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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च', उद्धव और राज ठाकरे एक साथ

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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च', उद्धव और राज ठाकरे एक साथ

सारांश

धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के अगले ही दिन मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च' निकला — जिसमें उद्धव और राज ठाकरे एक साथ उतरे। यह सिर्फ एक मंत्री की विदाई का जश्न नहीं, बल्कि युवा आंदोलन की ताकत और विपक्षी एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन था।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) और मनसे ने 27 जुलाई 2025 को मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च' निकाला।
पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे दोनों एक मंच पर आए।
एनसीपी (एसपी) के नेता भी मार्च में शामिल हुए; रोहित पवार ने युवा एकता को लोकतंत्र का सबक बताया।
फहाद अहमद ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई की आलोचना की; दादर में आरोपी पुलिसकर्मी के निलंबन और छात्रों के मामले वापसी की मांग की।
एक आरोपी अधिकारी — जिस पर कोकीन प्लांट करने की धमकी का आरोप है — को पहले ही निलंबित किया जा चुका है।

शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने 27 जुलाई 2025 को मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च' निकाला — यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के पद से इस्तीफे के ठीक अगले दिन हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे दोनों इस मार्च में शामिल हुए, जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) [एनसीपी-एसपी] के कई नेताओं ने भी भागीदारी की।

मार्च की पृष्ठभूमि

यह मार्च उस व्यापक छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में निकाला गया, जो शिक्षा प्रणाली की खामियों और परीक्षा विवादों को लेकर पिछले कुछ हफ्तों से देशभर में उठ रहा था। आंदोलन के दबाव में धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया, जिसे विपक्षी दलों ने अपनी 'नैतिक जीत' के रूप में प्रस्तुत किया।

नेताओं की प्रतिक्रिया

शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) पर निशाना साधते हुए कहा, "नफरत और अहंकार, ये दोनों शब्द उन (सत्तापक्ष) पर सटीक बैठते हैं। उन्होंने देश में नफरत का माहौल बनाया था और अब वह टूट गया है।"

शिवसेना (यूबीटी) सांसद अनिल देसाई ने कहा कि यह आंदोलन केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं था। उन्होंने कहा, "उन्होंने शिक्षा प्रणाली की गंभीर कमियों और सुधारों की जरूरत को उजागर किया। ये मुद्दे लंबे समय से बने हुए हैं और इनका असर बहुत दूरगामी है। अगर शिक्षा प्रणाली कमजोर है, तो यह बेरोजगारी जैसी समस्याओं को बढ़ावा देती है।"

मनसे नेता संदीप देशपांडे ने कहा, "जेन-जी ने देश को सिखाया है कि सरकार से डरना नहीं चाहिए।"

एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने कहा, "पहले लोग एकजुट नहीं थे। लेकिन छात्रों के साथ हुए अन्याय ने उन्हें और युवाओं को एक साथ ला खड़ा किया। ग्रामीण और शहरी इलाकों के युवा एक साथ आए, और उनकी सफलता ने दिखाया है कि अगर हम एकजुट होकर खड़े हों, तो जीत सकते हैं। यह लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण सबक है।"

पुलिस कार्रवाई पर विवाद

एनसीपी (एसपी) नेता फहाद अहमद ने मुंबई में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, "पुलिस ने छात्रों के साथ जैसा बर्ताव किया, वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। हम इस मुद्दे पर कल पुलिस कमिश्नर से मिलेंगे।"

अहमद ने यह भी कहा कि जिस अधिकारी पर कोकीन प्लांट करने की धमकी देने का आरोप है, उसे निलंबित कर दिया गया है, लेकिन दादर में एक छात्रा के साथ कथित अभद्र व्यवहार के आरोपी पुलिसकर्मी को भी निलंबित किया जाना चाहिए और छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस लिए जाने चाहिए।

राजनीतिक संदेश और आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्षी एकता की परीक्षा होती रही है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक मंच पर आना — जो वर्षों से अलग-अलग राजनीतिक धाराओं में रहे हैं — इस आंदोलन के व्यापक असर का संकेत देता है। गौरतलब है कि यह मार्च केवल एक मंत्री के इस्तीफे का उत्सव नहीं, बल्कि शिक्षा सुधार और युवा बेरोजगारी जैसे गहरे मुद्दों पर विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन था। आने वाले दिनों में विपक्ष के पुलिस कमिश्नर से मुलाकात और छात्रों पर दर्ज मामलों की वापसी की मांग राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह एक अवसरवादी गठजोड़ मात्र है। शिक्षा सुधार और युवा बेरोजगारी के मुद्दे जब तक नीतिगत बदलाव में नहीं बदलते, तब तक 'विजय मार्च' एक राजनीतिक प्रतीक से आगे नहीं जाएगा।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुंबई में 'तिरंगा विजय मार्च' क्यों निकाला गया?
यह मार्च केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के अगले दिन 27 जुलाई 2025 को निकाला गया। शिवसेना (यूबीटी) और मनसे ने इसे छात्र आंदोलन की जीत के प्रतीक के रूप में आयोजित किया।
क्या उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे इस मार्च में साथ आए?
हाँ, पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे दोनों इस मार्च में शामिल हुए। दोनों नेताओं का एक साथ मंच पर आना राजनीतिक दृष्टि से उल्लेखनीय माना जा रहा है।
छात्र आंदोलन की मुख्य मांगें क्या थीं?
शिवसेना (यूबीटी) सांसद अनिल देसाई के अनुसार, आंदोलन केवल किसी मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं था — इसने शिक्षा प्रणाली की गंभीर कमियों, सुधारों की जरूरत और बेरोजगारी जैसे दीर्घकालिक मुद्दों को उजागर किया।
मुंबई में पुलिस कार्रवाई पर क्या विवाद है?
एनसीपी (एसपी) नेता फहाद अहमद ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस के बर्ताव की आलोचना की। उन्होंने मांग की कि दादर में एक छात्रा के साथ कथित अभद्र व्यवहार के आरोपी पुलिसकर्मी को निलंबित किया जाए और छात्रों पर दर्ज सभी मामले वापस लिए जाएँ।
इस मार्च का राजनीतिक महत्व क्या है?
एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार के अनुसार, छात्र आंदोलन ने ग्रामीण और शहरी युवाओं को एकजुट किया और यह साबित किया कि संगठित होकर लड़ने पर जीत मिल सकती है। यह मार्च विपक्षी एकता का प्रदर्शन भी था।
राष्ट्र प्रेस
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