चुनाव लड़ने की उम्र 21 साल हो: तेलंगाना CM रेवंत रेड्डी की केंद्र से मांग, 'जेन जी' का प्रतिनिधित्व 1% भी नहीं
सारांश
मुख्य बातें
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने 26 जुलाई 2026 को मांग उठाई कि भारत में विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र सीमा घटाकर 21 साल की जाए। उन्होंने तर्क दिया कि जब 21 साल की उम्र में युवाओं को आईएएस और आईपीएस जैसे शीर्ष प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया जा सकता है, तो उन्हें सांसद या विधायक बनने से क्यों रोका जाए।
मुख्यमंत्री का तर्क: वैश्विक उदाहरण और घरेलू विरोधाभास
रेवंत रेड्डी ने कहा कि जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन, सिंगापुर सहित दुनिया के 50 प्रतिशत से अधिक देशों में मतदान की उम्र 21 साल है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत में भी पहले मतदान की उम्र 21 साल थी और चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र 25 साल थी। जब मतदान की उम्र घटाकर 18 साल कर दी गई, तो चुनाव लड़ने की उम्र सीमा में भी संगत बदलाव होना चाहिए था।
उन्होंने घरेलू विरोधाभास को रेखांकित करते हुए कहा कि 21 साल की उम्र में युवाओं को आईएएस, आईपीएस और अन्य सिविल सेवाओं में नियुक्त किया जाता है, मेयर और जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया जाता है — फिर विधानसभा और संसद के दरवाजे उनके लिए बंद क्यों हैं?
जेनरेशन जी: प्रतिनिधित्व का संकट
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की लगभग 30 प्रतिशत आबादी 'जेन जी' पीढ़ी की है, लेकिन विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व 1 प्रतिशत भी नहीं है। उन्होंने कहा, "मैं नहीं चाहता कि उनकी ऊर्जा बेकार जाए। मैं इस ऊर्जा को सही दिशा देना चाहता हूं और उन्हें विधायक, सांसद और मंत्री बनाकर देश की तरक्की में हिस्सेदार बनाना चाहता हूं।"
केंद्र सरकार से संवाद की तैयारी
रेवंत रेड्डी ने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे पर जिम्मेदार लोगों से मिलकर बातचीत करेंगे। उन्होंने नवनियुक्त केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी को बधाई देते हुए कहा कि वे पड़ोसी राज्य से हैं और उन्हें युवाओं के इस मुद्दे से अवगत कराने की कोशिश की गई है। उन्होंने पिछले शिक्षा मंत्रियों — धर्मेंद्र प्रधान, स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर — के राजनीतिक भविष्य का उल्लेख करते हुए उम्मीद जताई कि जोशी युवाओं से जुड़ी समस्याओं को दूर करेंगे।
आगे क्या होगा
यह मांग संसदीय सुधारों की व्यापक बहस का हिस्सा बन सकती है। चुनाव लड़ने की उम्र में बदलाव के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए केंद्र सरकार और संसद में व्यापक सहमति जरूरी है। रेवंत रेड्डी की यह पहल आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में नई बहस छेड़ सकती है।