकती है।' उनके अनुसार, किसी न किसी रूप में इस समझौते की पुनर्बहाली संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राहिल का विश्लेषण इस बात पर केंद्रित है कि जल-संसाधन केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार भी बन सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव के बाद कूटनीतिक संपर्क के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं। आने वाले हफ्तों में भारत सरकार की जल-नीति पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।