माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य पसुनूरी नरहरि और पत्नी ने तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया
सारांश
मुख्य बातें
प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन को मंगलवार, 26 मई 2026 को बड़ा झटका लगा, जब उसके केंद्रीय समिति सदस्य पसुनूरी नरहरि और उनकी पत्नी मेदारा दनम्मा ने तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। पुलिस महानिदेशक (DGP) सीवी आनंद ने दोनों वरिष्ठ माओवादी नेताओं को मीडिया के सामने पेश किया।
कौन हैं पसुनूरी नरहरि
64 वर्षीय नरहरि, जो विश्वनाथ और सलाई दा उपनामों से भी जाने जाते हैं, बिहार-झारखंड विशेष क्षेत्र समिति (BJAC) के सचिव के पद पर थे। वे तेलंगाना के हनुमाकोंडा जिले के मूल निवासी हैं और डिग्री पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष में ही रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन (RSU) से जुड़ गए थे।
पुलिस के अनुसार, 1982 में तत्कालीन सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वॉर के आंध्र प्रदेश राज्य समिति सचिव स्वर्गीय पुली अंजैया के प्रभाव में आकर नरहरि ने संगठन में औपचारिक रूप से प्रवेश किया और छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सक्रिय कुंटा दलम का हिस्सा बने।
माओवादी संगठन में नरहरि का सफर
1988 में नरहरि ने गुंटूर जिले की दनम्मा से विवाह किया। 2006 में उन्हें राज्य समिति सदस्य (SCM) के पद पर पदोन्नत किया गया और वे बिहार-झारखंड विशेष क्षेत्र समिति (BJSSAC) में SZC सदस्य के रूप में 2010 तक रहे।
2014 तक उन्होंने BJSSAC के अंतर्गत सात सदस्यीय तकनीकी विभाग का नेतृत्व किया। इसके बाद उनका तबादला बिहार राज्य समिति में हुआ, जहाँ उन्होंने 2017 तक गया जिला संगठन के प्रभारी के रूप में कार्य किया। 2017 में उन्हें पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो (ERB) के अंतर्गत केंद्रीय समिति सदस्य के पद पर पदोन्नत किया गया।
हथियार विशेषज्ञता और प्रशिक्षण
पुलिस ने बताया कि नरहरि को मोर्टार, रॉकेट, रॉकेट-चालित ग्रेनेड, ग्रेनेड और बूबी ट्रैप के निर्माण एवं रखरखाव में व्यापक विशेषज्ञता हासिल थी। उन्होंने माओवादी कार्यकर्ताओं को हथियार उत्पादन, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण भी दिया।
दनम्मा, जो लता, पूनम और जोबा उपनामों से जानी जाती हैं, राज्य समिति सदस्य (SCM) के पद पर थीं।
पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो के पतन की कगार
DGP सीवी आनंद ने कहा कि इस आत्मसमर्पण के साथ ही सीपीआई (माओवादी) का अंतिम बचा पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो पतन के कगार पर आ गया है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में तेलंगाना और आसपास के राज्यों में माओवादी संगठन के खिलाफ अभियान तेज हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई वरिष्ठ नेता या तो मारे गए हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। यह आत्मसमर्पण उस दीर्घकालिक रणनीति की एक और कड़ी है जिसके तहत सुरक्षा बलों ने माओवादी नेतृत्व ढाँचे को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया है।