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त्रिपुरा चिटफंड घोटाला: सीबीआई अदालत ने तीन दोषियों को 6 साल की सजा, निवेशकों को राशि लौटाने का आदेश

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त्रिपुरा चिटफंड घोटाला: सीबीआई अदालत ने तीन दोषियों को 6 साल की सजा, निवेशकों को राशि लौटाने का आदेश

सारांश

त्रिपुरा चिटफंड घोटाले में CBI की विशेष अदालत ने 14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद तीन दोषियों को 6 साल की कठोर सजा सुनाई। ₹5–6 करोड़ की धोखाधड़ी के पीड़ित निवेशकों को अब कुर्क संपत्तियों और जुर्माने से आनुपातिक वसूली का रास्ता मिला है।

मुख्य बातें

CBI की विशेष अदालत, अगरतला ने 31 मई 2026 को त्रिपुरा चिटफंड घोटाले में फैसला सुनाया।
CMD अरिंदम दास , निदेशक परितोष दास और प्रशासनिक निदेशक दीपशिखा चक्रवर्ती को 6-6 वर्ष कठोर कारावास और प्रत्येक पर ₹3 लाख जुर्माना।
कंपनी प्रगति शील इंफ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड पर ₹7 लाख का अर्थदंड।
आरोपियों पर ₹5 से ₹6 करोड़ के गबन का आरोप; मूल FIR 30 अप्रैल 2012 को दर्ज।
CBI ने 8 अक्टूबर 2013 को मामला अपने हाथ लिया; चार्जशीट 28 मई 2018 को दाखिल।
अदालत ने उनाकोटी जिला प्रशासन के माध्यम से पीड़ित जमाकर्ताओं के बीच राशि के आनुपातिक वितरण का आदेश दिया।

अगरतला में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत ने 31 मई 2026 को त्रिपुरा चिटफंड घोटाले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजी कंपनी प्रगति शील इंफ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड के तीन शीर्ष अधिकारियों को दोषी करार दिया और प्रत्येक को छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला उन सैकड़ों निवेशकों के लिए राहत लेकर आया है, जिनकी मेहनत की कमाई वर्षों से फंसी हुई थी।

किसे मिली सजा और कितना जुर्माना

पश्चिम त्रिपुरा जिला, अगरतला की विशेष CBI अदालत ने शनिवार को कंपनी के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (CMD) अरिंदम दास, निदेशक परितोष दास और प्रशासनिक निदेशक दीपशिखा चक्रवर्ती को आम जनता के साथ धोखाधड़ी और करोड़ों रुपये के गबन का दोषी पाया।

तीनों दोषियों को छह-छह वर्ष के कठोर कारावास (RI) की सजा के साथ-साथ प्रत्येक पर ₹3 लाख का अर्थदंड भी लगाया गया है। आरोपी कंपनी प्रगति शील इंफ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड पर अलग से ₹7 लाख का आर्थिक दंड लगाया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उन निवेशकों से जुड़ा है जिन्होंने कंपनी की विभिन्न जमा योजनाओं में अपनी पूंजी लगाई थी, परंतु परिपक्वता अवधि बीत जाने के बाद भी उन्हें धनराशि वापस नहीं मिली। मूल शिकायत कैलाशहर पुलिस स्टेशन में 30 अप्रैल 2012 को दर्ज हुई थी।

त्रिपुरा सरकार और केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की अधिसूचनाओं के अनुपालन में 8 अक्टूबर 2013 को CBI ने यह मामला पुनः दर्ज कर जांच अपने हाथ में ली। जांच में यह आरोप सामने आया कि कंपनी के अधिकारियों ने बड़ी संख्या में निवेशकों से जमा राशि एकत्र की और बाद में भुगतान करने में विफल रहे। आरोपियों पर आम जनता से जुटाए गए लगभग ₹5 से ₹6 करोड़ के गबन का आरोप लगाया गया था।

गौरतलब है कि CBI ने विस्तृत जांच के बाद 28 मई 2018 को तीनों आरोपियों और कंपनी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद अदालत में लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण की प्रक्रिया चली, जो अंततः इस दोषसिद्धि पर समाप्त हुई।

निवेशकों को राशि लौटाने के अदालती निर्देश

विशेष न्यायाधीश (CBI), पश्चिम त्रिपुरा जिला ने अपने फैसले में पीड़ित जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने आदेश दिया कि दोषियों से वसूले गए जुर्माने की राशि सक्षम अधिकारियों को भेजी जाए, ताकि जिला मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर, उनाकोटी जिला, कैलाशहर के माध्यम से पीड़ित जमाकर्ताओं के बीच उसका आनुपातिक वितरण किया जा सके।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला प्रशासन विभिन्न उप-मंडलों की आवश्यकताओं के अनुसार इस राशि का निष्पक्ष और आनुपातिक वितरण सुनिश्चित करे।

संपत्ति कुर्की से भी वसूली का निर्देश

अदालत ने सक्षम अधिकारियों से अनुरोध किया है कि वे कानून के तहत उपलब्ध प्रावधानों का उपयोग करते हुए आरोपियों की कुर्क की गई संपत्तियों से भी धोखाधड़ी की राशि की यथासंभव वसूली करें। वसूल की गई समस्त राशि उन सभी पहचाने गए जमाकर्ताओं और निवेशकों के बीच आनुपातिक रूप से वितरित की जाएगी, जिन्हें अब तक उनकी पूंजी वापस नहीं मिली है। यह फैसला त्रिपुरा में चिटफंड पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यानी 14 साल की प्रतीक्षा। असली सवाल यह है कि ₹7 लाख और ₹9 लाख (तीनों दोषियों का कुल जुर्माना) की वसूली ₹5–6 करोड़ के नुकसान की भरपाई कैसे करेगी — जुर्माने की राशि नुकसान के मुकाबले नगण्य है। अदालत ने कुर्क संपत्तियों से वसूली का रास्ता खोला है, लेकिन वास्तविक वितरण की जिम्मेदारी जिला प्रशासन पर है, जो अक्सर ऐसे मामलों में सबसे कमजोर कड़ी साबित होता है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा के चिटफंड मामलों का इतिहास बताता है कि दोषसिद्धि और पीड़ितों तक पैसा पहुंचना — ये दो अलग-अलग लड़ाइयाँ हैं।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिपुरा चिटफंड घोटाला क्या है?
यह मामला निजी कंपनी प्रगति शील इंफ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड द्वारा आम जनता से जमा योजनाओं के नाम पर ₹5 से ₹6 करोड़ एकत्र करने और परिपक्वता के बाद भुगतान न करने से जुड़ा है। मूल शिकायत 30 अप्रैल 2012 को कैलाशहर पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी, जिसे बाद में CBI को सौंपा गया।
CBI अदालत ने किसे और क्या सजा सुनाई?
अदालत ने CMD अरिंदम दास, निदेशक परितोष दास और प्रशासनिक निदेशक दीपशिखा चक्रवर्ती को 6-6 वर्ष कठोर कारावास और प्रत्येक पर ₹3 लाख जुर्माना लगाया। कंपनी पर अलग से ₹7 लाख का अर्थदंड लगाया गया है।
पीड़ित निवेशकों को उनकी राशि कैसे वापस मिलेगी?
अदालत ने आदेश दिया है कि वसूले गए जुर्माने और आरोपियों की कुर्क संपत्तियों से प्राप्त राशि को जिला मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर, उनाकोटी जिला, कैलाशहर के माध्यम से पीड़ित जमाकर्ताओं के बीच आनुपातिक रूप से वितरित किया जाए। जिला प्रशासन विभिन्न उप-मंडलों की आवश्यकता के अनुसार वितरण सुनिश्चित करेगा।
इस मामले में CBI की जांच कब और कैसे शुरू हुई?
त्रिपुरा सरकार और केंद्र सरकार के DoPT की अधिसूचनाओं के अनुपालन में CBI ने 8 अक्टूबर 2013 को यह मामला पुनः दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद 28 मई 2018 को तीनों आरोपियों और कंपनी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी।
इस फैसले का महत्व क्या है?
यह फैसला त्रिपुरा में चिटफंड धोखाधड़ी के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 2012 में दर्ज मामले में 2026 में दोषसिद्धि यह दर्शाती है कि CBI की जांच और अदालती प्रक्रिया अंततः परिणाम तक पहुंची, साथ ही कुर्क संपत्तियों से वसूली का रास्ता भी खुला है।
राष्ट्र प्रेस
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