26 सितंबर 2026
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एसआईआर विवाद: चुनाव आयोग के प्रेस नोट पर कांग्रेस का पलटवार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

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एसआईआर विवाद: चुनाव आयोग के प्रेस नोट पर कांग्रेस का पलटवार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

सारांश

चुनाव आयोग के एसआईआर प्रेस नोट पर कांग्रेस का पलटवार तीखा है — पार्टी ने गोवा की 81-मतदाता घटना को 'टूटी व्यवस्था' का सबूत बताया और सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे या अभियोजन से कम कुछ भी मानने से इनकार किया। मतदाता सूची की शुद्धता का सवाल अब सीधे लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ गया है।

मुख्य बातें

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 26 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग के एसआईआर प्रेस नोट को 'रक्षात्मक और अधूरा' बताया।
गोवा में हटाए गए 97 में से 81 मतदाताओं को फॉर्म-6 के ज़रिए वापस जोड़ने की प्रक्रिया शुरू — कांग्रेस ने इसे 'टूटी व्यवस्था की स्वीकृति' कहा।
कांग्रेस ने कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के लिए भी समान राहत की माँग की।
जुलाई 2026 में फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को 'संसद की अनुमति के बिना अवैध बदलाव' बताया गया।
कांग्रेस ने एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत निलंबित करने और सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे या अभियोजन की माँग की।

कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने 26 सितंबर 2026 को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर चुनाव आयोग के उसी दिन जारी प्रेस नोट को 'रक्षात्मक और अधूरा' करार देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे या उन पर अभियोजन की मांग की। एक अखबार के खुलासे और देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के बीच आए इस बयान ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर राजनीतिक संग्राम को नई धार दे दी है।

प्रेस नोट पर कांग्रेस की आपत्तियाँ

जयराम रमेश ने कहा कि आयोग का प्रेस नोट 'न तो खबर का सीधे तौर पर खंडन करता है और न ही उसके निष्कर्षों को निराधार बताता है।' उनके अनुसार प्रेस नोट के पैरा 3(i) और 3(ii) में मामले को हल्का करने की महज रक्षात्मक कोशिश की गई है।

कांग्रेस के अनुसार, गोवा में पकड़े जाने के बाद आयोग ने स्वीकार किया कि हटाए गए 97 में से 81 मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 भरकर उन्हें वापस जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई है। पार्टी ने तीखे शब्दों में कहा, 'दूसरे शब्दों में आप एक टूटी और भ्रष्ट व्यवस्था से मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करते हैं और पकड़े जाने पर कहते हैं कि उन्हें वापस जोड़ा जा रहा है।'

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला — कांग्रेस का तर्क

जयराम रमेश ने कहा कि चुनाव आयोग अपने कदमों को 27 मई 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की आड़ देकर उचित ठहरा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि यह आदेश 'हालिया खुलासों से बहुत पहले का है' और यह सीईसी को मतदाताओं के नाम दुर्भावनापूर्ण तरीके से हटाने, अक्षमता के कारण नागरिकों को वोटर लिस्ट से बाहर करने और पूरे परिवारों को हुई परेशानी, खर्च व समय की बर्बादी से नहीं बचा सकता।

राज्यवार असमानता का सवाल

कांग्रेस ने पूछा कि आयोग ने दिल्ली और महाराष्ट्र में दावा-आपत्ति की समय-सीमा बढ़ाई, लेकिन कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल के उन मतदाताओं का क्या होगा जिनके नाम कथित तौर पर एक व्यक्ति के भ्रष्टाचार के चलते हटाए गए? पार्टी ने इन राज्यों के मतदाताओं के लिए भी समान राहत की माँग की।

इसके अलावा, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जुलाई 2026 के मध्य से फॉर्म-6 में 'पूरी तरह अवैध बदलाव' किए गए — जो संसद की जानकारी और अनुमति के बिना थे — जिसने युवा मतदाताओं पर माता-पिता व दादा-दादी का विवरण खोजने का 'अनुचित बोझ' डाला।

जेन जी वोटर्स और केंद्रीकरण पर चिंता

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रेस नोट 'जेन जी वोटर्स' को जानबूझकर निशाना बनाने के सवालों का जवाब नहीं देता। पार्टी का कहना है कि ईसीआईनेट पोर्टल की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों को शामिल करने का प्रस्ताव 'निरर्थक सुरक्षा उपाय' है, क्योंकि असली चिंता तकनीकी कमज़ोरी की नहीं, बल्कि उस केंद्रीकरण की है जो जमीनी स्तर पर मतदाताओं को जोड़ने से रोकता है। कांग्रेस के अनुसार, यह कदम दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की चिंताओं की पुष्टि करता है।

कांग्रेस की माँगें और आगे की राह

जयराम रमेश ने पाँच बिंदुओं पर जवाब माँगा — सीईसी द्वारा एकतरफा फैसले, विपक्ष के प्रति कथित पक्षपात, 'वोट चोरी' में भागीदारी के आरोप, युवा मतदाताओं के नामांकन में बाधा डालना और लापरवाही से उजागर हुए भ्रष्टाचार। कांग्रेस ने मांग की कि एसआईआर प्रक्रिया को 'तुरंत निलंबित' किया जाए।

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देशभर में मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर विपक्षी दलों का आंदोलन तेज़ हो रहा है। गौरतलब है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विवाद नई बात नहीं है — पिछले चुनाव चक्रों में भी नामों के गलत तरीके से हटाए जाने की शिकायतें उठी हैं, लेकिन इस बार खुलासे और संस्थागत प्रतिक्रिया दोनों ने मामले को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया है। आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय और संसदीय मंचों पर इस मुद्दे पर और दबाव देखने को मिल सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो 'पकड़ में न आने' वाली गड़बड़ियाँ कितनी होंगी? फॉर्म-6 में संसदीय अनुमोदन के बिना बदलाव का आरोप, यदि सिद्ध हुआ, तो यह संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन होगा — न कि केवल प्रशासनिक चूक। मुख्यधारा की कवरेज पक्ष-विपक्ष के बयानों पर केंद्रित है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि स्वतंत्र और सत्यापन-योग्य ऑडिट के बिना यह बहस नतीजे पर पहुँचेगी या महज चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ जाएगी।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) विवाद क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों की सफाई की जाती है। विवाद तब शुरू हुआ जब एक अखबार ने खुलासा किया कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कथित तौर पर गलत तरीके से हटाए गए — गोवा में 97 में से 81 मतदाताओं को हटाने के बाद वापस जोड़ने की नौबत आई।
कांग्रेस ने चुनाव आयोग के प्रेस नोट पर क्या आपत्ति जताई?
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि 26 सितंबर को जारी प्रेस नोट न तो खबर का सीधे खंडन करता है और न ही उसके निष्कर्षों को निराधार बताता है। पार्टी ने इसे 'रक्षात्मक कोशिश' बताते हुए आरोप लगाया कि यह जेन जी वोटर्स को निशाना बनाने और राज्यवार असमानता के सवालों का जवाब नहीं देता।
कांग्रेस ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्या माँग की है?
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे या उन पर अभियोजन की माँग की है। पार्टी ने पाँच बिंदुओं पर जवाबदेही तय करने की बात कही — एकतरफा फैसले, विपक्ष के प्रति कथित पक्षपात, 'वोट चोरी' में भागीदारी, युवा मतदाताओं के नामांकन में बाधा और मतदाता सूची की सफाई में लापरवाही।
फॉर्म-6 में बदलाव का विवाद क्या है?
कांग्रेस का आरोप है कि जुलाई 2026 के मध्य से फॉर्म-6 में ऐसे बदलाव किए गए जो संसद की जानकारी और अनुमति के बिना थे। इन बदलावों ने युवा मतदाताओं पर माता-पिता और दादा-दादी का विवरण जुटाने का अतिरिक्त बोझ डाला, जिससे उनका नामांकन कथित तौर पर प्रभावित हुआ।
क्या सभी राज्यों में मतदाताओं को राहत मिल रही है?
नहीं। कांग्रेस के अनुसार चुनाव आयोग ने दिल्ली और महाराष्ट्र में दावा-आपत्ति की समय-सीमा बढ़ाई है, लेकिन कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के लिए कोई समान राहत की घोषणा नहीं की गई। पार्टी ने इन राज्यों के प्रभावित मतदाताओं के लिए भी जवाब की माँग की है।
राष्ट्र प्रेस
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