15 सितंबर 2026
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तमिलनाडु में बांझपन इलाज अब परिवार कल्याण कार्यक्रम का हिस्सा, TFR 1.3 पर आने के बाद ऐतिहासिक फैसला

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तमिलनाडु में बांझपन इलाज अब परिवार कल्याण कार्यक्रम का हिस्सा, TFR 1.3 पर आने के बाद ऐतिहासिक फैसला

सारांश

जन्म दर में भारी गिरावट और तेज़ी से बूढ़ी होती आबादी के बीच तमिलनाडु ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है — परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन उपचार को जोड़कर वह देश का पहला राज्य बन गया है जो 'परिवार की पूर्णता' को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा मान रहा है।

मुख्य बातें

तमिलनाडु देश का पहला राज्य बना जिसने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन उपचार को शामिल किया।
राज्य की TFR गिरकर 1.3 पर आई — जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से काफी नीचे।
पंजीकृत जन्म 2020 में 9.39 लाख से घटकर 2025 में 8.02 लाख रह गए।
60 वर्ष+ आयु वर्ग अभी आबादी का 16% ; 2036 तक यह 20% तक पहुँच सकता है।
सरकारी जिला अस्पतालों में IUI और प्राथमिक केंद्रों पर गर्भधारण-पूर्व काउंसलिंग उपलब्ध होगी।
विभाग के ऑडिट में 25–30% मातृ मृत्यु उच्च क्रम के जन्मों के दौरान पाई गई — इसलिए बड़े परिवारों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा।

तमिलनाडु सरकार ने 15 सितंबर 2026 को एक ऐतिहासिक नीतिगत बदलाव करते हुए अपने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन उपचार को शामिल किया है — ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है। यह निर्णय राज्य में कुल प्रजनन दर (TFR) के गिरकर 1.3 पर आ जाने और 2020 से 2025 के बीच पंजीकृत जन्मों में भारी कमी के बाद लिया गया है।

क्यों लिया गया यह फैसला

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2020 में तमिलनाडु में 9.39 लाख जन्म दर्ज किए गए थे, जो 2025 तक घटकर 8.02 लाख रह गए। राज्य की TFR अब 1.3 है — जनसंख्या प्रतिस्थापन के पारंपरिक स्तर 2.1 से काफी नीचे। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिक कुल आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हैं, और अनुमान है कि 2036 तक यह आँकड़ा 20 प्रतिशत के करीब पहुँच जाएगा — अर्थात हर पाँच में से लगभग एक निवासी वरिष्ठ नागरिक होगा।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के नीतिगत नोट में — जिसे हाल ही में विधानसभा में पेश किया गया — चेतावनी दी गई है कि लंबे समय तक प्रजनन दर में गिरावट और आबादी के बूढ़े होने से अंततः कार्यबल में कमी और राज्य की जनसंख्या में पूर्ण गिरावट हो सकती है।

कार्यक्रम में क्या बदला

परिवार कल्याण कार्यक्रम, जो अब तक जन्म नियंत्रण, गर्भनिरोधक सेवाओं और प्रसव अंतराल पर केंद्रित था, अब उन दंपतियों की मदद भी करेगा जो 'अपना परिवार पूरा करना' चाहते हैं लेकिन गर्भधारण में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। प्रस्तावित पहल के तहत सरकारी जिला मुख्यालय अस्पतालों में इंट्रा-यूटेरिन इनसेमिनेशन (IUI) उपचार उपलब्ध कराया जाएगा — उन जिलों में भी जहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के माध्यम से गर्भधारण-पूर्व काउंसलिंग भी दी जाएगी। ग्राम स्वास्थ्य नर्सें निःसंतान दंपतियों की पहचान करने, उन्हें काउंसलिंग देने और आवश्यकता पड़ने पर निकटतम तृतीयक स्वास्थ्य सेवा केंद्र तक मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

सरकार की स्पष्ट सीमा-रेखा

अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह नीति दंपतियों को बच्चे पैदा करने के लिए बाध्य नहीं करेगी और न ही बड़े परिवारों को प्रोत्साहन देगी। सरकार गर्भनिरोधक विकल्प, प्रसव-अंतराल सेवाएं और सुरक्षित गर्भपात की सुविधा जारी रखेगी। गौरतलब है कि विभाग के एक हालिया ऑडिट में पाया गया कि लगभग 25 से 30 प्रतिशत मातृ मृत्यु उच्च क्रम वाले जन्मों के दौरान हुई थीं — इसीलिए यह कार्यक्रम केवल उन दंपतियों पर केंद्रित है जिन्हें गर्भधारण में कठिनाई हो रही है, न कि उन पर जिनके पहले से बच्चे हैं।

व्यापक संदर्भ: देश में जनसांख्यिकीय बदलाव

यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण भारत के कई राज्य जनसांख्यिकीय परिवर्तन की चुनौती से जूझ रहे हैं। तमिलनाडु का यह कदम देश में पहला संस्थागत प्रयास है जो परिवार नियोजन की परिभाषा को विस्तार देते हुए 'परिवार की पूर्णता' को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि TFR 1.3 के स्तर पर बनी रही, तो अगले दो दशकों में कार्यशील आयु वर्ग पर वृद्धजनों की देखभाल का बोझ उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा।

आगे की राह

नीति के क्रियान्वयन के लिए जिला-स्तरीय दिशानिर्देश तैयार किए जा रहे हैं। IUI सेवाओं का विस्तार उन जिलों तक प्राथमिकता से किया जाएगा जहाँ विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं सीमित हैं। स्वास्थ्य नर्सों के प्रशिक्षण और रेफरल तंत्र को मजबूत करने की दिशा में भी काम शुरू हो गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

IUI जैसी एकल सेवा से जनसंख्या प्रवृत्ति पलटने की उम्मीद रखना अति-आशावादी होगा — असली चुनौती आर्थिक असुरक्षा, महँगी परवरिश और महिला कार्यबल भागीदारी के उन कारणों को संबोधित करना है जो युवा दंपतियों को परिवार बड़ा करने से रोकते हैं। यह नीति सही दिशा में है, लेकिन बिना व्यापक सामाजिक-आर्थिक सुधारों के, यह लक्षण का उपचार करेगी, कारण का नहीं।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु के परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन इलाज क्यों जोड़ा गया?
राज्य की कुल प्रजनन दर (TFR) गिरकर 1.3 हो जाने और 2020 से 2025 के बीच पंजीकृत जन्म 9.39 लाख से 8.02 लाख पर आ जाने के बाद यह फैसला लिया गया। स्वास्थ्य विभाग के नीतिगत नोट में चेतावनी दी गई है कि इस प्रवृत्ति के जारी रहने से कार्यबल में कमी और जनसंख्या में पूर्ण गिरावट हो सकती है।
इस कार्यक्रम के तहत कौन-सी बांझपन सेवाएं मिलेंगी?
सरकारी जिला मुख्यालय अस्पतालों में इंट्रा-यूटेरिन इनसेमिनेशन (IUI) उपचार उपलब्ध होगा, जिसमें वे जिले भी शामिल हैं जहाँ मेडिकल कॉलेज नहीं हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर गर्भधारण-पूर्व काउंसलिंग और ग्राम स्वास्थ्य नर्सों के माध्यम से रेफरल सेवाएं भी दी जाएंगी।
क्या यह नीति परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर करेगी?
नहीं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह नीति किसी को बाध्य नहीं करेगी और न ही बड़े परिवारों को प्रोत्साहन देगी। सरकार गर्भनिरोधक सेवाएं, प्रसव-अंतराल और सुरक्षित गर्भपात की सुविधाएं जारी रखेगी; कार्यक्रम केवल उन दंपतियों पर केंद्रित है जिन्हें गर्भधारण में कठिनाई हो रही है।
तमिलनाडु में बुजुर्ग आबादी की स्थिति क्या है?
वर्तमान में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिक तमिलनाडु की आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हैं। अनुमान के अनुसार 2036 तक यह आँकड़ा 20 प्रतिशत के करीब पहुँच जाएगा, यानी हर पाँच निवासियों में से एक वरिष्ठ नागरिक होगा।
इस पहल में ग्राम स्वास्थ्य नर्सों की क्या भूमिका होगी?
ग्राम स्वास्थ्य नर्सें अपनी नियमित जिम्मेदारियों के साथ-साथ निःसंतान दंपतियों की पहचान करेंगी, उन्हें काउंसलिंग देंगी और आवश्यकता पड़ने पर निकटतम तृतीयक स्वास्थ्य सुविधा तक मार्गदर्शन करेंगी। वे इस पूरे रेफरल तंत्र की आधारशिला होंगी।
राष्ट्र प्रेस
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