पश्चिम बंगाल के नए एडवोकेट जनरल बने सुरोजित नाथ मित्रा, किशोर दत्ता के इस्तीफे के बाद नियुक्ति
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुरोजित नाथ मित्रा को पश्चिम बंगाल का नया महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) नियुक्त किया है। राज्य के न्यायिक विभाग के प्रधान सचिव द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना में 29 मई 2026 को इस नियुक्ति की पुष्टि की गई। मित्रा ने किशोर दत्ता का स्थान लिया है, जिन्होंने 5 मई को विधानसभा चुनाव परिणामों के एक दिन बाद पद से इस्तीफा दे दिया था।
कौन हैं सुरोजित नाथ मित्रा
सुरोजित नाथ मित्रा वर्ष 1983 से वकालत के पेशे में हैं और उनका कार्यकाल चार दशकों से अधिक का है। उनकी विशेषज्ञता मुख्यतः दीवानी और वाणिज्यिक कानून में रही है। कलकत्ता हाईकोर्ट में उनकी लंबी और सम्मानित उपस्थिति ने उन्हें राज्य सरकार की कानूनी जिम्मेदारियों के लिए उपयुक्त माना जाने वाला नाम बनाया।
किशोर दत्ता का उतार-चढ़ाव भरा कार्यकाल
निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विश्वासपात्र माने जाने वाले किशोर दत्ता को 2011 से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 वर्षों के शासनकाल में दो बार एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया था। पहली बार उन्हें 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों में राज्य सरकार की स्थिति कमजोर पड़ने पर पद छोड़ना पड़ा था।
इसके बाद सौमेंद्रनाथ मुखर्जी ने एडवोकेट जनरल का कार्यभार संभाला, किंतु नवंबर 2023 में उन्होंने अचानक इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद दत्ता को दूसरी बार इस पद पर नियुक्त किया गया। इस प्रकार राज्य के एडवोकेट जनरल के पद पर एक दशक में कई बदलाव देखे गए।
इस्तीफे का राजनीतिक संदर्भ
5 मई को दत्ता के इस्तीफे का समय उस घटनाक्रम के साथ मेल खाता है जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधि प्रकोष्ठ के अधिवक्ताओं ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल से संपर्क कर नए राज्य मंत्रिमंडल के गठन तक राज्य से संबंधित मामलों में फैसलों और आदेशों पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। राजनीतिक और कानूनी दबाव के इस संयोग ने दत्ता के त्यागपत्र को और अधिक चर्चा का विषय बना दिया।
आगे की राह
नई राज्य सरकार के गठन के बाद सुरोजित नाथ मित्रा की नियुक्ति को प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनके समक्ष चुनाव-पश्चात विवादों, लंबित न्यायिक मामलों और राज्य सरकार की कानूनी स्थिति को मजबूत करने की चुनौती होगी।