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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: 12 साल में पहली बार मोदी सरकार झुकी, अनिल देशमुख बोले — छात्रों की जीत

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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: 12 साल में पहली बार मोदी सरकार झुकी, अनिल देशमुख बोले — छात्रों की जीत

सारांश

12 साल में पहली बार — मोदी सरकार में एक केंद्रीय मंत्री को छात्रों के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा। महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इसे संविधान और लोकतंत्र की जीत बताया, साथ ही सरकार की देरी और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई पर तीखे सवाल उठाए।

मुख्य बातें

धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया — मोदी सरकार के 12 वर्षों में पहली बार कोई मंत्री छात्र-आंदोलन के दबाव में पद से हटा।
पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने 25 जुलाई को नागपुर में इसे देशभर के विद्यार्थियों की सामूहिक जीत बताया।
देशमुख के अनुसार, 15 से 20 दिन पहले इस्तीफा लिया जाता तो छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट बुलेट की कार्रवाई से बचा जा सकता था।
आंदोलन नेता अभिजीत दीपके और उनके साथियों की देशमुख ने विशेष सराहना की।
सोनम वांगचुक के अनशन के समय सरकारी संवाद न होने को देशमुख ने बड़ी चूक बताया।

महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने 25 जुलाई को नागपुर में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे देशभर के छात्रों के आंदोलन की ऐतिहासिक जीत करार दिया। देशमुख के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहला अवसर है जब किसी केंद्रीय मंत्री को व्यापक छात्र-आंदोलन और जनदबाव के चलते पद छोड़ना पड़ा।

मुख्य घटनाक्रम

देशमुख ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भले ही देर से आया, लेकिन यह देशभर के विद्यार्थियों की एकजुटता और लगातार संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि केंद्र सरकार 15 से 20 दिन पहले ही यह निर्णय ले लेती, तो छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई और देशभर में फैला तनाव टाला जा सकता था।

छात्रों पर कार्रवाई का आरोप

पूर्व गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट बुलेट का इस्तेमाल किया गया, जिसे समय रहते रोका जा सकता था। उन्होंने कहा, 'सरकार ने शुरुआत में छात्रों की ताकत को कमतर आंका, लेकिन अंततः उसे उनके दबाव के आगे झुकना पड़ा।' यह ऐसे समय में आया है जब छात्र-आंदोलन पूरे देश में व्यापक जनसमर्थन हासिल कर चुका था।

आंदोलन के नेतृत्व की सराहना

देशमुख ने आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दीपके और उनके साथियों की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे देश के छात्रों की सामूहिक विजय है। उनके अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में संविधान की भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत हुई है।

सरकार की भूमिका पर सवाल

देशमुख ने सरकार की प्रारंभिक निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे थे, उसी समय यदि कोई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री संवाद के लिए पहुंचता और छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करता, तो आंदोलन इतना लंबा नहीं खिंचता। गौरतलब है कि सरकार ने शुरुआती दिनों में यह मानकर आंदोलन को हल्के में लिया कि छात्र ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाएंगे।

आगे क्या

देशमुख ने इस घटनाक्रम को लोकतंत्र में युवाओं की आवाज़ की अनदेखी न करने की चेतावनी के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि छात्रों ने यह साबित कर दिया है कि संगठित होकर लोकतांत्रिक तरीके से आवाज़ उठाई जाए तो सरकार को भी अपने निर्णय बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है। शिक्षा मंत्रालय में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब यह देखना होगा कि नई नियुक्ति छात्रों की लंबित मांगों पर क्या रुख अपनाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह इस्तीफा महज दबाव-प्रबंधन की कवायद है। छात्रों पर लाठीचार्ज और पेलेट बुलेट के आरोप अनुत्तरित हैं — और जब तक इन पर जवाबदेही नहीं होती, 'लोकतंत्र की जीत' का दावा अधूरा रहेगा।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा क्यों दिया?
देशभर में छात्रों के व्यापक आंदोलन और बढ़ते जनदबाव के चलते धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। अनिल देशमुख के अनुसार, यह मोदी सरकार के 12 वर्षों में पहला ऐसा मामला है जब किसी केंद्रीय मंत्री को छात्र-आंदोलन के दबाव में पद छोड़ना पड़ा।
अनिल देशमुख ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर क्या कहा?
महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इसे देशभर के छात्रों की सामूहिक जीत और संविधान की भावना की विजय बताया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार 15 से 20 दिन पहले यह निर्णय लेती, तो छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई टाली जा सकती थी।
छात्र आंदोलन के दौरान किस तरह की पुलिस कार्रवाई हुई?
देशमुख के आरोपों के अनुसार, आंदोलन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट बुलेट का इस्तेमाल किया गया। उनका कहना है कि समय पर संवाद की पहल होती तो यह स्थिति नहीं बनती।
सोनम वांगचुक का इस आंदोलन से क्या संबंध है?
देशमुख ने कहा कि जब सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे थे, उसी समय यदि कोई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री उनसे संवाद करने पहुंचता और छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करता, तो आंदोलन इतना लंबा नहीं खिंचता। सरकार की शुरुआती उदासीनता को देशमुख ने बड़ी चूक बताया।
इस इस्तीफे को ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा है?
अनिल देशमुख के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में यह पहला अवसर है जब किसी केंद्रीय मंत्री को छात्र-आंदोलन और जनदबाव के कारण पद छोड़ना पड़ा। इसे लोकतंत्र में युवाओं की आवाज़ की ताकत के प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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