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भील प्रदेश की माँग: बांसवाड़ा के मंगर धाम में 4 राज्यों के हजारों आदिवासी एकजुट

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भील प्रदेश की माँग: बांसवाड़ा के मंगर धाम में 4 राज्यों के हजारों आदिवासी एकजुट

सारांश

राजस्थान के बांसवाड़ा में मंगर धाम पर 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के हजारों आदिवासी एकत्रित हुए — माँग एक ही थी: अलग 'भील प्रदेश'। भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा के बैनर तले हुए इस वार्षिक सम्मेलन में सांसद राजकुमार रोत ने सरकारों पर उपेक्षा का आरोप लगाया।

मुख्य बातें

17 जुलाई 2026 को बांसवाड़ा के मंगर धाम में भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा का वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ।
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और दादरा एवं नगर हवेली के हजारों आदिवासी एकत्रित हुए।
सम्मेलन में सर्वसम्मति से अलग 'भील प्रदेश' राज्य के गठन की माँग की गई।
सांसद राजकुमार रोत ने चारों राज्यों की सरकारों पर आदिवासी क्षेत्रों की उपेक्षा का आरोप लगाया।
बीएपी जिला उपाध्यक्ष विनोद कुमार खराड़ी ने इसे राजनीतिक नहीं, बल्कि समुदाय के अस्तित्व का संघर्ष बताया।
पूरा आयोजन शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ।

बांसवाड़ा के मंगर धाम में 17 जुलाई 2026 को आयोजित एक भव्य सम्मेलन में राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और दादरा एवं नगर हवेली केंद्र शासित प्रदेश के हजारों आदिवासी एकत्रित हुए और सर्वसम्मति से एक अलग 'भील प्रदेश' राज्य के गठन की माँग उठाई। भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा के बैनर तले आयोजित इस सम्मेलन को सामाजिक और गैर-राजनीतिक बताया गया।

सम्मेलन का उद्देश्य और पृष्ठभूमि

भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के जिला उपाध्यक्ष विनोद कुमार खराड़ी ने बताया कि इस कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाना और सरकार के समक्ष एक अलग 'भील प्रदेश' की माँग को मजबूती से प्रस्तुत करना था। उन्होंने कहा, 'आजादी के इतने वर्षों बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में विकास नहीं हो पाया है।' गौरतलब है कि यह सम्मेलन प्रतिवर्ष 17 जुलाई को आयोजित किया जाता है।

सांसद राजकुमार रोत का आरोप

बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद राजकुमार रोत ने सम्मेलन में कहा कि चारों राज्यों की सरकारों ने इस क्षेत्र की उपेक्षा की है, जिसके कारण यह पिछड़ा हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सभी सरकारों ने आदिवासी समुदाय के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया है।

आदिवासी समुदाय की मुख्य माँग

खराड़ी ने जोर देकर कहा कि यह कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समुदाय के अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष है। उनके अनुसार, वर्तमान में आदिवासी समुदाय राज्य सीमाओं के पार बिखरा हुआ है और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग हर स्तर पर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने माँग की कि बिखरे हुए आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग 'भील प्रदेश' बनाया जाए, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों को वर्तमान कठिनाइयों से राहत मिल सके।

शांतिपूर्ण आयोजन

आयोजन समिति के सदस्य भंवरलाल परमार और आदिवासी समुदाय के सदस्यों की देखरेख में पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ। यह सम्मेलन इस बात का संकेत है कि भील समुदाय अपनी राजनीतिक और सामाजिक माँगों को लेकर एकजुट होता जा रहा है।

आगे की राह

अलग राज्य की यह माँग नई नहीं है — दशकों से भील और अन्य आदिवासी समूह इस क्षेत्र में एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई की वकालत करते आए हैं। हालाँकि केंद्र सरकार की ओर से अब तक इस माँग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। सम्मेलन में उठाई गई माँगें आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन हर बार इसे 'गैर-राजनीतिक' कहकर मुख्यधारा की बहस से बाहर रखा जाता है — यही इसकी सबसे बड़ी विडंबना है। चार राज्यों में बिखरे आदिवासी समुदाय की प्रशासनिक उपेक्षा एक वास्तविक समस्या है, जिसे केवल सम्मेलनों से नहीं, नीतिगत इच्छाशक्ति से हल किया जा सकता है। केंद्र सरकार की चुप्पी और राज्य सरकारों की निष्क्रियता इस माँग को हर साल और मुखर बनाती है। सवाल यह नहीं कि भील प्रदेश बनेगा या नहीं — सवाल यह है कि इस माँग के पीछे की विकास-वंचना को कब गंभीरता से लिया जाएगा।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भील प्रदेश क्या है और यह माँग क्यों उठाई जा रही है?
भील प्रदेश एक प्रस्तावित अलग राज्य है जिसमें राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी-बहुल सीमावर्ती क्षेत्रों को मिलाने की माँग की जाती है। आदिवासी समुदाय का तर्क है कि इन क्षेत्रों में दशकों से विकास नहीं हुआ और एक अलग राज्य से उन्हें उचित प्रशासन और अधिकार मिल सकेंगे।
बांसवाड़ा सम्मेलन में कौन-कौन से राज्यों के आदिवासी शामिल हुए?
17 जुलाई 2026 को मंगर धाम में आयोजित सम्मेलन में राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और दादरा एवं नगर हवेली केंद्र शासित प्रदेश के हजारों आदिवासी शामिल हुए। यह सम्मेलन प्रतिवर्ष 17 जुलाई को आयोजित होता है।
सांसद राजकुमार रोत ने सम्मेलन में क्या कहा?
बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद राजकुमार रोत ने आरोप लगाया कि चारों राज्यों की सरकारों ने आदिवासी क्षेत्रों की उपेक्षा की है, जिसके कारण यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि सभी सरकारों ने आदिवासी समुदाय के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया है।
भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा का यह सम्मेलन राजनीतिक था या सामाजिक?
आयोजकों ने इसे सामाजिक और गैर-राजनीतिक सम्मेलन बताया। बीएपी जिला उपाध्यक्ष विनोद कुमार खराड़ी ने स्पष्ट किया कि यह समुदाय के अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष है, न कि किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम।
अलग भील प्रदेश की माँग पर केंद्र सरकार का क्या रुख है?
अब तक केंद्र सरकार की ओर से इस माँग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह माँग दशकों पुरानी है और हर वर्ष के सम्मेलन के बाद भी नीतिगत स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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