तमिलनाडु में मोटापा 44.2% और मधुमेह 26.7% तक पहुँचा, NFHS-6 ने उठाए गंभीर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) के ताज़ा आँकड़े एक नई और गंभीर चेतावनी लेकर आए हैं। राज्य में 15–49 वर्ष आयु वर्ग की 44.2 प्रतिशत महिलाएँ अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं, और 26.7 प्रतिशत पुरुषों में रक्त शर्करा का स्तर उच्च या अत्यधिक उच्च पाया गया है — दोनों आँकड़े राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर हैं। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रवृत्ति आने वाले वर्षों में राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव डाल सकती है।
संस्थागत प्रसव में राष्ट्रीय मानक से आगे
NFHS-6 के अनुसार, तमिलनाडु में संस्थागत प्रसव की दर 99.7 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो राष्ट्रीय औसत 90.6 प्रतिशत से बहुत अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 99.6 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 99.8 प्रतिशत है। गौरतलब है कि यह उपलब्धि दशकों की सुनियोजित सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों का परिणाम है, जिसने राज्य को मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने में सक्षम बनाया।
मोटापे और मधुमेह के आँकड़े चिंताजनक
सर्वे के अनुसार, 15–49 वर्ष की 44.2 प्रतिशत महिलाएँ अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं — जो पिछले सर्वे के 40.5 प्रतिशत से अधिक है और राष्ट्रीय औसत 30.7 प्रतिशत से काफी ऊपर। शहरी क्षेत्रों में तो लगभग हर दूसरी महिला इस श्रेणी में आती है। पुरुषों में यह दर 38.8 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.3 प्रतिशत है।
मधुमेह के मोर्चे पर, राज्य में 25.2 प्रतिशत महिलाओं और 26.7 प्रतिशत पुरुषों में रक्त शर्करा का स्तर उच्च या बहुत उच्च पाया गया — दोनों राष्ट्रीय औसत से अधिक। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु पहले से ही देश के सर्वाधिक मोटापा-प्रभावित राज्यों में शुमार है।
सिज़ेरियन प्रसव और प्रसव-पूर्व देखभाल में गिरावट
सर्वे यह भी दर्शाता है कि गर्भकालीन मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) और गर्भावस्था-प्रेरित उच्च रक्तचाप की बढ़ती दरों के चलते सिज़ेरियन प्रसव की संख्या में तेज़ी आई है। राज्य में अब 46.9 प्रतिशत प्रसव सिज़ेरियन सेक्शन के माध्यम से होते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.2 प्रतिशत है।
इसके साथ ही, प्रसव-पूर्व देखभाल में भी गिरावट दर्ज की गई है। गर्भावस्था की पहली तिमाही में पंजीकरण 77.4 प्रतिशत से घटकर 71.2 प्रतिशत रह गया है। कम से कम चार प्रसव-पूर्व जाँचें पूरी करने वाली महिलाओं का अनुपात 90.6 प्रतिशत से घटकर 87.6 प्रतिशत हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह देरी माँ और नवजात दोनों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
विश्व स्वास्थ्य संगठन की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि 'किसी भी बीमारी के गंभीर रूप धारण करने से पहले ही उसकी रोकथाम करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।' उन्होंने रोकथाम, शीघ्र निदान और समय पर हस्तक्षेप पर विशेष ध्यान देने की बात कही।
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि मोटापे और मधुमेह के ये आँकड़े अगले कुछ वर्षों में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और असमय मृत्यु दर में वृद्धि का कारण बन सकते हैं।
आगे की राह
सर्वे के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि तमिलनाडु की अगली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती अब स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि जीवनशैली-जनित बीमारियों पर काबू पाना और गर्भावस्था के दौरान समय पर देखभाल सुनिश्चित करना है। राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली को अब संक्रामक रोगों से गैर-संक्रामक रोगों की ओर बढ़ते बोझ के लिए खुद को नए सिरे से तैयार करना होगा।