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सुप्रीम कोर्ट ने सालेहा खातून व सरभानु बेगम के डिपोर्टेशन पर लगाई अंतरिम रोक, 22 जुलाई को अगली सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट ने सालेहा खातून व सरभानु बेगम के डिपोर्टेशन पर लगाई अंतरिम रोक, 22 जुलाई को अगली सुनवाई

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित दो महिलाओं — सालेहा खातून और सरभानु बेगम — के डिपोर्टेशन पर अंतरिम रोक लगाई है। मार्च 2026 से गोलपारा डिटेंशन सेंटर में बंद ये महिलाएँ 22 जुलाई की सुनवाई तक सुरक्षित हैं। यह मामला नागरिकता और मौलिक अधिकारों से जुड़े बड़े कानूनी सवाल उठाता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जून 2026 को सालेहा खातून और सरभानु बेगम के डिपोर्टेशन पर अंतरिम रोक लगाई।
दोनों महिलाएँ मार्च 2026 से गोलपारा डिटेंशन सेंटर , असम में हिरासत में हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी.
मोहना की अवकाशकालीन पीठ ने सुनवाई की।
केंद्र सरकार और असम सरकार दोनों को नोटिस जारी; विस्तृत जवाब माँगा गया।
अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 को निर्धारित; तब तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश।

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जून 2026 को असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित की गई दो महिलाओं — सालेहा खातून और सरभानु बेगम — को उनके कथित मूल देश भेजे जाने की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने केंद्र सरकार और असम सरकार को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों महिलाओं की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अलग-अलग याचिकाएँ दाखिल की गई थीं। याचिकाओं के अनुसार, असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी घोषित किया, जिसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सालेहा खातून और सरभानु बेगम दोनों मार्च 2026 से गोलपारा डिटेंशन सेंटर में बंद हैं और उन्हें देश से बाहर भेजे जाने का खतरा बना हुआ था।

अदालत की सुनवाई और आदेश

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की अवकाशकालीन पीठ ने की। पीठ ने याचिकाओं पर प्रारंभिक विचार के बाद दोनों सरकारों को नोटिस जारी किया और महिलाओं के दावों तथा मामले के तथ्यों पर विस्तृत जवाब माँगा।

अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि यदि दोनों महिलाएँ हिरासत में बनी रहती हैं, तो अगली सुनवाई की तारीख तक उन्हें डिपोर्ट नहीं किया जाएगा। यह आदेश दोनों महिलाओं को फिलहाल अस्थायी कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

आगे क्या होगा

इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 को निर्धारित है। उस दिन अदालत दोनों सरकारों के जवाबों और याचिकाकर्ताओं के तर्कों पर विस्तार से विचार करेगी। सरकारों को तब तक अपना पक्ष दाखिल करना होगा।

व्यापक कानूनी महत्त्व

यह मामला नागरिकता, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की कार्यवाही और विदेशी घोषित किए गए व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों से जुड़े महत्त्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है। गौरतलब है कि असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को लेकर पहले भी सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएँ आ चुकी हैं, और यह ऐसे समय में आया है जब NRC तथा नागरिकता से जुड़े मामले न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं। सर्वोच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई इस मसले पर महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश दे सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसकी प्रक्रिया को लेकर मानवाधिकार संगठन लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पहले भी ट्रिब्यूनल के कई फैसले उच्च न्यायालयों में पलटे जा चुके हैं। असली सवाल यह है कि डिटेंशन सेंटरों में बंद लोगों को त्वरित न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। 22 जुलाई की सुनवाई में अदालत जो रुख अपनाएगी, वह भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक महत्त्वपूर्ण नज़ीर बन सकती है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने सालेहा खातून और सरभानु बेगम के मामले में क्या आदेश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जून 2026 को दोनों महिलाओं के डिपोर्टेशन पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र और असम सरकार को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया है।
दोनों महिलाओं को विदेशी क्यों घोषित किया गया था?
असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी घोषित किया था, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। याचिकाओं में इस निर्णय को चुनौती दी गई है, हालाँकि ट्रिब्यूनल के विस्तृत आधारों का सार्वजनिक विवरण अभी उपलब्ध नहीं है।
गोलपारा डिटेंशन सेंटर में दोनों महिलाएँ कब से बंद हैं?
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सालेहा खातून और सरभानु बेगम मार्च 2026 से गोलपारा डिटेंशन सेंटर में हिरासत में हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 को निर्धारित है। उस दिन जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ दोनों सरकारों के जवाब और याचिकाकर्ताओं के तर्कों पर विचार करेगी।
यह मामला कानूनी दृष्टि से क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह मामला नागरिकता, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की निर्णय प्रक्रिया और विदेशी घोषित व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों से जुड़े बड़े कानूनी प्रश्न उठाता है। सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला भविष्य के समान मामलों के लिए महत्त्वपूर्ण नज़ीर स्थापित कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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