लावारिस कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वकीलों और कार्यकर्ताओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया

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लावारिस कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वकीलों और कार्यकर्ताओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने का आदेश बरकरार रखा और ABC नियमों का पालन अनिवार्य किया। फैसले पर वकीलों और कार्यकर्ताओं में तीखी बहस — एक तरफ सार्वजनिक सुरक्षा का तर्क, दूसरी तरफ पशु अधिकारों की चिंता।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 19 मई को सार्वजनिक स्थानों से लावारिस कुत्तों को हटाने का आदेश बरकरार रखा।
एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों का अनुपालन बाध्यकारी; हर जिले में ABC केंद्र स्थापित होगा।
अधिवक्ता ननिता शर्मा के अनुसार कुत्ता काटने पर अब राज्य सरकार जिम्मेदार होगी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल और BJP सांसद अतुल गर्ग ने फैसले का स्वागत किया।
पशु अधिकार कार्यकर्ता और कुछ अधिवक्ताओं ने फैसले को असंतुलित बताते हुए पशु कल्याण की अनदेखी पर आपत्ति जताई।
ग्रेटर नोएडा समेत कई इलाकों के निवासियों ने फैसले को बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 19 मई को लावारिस कुत्तों से जुड़े बहुचर्चित मामले में अपना फैसला सुनाते हुए सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के आदेश को बरकरार रखा। आदित्य झा बनाम दिल्ली नगर निगम के नाम से दर्ज इस मामले में वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आए इस निर्णय पर वकीलों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और आम नागरिकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।

फैसले की मुख्य बातें

अधिवक्ता आदित्य झा ने बताया कि यह मामला उन्हीं के नाम से दायर किया गया था और इसमें टीकाकरण, नसबंदी और लावारिस कुत्तों से जुड़े अन्य मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा कि काफी लंबे इंतजार के बाद आखिरकार यह फैसला आया है और कोर्ट ने इस विषय में सख्त आदेश दिए हैं।

पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मुलेखी ने बताया कि न्यायालय ने एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के अनुपालन को बाध्यकारी बनाया है। उनके अनुसार, अब हर जिले में एक ABC केंद्र स्थापित होगा, प्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए जाएंगे और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाएगा। साथ ही, राज्यों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार उचित कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।

फैसले का स्वागत करने वाले पक्ष

अधिवक्ता विवेक शर्मा ने इसे न्यायपालिका का सराहनीय कदम बताया। उन्होंने कहा कि फैसले को मुख्यतः तीन हिस्सों में बाँटा गया है और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार को एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने भी फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि उनका संगठन 'लोक अभियान' पिछले कई वर्षों से लावारिस कुत्तों की वजह से लोगों को होने वाली परेशानियों पर काम कर रहा है और इस मुद्दे को लगातार उठाता रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अतुल गर्ग ने भी फैसले का समर्थन किया और सुझाव दिया कि मवेशियों और अन्य आवारा जानवरों की तरह ही लावारिस कुत्तों को भी शेल्टर होम में भेजा जाना चाहिए, ताकि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

आलोचकों की आपत्तियाँ

वहीं, अधिवक्ता ननिता शर्मा ने फैसले पर असंतोष जताया। उनका कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह संतुलित नहीं है क्योंकि इसमें इंसानों के अधिकारों की तो चर्चा है, लेकिन जानवरों के साथ हो रही क्रूरता पर कुछ नहीं कहा गया। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सभी अर्जियाँ खारिज कर दीं। हालाँकि, उन्होंने यह सकारात्मक पहलू भी रेखांकित किया कि यदि किसी को कुत्ता काटता है तो उसकी जिम्मेदारी राज्य की होगी।

अधिवक्ता पुनीता ने फैसले को 'पूरी तरह अमानवीय' करार देते हुए इसे अस्वीकार्य बताया। उन्होंने तर्क दिया कि जब प्रशासन गायों को सड़कों से नहीं हटा पाया, तो लावारिस कुत्तों को हटाना भी व्यावहारिक रूप से कठिन होगा। उनका कहना था कि समाज में जानवरों के प्रति उदासीनता की यह विडंबना गहरी है।

आम जनता पर असर

ग्रेटर नोएडा के स्थानीय निवासियों ने फैसले का समर्थन करते हुए इसे सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। उनका कहना है कि कुत्तों के हमले की घटनाएँ बढ़ रही हैं और इससे विशेष रूप से बच्चे और बुजुर्ग प्रभावित हो रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में स्ट्रीट डॉग हमलों की खबरें लगातार सुर्खियाँ बन रही हैं।

आगे क्या होगा

गौरतलब है कि अब यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर आ गई है कि वे ABC नियमों का पालन सुनिश्चित करें और जिला स्तर पर निगरानी तंत्र खड़ा करें। विशेषज्ञों का मानना है कि फैसले का असर तभी दिखेगा जब राज्य सरकारें इसे जमीन पर लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारों के पास इसे लागू करने की क्षमता और इच्छाशक्ति है — क्योंकि यही नियम वर्षों से कागज पर हैं। फैसले में पशु क्रूरता पर मौन रहना एक चूक है जिसे आलोचक सही ही उठा रहे हैं। जब तक क्रियान्वयन तंत्र ठोस नहीं होगा, यह निर्णय भी अदालती आदेशों की उस लंबी सूची में जुड़ने का जोखिम उठाता है जो जमीन पर नहीं उतर पाए।
RashtraPress
19 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों पर क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 19 मई को सार्वजनिक स्थानों से लावारिस कुत्तों को हटाने के आदेश को बरकरार रखा और एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों का पालन अनिवार्य किया। साथ ही हर जिले में ABC केंद्र स्थापित करने और निगरानी तंत्र मजबूत करने के निर्देश दिए।
आदित्य झा बनाम दिल्ली नगर निगम मामला क्या है?
यह मामला अधिवक्ता आदित्य झा द्वारा दायर याचिका पर आधारित है, जिसमें लावारिस कुत्तों से जुड़े टीकाकरण, नसबंदी और सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे उठाए गए थे। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 19 मई को इस पर अंतिम फैसला आया।
क्या इस फैसले से पशु अधिकारों पर असर पड़ेगा?
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और कुछ अधिवक्ताओं ने चिंता जताई है कि फैसले में जानवरों के साथ हो रही क्रूरता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि केवल हटाने के आदेश से पशु कल्याण सुनिश्चित नहीं होगा।
कुत्ता काटने पर अब जिम्मेदारी किसकी होगी?
अधिवक्ता ननिता शर्मा के अनुसार, फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी को लावारिस कुत्ता काटता है तो उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। यह नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है।
इस फैसले का आम नागरिकों पर क्या असर होगा?
ग्रेटर नोएडा समेत कई इलाकों के निवासियों ने फैसले को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए। अब राज्य सरकारों को ABC नियमों के तहत जिला स्तर पर ठोस कार्रवाई करनी होगी।
राष्ट्र प्रेस
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